By: Sabkikhabar
13-06-2018 08:43

न शराब, न सिगरेट तंबाकू और न ही किसी तरह का वायरल पीलिया (हेपेटाइटिस) संक्रमण, फिर भी दर्दे-जिगर। जिगर की जकड़न और कैंसर भी, अर्ध चिकित्सकीय भाषा में लिवर (यकृत) फाइब्रोसिस और फैटी लिवर। कैंसर हो या फाइब्रोसिस इसकी शुरुआत होती है फैटी लिवर से, मतलब जिगर में शोथ,—आम लोगों के लिए डाक्टरों की भाषा में लिवर बढ़ गया। विशेषज्ञों तक लोग तब पहुंचते हैं जब बीमारी गंभीर स्थिति में पहुंच जाती है। डॉक्टरी भाषा में नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज यानी कि (एनएफएलडी ) कहा जाता है। मतलब शराब को हाथ न लगाने के बावजूद लिवर में शराब की अति कर देने वाले लती लोगों सरीखे लक्षण। दरअसल, सुस्ती वाली लाइफ स्टाइल और जुबान-दिल-दिमाग को काबू में न रखने का खमियाजा हमारे जिगर को भुगतना पड़ रहा है। रोजमर्रा का तनाव हाइपरटेंशन, मधुमेह, ब्लॅड प्रेशर और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक खानपान के चलते शरीर का वसा संतुलन गड़बड़ाने से लिवर पर जोर पड़ रहा है।
दरअसल, खानपान और जीवनचर्या ठीक न होने के कारण वजन बढ़ता है और मोटापा आता है। इससे शरीर में वसा का जमाव होता है। इससे यकृत बढ़ जाता है, जिसे फैटी लिवर कहा जाता है। कुछ मरीजों में इससे सूजन और फाइब्रोसिस की समस्या हो जाती है। इससे लिवर सिरोसिस तथा लिवर के कैंसर का खतरा पैदा हो जाता है। पीजीआई चंडीगढ़ की ओर से किये गए हालिया शोध-सर्वेक्षण के परिणाम सबसे ज्यादा चौंकाने वाले हैं और पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल व उत्तर प्रदेश की शहरी व महिला आबादी के लिए गंभीर चेतावनी भी है। पीजीआई हेपेटोलॉजी विभाग के प्रो. डॉक्टर अजय दुसेजा कहते हैं कि यूं तो समूची दुनिया में एक-चौथाई आबादी फैटी लिवर की समस्या से ग्रस्त है, किंतु भारतीयों में यह समस्या क्षेत्रवार 20 से 32 फीसदी तक पाई जा रही है। सबसे चौंकाने वाली स्थिति पीजीआई चंडीगढ़ के शोध में मिली, जिसमें स्मार्ट सिटी चंडीगढ़ की अपेक्षाकृत स्वस्थ मानी जाने वाली आबादी में 53 प्रतिशत लोग इससे ग्रस्त हैं। जबकि पश्चिमी राज्यों में यह समस्या 25 फीसदी आबादी में और दक्षिण में 32 फीसदी लोगों में गैर शराब गैर-संक्रमण लिवर की है। अल्ट्रासांउंड और यकृत बायोप्सी की मदद से एनएएसएच का पता लगाया जाता है। गंभीरावस्था में रोगी के लिवर का प्रत्यारोपण करना पड़ता है। यह समस्या एक महामारी का रूप धारण कर रही है।

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