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मोदी की हत्या की साजिश और राजनीति

By Sabkikhabar :11-06-2018 08:42


भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद दलित अस्मिता का उठा सवाल अब माओवादियों की नीयत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सुरक्षा के सवाल में बदल चुका है। इस साल की शुरुआत में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में भड़की हिंसा के सिलसिले में महाराष्ट्र पुलिस ने दलित कार्यकर्ता सुधीर धावले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, मानवाधिकार कार्यकर्ता महेश राउत, शोमा सेन और रोना विलसन को मुंबई, नागपुर और दिल्ली से गिरफ्तार किया। वामपंथी विचारों वाले इन लोगों की गिरफ्तारी पर देश के दलितों, आदिवासियों, और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आती, इससे पहले ही पुलिस ने एक बड़ा खुलासा किया। पुलिस के मुताबिक उसके हाथ एक पत्र लिखा है, जो किसी कामरेश महेश को किसी आर की ओर से भेजा गया है। यह पत्र रोना विल्सन के घर से उनके लैपटाप से पुलिस ने बरामद करने का दावा किया है।

पुणे की विशेष अदालत में यह पत्र पेश करते हुए पुलिस ने कहा कि इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश का जिक्र है। पत्र में बिहार और पश्चिम बंगाल की हार के बावजूद भाजपा की 15 से अधिक राज्यों में जीत पर चिंता जताते हुए कहा गया है, कि यदि यही गति रही तो हर तरफ से पार्टी की परेशानी का सबब बनेगी। मोदी राज का अंत करने कॉमरेड किशन और कुछ अन्य वरिष्ठ कॉमरेड्स ने कड़े कदम अर्थात कॉन्क्रीट स्टैप्स सुझाये हैं। हम राजीव गाँधी जैसी एक और घटना के बारे में सोच रहे हैं। इस पत्र के आधार पर पुलिस का यह कहना है कि माओवादी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजीव गांधी की तरह ही मारने की साजिश रच रहे हैं। हालांकि रोना विल्सन के परिजनों ने इन आरोपों से इन्कार किया है। जेएनयू से पढ़े हुए रोना कमेटी फार रिलीज आफ पालिटकल प्रिजनर के सचिव के रूप में कार्यरत है। यह कमेटी अफ्स्पा जैसे कानूनों का विरोध करती है। 

भारत ने महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, एल एल मिश्रा, ललित माकन, बेअंत सिंह, अब्दुल गनी लोन, हरेन पांड्या जैसी राजनैतिक हत्याएं देखी हैं। छत्तीसगढ़ में तो नक्सली हमले में कांग्रेस की एक पूरी पंक्ति को ही खत्म कर दिया गया था। ऐसे में प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश की खबर डराती है। अगर पुलिस के आरोपों में सच्चाई है, तो फिर सरकार को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए, लेकिन इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि इतने गंभीर आरोप पर राजनीति न हो। अभी तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है कि नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश की बात उछालकर राजनीतिक लाभ लेने का षड्यंत्र भी रचा जा रहा है।

भारत का जो राजनैतिक माहौल 2014 में था, उसमें 2018 आते-आते काफी बदलाव आ गया है। भाजपा बेशक कई राज्यों में अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही है, लेकिन उसका जनाधार खिसक भी रहा है। मोदी, सिर्फ नाम ही काफी है, ऐसी बात अब नहींं रह गई है। 2014 के किए बहुत से वादे भाजपा ने पूरे नहीं किए और जनता इस पर मोदीजी से जवाब चाहती है।

भाजपा के सहयोगी दलों में बेचैनी, नाराजगी, अलग होने की चाहत झलक रही है। इधर कांग्रेस पहले से अधिक मजबूत होकर उभर रही है और 2019 के लिए कई दलों को अपने साथ लेने की तैयारी में लगी है। सपा, बसपा भी साथ आ चुके हैं। यानी भाजपा के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं और मोदीजी की साख दांव पर लगी है। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा अब कोई सहानुभूति कार्ड  चल रही है। वैसे भी उसके 4 सालों के शासन में वामपंथियों, गांधीवादियों और मानवाधिकार की बातें करने लोगों को देशद्रोही होने का तमगा कई बार दिया जा चुका है। क्या इस बार भी ऐसा ही खेल खेला जा रहा है ताकि भीमा कोरेगांव हिंसा के पीछे असल मुद्दे से ध्यान भटका कर माआवोदियों के खिलाफ माहौल बनाए जाए?

माओवादी विचारक और लेखक वरवर राव का जिक्रभी खत बताया जा रहा है, कि उन्होंने माओवादियों के लिए फंड जुटाए। लेकिन राव इस खत को पूरी तरह फर्जी बताते हैं। उनका कहना है किजिन पांच लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया, वे सभी दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले लोग हैं और हत्या की राजनीति में विश्वास नहीं रखते हैं। वरवर राव का यह भी कहना है कि यह पत्र माओवादी संगठन के भीतर किसी ने किसी को संबोधित करते हुए नहीं लिखा, बल्कि किसी आर नाम के व्यक्ति का बताया जा रहा है, तो इस आधार पर पुलिस माओवादियों पर इल्जाम कैसे लगा रही है?

श्री राव का कहना है कि पुलिस कोरेगांव दलित आंदोलन को माओवादियों से जुड़ा बताकर एकजुट हो रही लोकतांत्रिक ताकतों को माओवादी बताना चाहती है। वरवर राव ने जो शंकाएं जाहिर की हैं, उसका समाधान पुलिस को करना चाहिए। इस मसले पर राजनीतिकआरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरु हो गया हैै। प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश के नाम पर राजनीति का यह खिलवाड़ दुखद है। किसी भी विचार को विचार से ही पराजित किया जा सकता है, खूनखराबे से नहीं। दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्यममार्गी राजनेता इसे समझें और भारत के राजनैतिक माहौल को और न बिगाड़ें। 
 

Source:Agency