Breaking News

Today Click 153

Total Click 119803

Date 15-08-18

किसान बाबा रामदेव तो नहीं हैं

By Sabkikhabar :08-06-2018 08:47


काश कि देश के किसान योग गुरु और व्यापारी रामदेव की तरह होते। फिर न उन्हें अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरना पड़ता। न आत्महत्या करनी पड़ती। न गोली खानी पड़ती। सरकार खुद उनके पास हाथ जोड़े आती और पूछती कि आप बताएं आपको क्या चाहिए? आपकी सुविधा और लाभ के लिए हम तमाम नियम-कानून संशोधित कर देंगे। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि 6 जून की सुबह खबर आई कि बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण की उत्तरप्रदेश सरकार से नाराज हैं। ग्रेटर नोएडा में प्रस्तावित मेगा फूड पार्क के लिए अखिलेश यादव सरकार के दौरान पतंजलि को जो जमीन देने का प्रस्ताव था, उसे कुछ नियमों के कारण योगी सरकार द्वारा रद्द किए जाने की खबर थी।

इस पर पतंजलि ने फूड पार्क उत्तर प्रदेश छोड़, कहीं और बनाने का ऐलान कर दिया। जो ऐलान कम और धमकी अधिक लगी। बस इसके बाद योगी सरकार एक्शन में आ गई और खबरों की मानें तो पतंजलि की शर्तों के मुताबिक नियमों में संशोधन के लिए राजी हो गर्र्ई। जब यह फूड पार्क बनाने की योजना बनी थी तो प्रदेश के किसानों को लाभ और लगभग दस हजार लोगों को नौकरी मिलने की उम्मीद जताई गई थी। यह नहीं बताया गया था कि इस फूड पार्क से बाबा रामदेव के कारोबार को क्या लाभ होगा। 

बहरहाल, अब भी योगी सरकार अपनी सफाई में कह सकती है किउसने नियमों में संशोधन का फैसला किसानों के हित को देखते हुए लिया है। लेकिन भाजपा सरकार में रामदेव क्या हैसियत रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। अभी समर्थन के लिए संपर्क अभियान पर निकले अमित शाह ने भी बाबा रामदेव से मुलाकात की। सत्ता जिसके दरवाजे पर हाथ जोड़कर समर्थन मांगेगी, उसकी शर्तों के हिसाब से तो नियम बनेंगे ही। यह संयोग ही है कि छह जून को सुबह जब रामदेव की नाराजगी की खबरें आईं और शाम तक उन्हें मनाने की कोशिशों की, उसी छह जून को मंदसौर में पुलिस की गोली से मारे गए 6 किसानों की बरसी मनाई जा रही थी। पिछले साल किसान आंदोलन के दौरान ही शिवराज सिंह चौहान सरकार में यह गोलीकांड हुआ था। तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुख जताया था और बैठक कर किसानों को राहत पहुंचाने की बात कही थी।

इस एक साल में मोदीजी का यह वादा भी हवा में उड़ गया। किसानों की इस तरह की मौत की पहली बरसी पर उन्होंने कोई संदेश नही ंदिया, क्या इसलिए कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस मौके पर मंदसौर पहुंचे हुए थे। क्या किसान महज राजनीति का हथियार बन कर रह गए हैं, जिसे सब अपनी-अपनी सुविधा से चलाते हैं? समर्थन के लिए संपर्क पर निकले अमित शाह 2019 में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए समाज की नामी-गिरामी हस्तियों से मिल रहे हैं। पूर्व सेनाध्यक्ष दलबीर सुहाग से लेकर कपिल देव और माधुरी दीक्षित तक वे तमाम लोगों से मिलकर 4 सालों की उपलब्धियां गिना रहे हैं और उनसे समर्थन मांग रहे हैं। उन्हें पता है कि इन लोगों का प्रभाव समाज के बड़े वर्ग तक है और इनकी फैन फालोइंग का लाभ भाजपा उठाना चाहती है।

किसानों की फैन फालोइंग तो दूर, कोई नामलेवा भी नही ंहोता। तभी हर साल हजारों किसान आत्महत्या करते हैं और जनता को कोई फर्क नहींपड़ता। तो ऐसे गए-गुजरे किसानों से भला अमित शाह क्यों मिलेंगे? और क्यों उनसे भाजपा के लिए समर्थन मांगेगे? भाजपा के मंत्रियों को तो यह भी नहीं सुहा रहा कि राहुल गांधी किसानों से मिलने क्यों गए? अरुण जेटली उन पर तंज कस रहे हैं कि आखिर वे कितना जानते हैं? और कब चीजों को समझेंगे? बेशक राहुल गांधी को बहुत सी बातें अभी सीखना और समझना बाकी है, उनका मंदसौर दौरा भी राजनीति से ही प्रेरित था। लेकिन कम से कम देश का कोई नेता किसानों का दर्द बांटने उनके बीच पहुंचा तो।

भाजपा राहुल गांधी पर किसानों के मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाती है, तो ऐसा करने से उसे किसने रोका है? क्यों अमित शाह किसानों के बीच नहीं पहुंचे? क्यों मोदीजी ने मंदसौर में मारे गए लोगों को याद किया? अगर वे ऐसा करते तो किसानों के जख्मों पर थोड़ी तो ठंडक पड़ती।
 

Source:Agency