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उपचुनाव में नहीं चल सका योगी मोदी का जादू

By Sabkikhabar :04-06-2018 07:51


उत्तर प्रदेश में कैराना और नूरपुर के चुनाव में न तो मोदी का जादू चला और न ही स्टार प्रचारक बने योगी का ही जादू चल सका। दोनों ही सीटें  अघोषित गठबंधन के प्रत्याशियों ने भाजपा से छीन लीं। उत्तर प्रदेश में भाजपा की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी सरकार के आने के बाद यह दूसरा चुनाव था। इसके पहले फूलपुर और गोरखपुर की लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सपा के प्रत्याशियों ने बसपा के सहयोग से भाजपा को हराया था। कैराना और नूरपुर के चुनाव मैदान में न तो बसपा थी और न ही कांग्रेस। देश के तीन राज्यों की चार लोकसभा और 11 विधानसभा सीटों में से भाजपा के हाथ सिर्फ एक सीट लोकसभा की तथा एक सीट विधानसभा के हाथ लगी शेष पर भाजपा के खिलाफ खड़े दलों को जीत हासिल हुई। 

देश के तीन राज्यों की लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों के परिणामों में 2019 के चुनाव के पहले की विपक्षी एकता के प्रयासों की कुछ झलकियां दिखाई हैं। इन परिणामों का सबसे बड़ा प्रभाव उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है जहां पिछले 14 महीने से भाजपा की बहुमत की सरकार है और भाजपा के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। दो माह पूर्व हुए प्रदेश में दो लोकसभा चुनाव में भाजपा ऐसी सीटों पर हारी जो योगी आदित्यनाथ तथा उनकी सरकार के उपमुख्यमंत्री केशव मौर्या का निर्वाचन क्षेत्र था और इन्हीं दोनों सदस्यों के इस्तीफे के फलस्वरूप रिक्त हुई सीटों पर चुनाव हुआ था। समाजवादी पार्टी ने बसपा के सहयोग से जीतकर भाजपा की 325 सीटों की सरकार को पटखनी दी तो मुख्यमंत्री और समर्थक और नेता यह कहते फिरने लगे कि गठबंधन सांप-छछूंदर का है जो बाढ़ के पानी से भयभीत होकर एक ही पेड़ पर जा बैठे हैं। अतिआत्मविश्वास के कारण हम हारे। 

भाजपा अभी दो माह पहले हुए गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव की चोट ठीक तरह से सहला भी नहीं पाई थी कि कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा में भाजपा फिर से मुंह के बल गिर पड़ी। जिस रणनीति से भाजपा ने 2014 और 2017 में अपने विरोधियों को चुनावी मैदान में पटक कर उनकी हालत इतनी पतली कर दी थी कि उफ् तक नहीं बोलने दिया था उन्हीं राजनीतिक दलों ने ऐसा दांव चला कि साम दाम दंड भेद लगाकर भी केन्द्र और राज्य की देदीप्यमान सत्ता में रहकर भी अपने प्रत्याशियों को इन उपचुनाव में नहीं जिता सकी। यहां तक कि मुख्यमंत्री ने दो-दो रैलियां की और कैराना मतदान के चुनाव प्रचार बंद होने के बाद मतदान से एक दिन पूर्व प्रधानमंत्री ने ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेस वे का उद्घाटन 45 किलोमीटर की दूरी पर बागपत में रोड शो और रैली करके विकास की उपलब्धियों का खाका खींचा। निर्वाचन आयोग ने विपक्षी दलों की इस कार्यक्रम की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। 

 कैराना लोकसभा उपचुनाव परिणाम न सिर्फ एक चुनाव परिणाम है, यह 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे पर मरहम लगाने का कार्य भी किया है। यह दंगे का प्रभावित क्षेत्र भी रहा है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दंगे के कारण जाट और मुस्लिम में इतनी खाई हो गयी कि 65 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और पचास हजार मुस्लिम आबादी बेघर होना पड़ा। उपचुनाव में सपा की तबस्सुम हसन को रालोद का प्रत्याशी बनाकर सभी विपक्षी दलों के समर्थन से जिता दिया और समाजवादी पार्टी ने नूरपुर की विधानसभा सीट भी भाजपा से छीन ली।

तबस्सुम को जब रालोद ने भाजपा की प्रत्याशी हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह के खिलाफ अपना प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा तो सत्तारूढ़ भाजपा और उनके नेताओं ने उधार का प्रत्याशी बताना शुरू कर दिया था। वहीं नूरपुर विधानसभा में लोकेन्द्र सिंह के निधन के कारण उनकी पत्नी अवनी सिंह को भाजपा ने प्रत्याशी उतारा था सपा ने उनके खिलाफ नई मुलहसन को खड़ा किया था। अवनी सिंह और मृगांका सिंह सहानुभूति का वोट पाकर भी चुनाव जीतने में सफल नहीं हो सकीं।

मोदी लहर में हुकुम सिंह को 2014 के लोकसभा चुनाव में 5,65,909 समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन तबस्सुम हसन के बेटे को 3,29,081 तथा बसपा के  हसन को 160414, रालोद के करतार सिंह भड़ाना को 42706 वोट मिले थे। लोकसभा 2009 में तबस्सुम हसन ने बहुजन समाज पार्टी की प्रत्याशी के रूप में भाजपा के हुकुम सिंह को हराया था। तबस्सुम हसन को 2,83,269 तथा हुकुम सिंह को 2,60,796 वोट मिले थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में रालोद की प्रत्याशी रही अनुराधा चौधरी को 5,23,923 बसपा के शहनवाज को 1,81509 वोट मिले थे। 1996 में तबस्सुम के पति मुनव्वर हसन ने समाजवादी पार्टी से जीते थे उन्हें 1,84,636 वोट मिले थे। उन्होंने भाजपा के उदयवीर सिंह को हराया था।

उदयवीर सिंह को 1,74,614 वोट मिले थे। इस सीट से रालोद के नेता अजित सिंह के पिता प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी ने 1980 में जनता पार्टी सेक्युलर से चुनाव लड़ा था और उन्हें विजयश्री हासिल हुई थी। उन्होंने कांग्रेस के नरायन सिंह को हराया था।   रालोद उपाध्यक्ष और चौधरी अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी का राजनीतिक भविष्य भी इस चुनाव परिणाम पर टिका हुआ था क्योंकि लोकसभा चुनाव 2014 मे उनका खाता भी नहीं खुला था और प्रदेश की विधानसभा में उनकी पार्टी से जीता हुआ सदस्य राज्यसभा के चुनाव में भाजपा की ओर खिसक गया। चौधरी चरण सिंह के समय से जाट और मुस्लिम यानी अहीर, जाट की एकता पर मुजफ्फरनगर दंगे ने बहुत बड़ी खाई खींच दी थी, इस चुनाव ने यह संकेत दिये हैं कि इस दूरी में काफी कमी आई है।  

उत्तर प्रदेश में कैराना और नूरपुर के चुनाव में न तो मोदी का जादू चला और न ही स्टार प्रचारक बने योगी का ही जादू चल सका। दोनों ही सीटें अघोषित गठबंधन के प्रत्याशियों ने भाजपा से छीन लीं। उत्तरप्रदेश में भाजपा की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी सरकार के आने के बाद यह दूसरा चुनाव था।  इसके पहले फूलपुर और गोरखपुर की लोकसभा सीट पर हुये उपचुनाव में सपा के प्रत्याशियों ने बसपा के सहयोग से भाजपा को हराया था। कैराना और नूरपुर के चुनाव मैदान में न तो बसपा थी और न ही कांग्रेस। देश के तीन राज्यों की चार लोकसभा और 11 विधानसभा सीटों में से भाजपा के हाथ सिर्फ एक सीट लोकसभा की तथा एक सीट विधानसभा की हाथ लगी शेष पर भाजपा के खिलाफ खड़े दलों को जीत हासिल हुई।

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो भाजपा के स्टार प्रचारक हैं, वे त्रिपुरा जिताने गये, कर्नाटक में चुनाव प्रचारक गये। महाराष्ट्र की पालघर सीट और भंडारा-गोंदिया पर उत्तर भारतीयों को रिझाने के लिए प्रचार करने के लिए गये थे। लेकिन वे अपने ही राज्य की दो सीटों को गवां दिये। पालघर सीट जरूर भाजपा के हाथ लग गई। यह वही हाल हुआ कि 'घर का जोगी जोगिया आन गांव का संत'। उपचुनाव के परिणामों से यह संकेत निकलता है कि जिस प्रकार गोरखपुर, फूलपुर और अब कैराना तथा नूरपुर की सीट पर भाजपा को करारी हार हाथ लगी है विपक्ष बिना एकजुटता के यह परिणाम देने में सक्षम नहीं था।

2017 का विधानसभा चुनाव पूरी तौर पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के वोटों के विभाजन के नतीजे के रूप में भाजपा के हाथ लगा था जिससे सबक लेते हुए सपा-बसपा की नजदीकियों ने प्रदेश की राजनीति में ठीक वैसा ही बदलाव दिखा दिया है जिस प्रकार 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद 1993 में सपा-बसपा के गठबंधन ने कर दिखाया था जब पार्टियां भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पा रही थीं कि जनका का क्या मूड होगा वे समझ नहीं पा रही थीं।

लोकसभा 2019 में इन विपक्षी दलों की गठबंधन और एकजुटता की स्थिति क्या होगी इसी पर देश और प्रदेश की राजनीति निर्भर करेगी। देश में सबसे अधिक सीटें उत्तर प्रदेश में हैं जिनकी बदौलत केन्द्र में भाजपा को बहुमत मिला। 80 में से 71 सीटें भाजपा को तथा दो उसकी सहयोगी अपना दल को मिलीं। कांग्रेस को सिर्फ मां-बेटे यानी सोनिया और राहुल की सीटों से संतोष करना पड़ा और प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा को भाजपा ने मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार तक सिमटा दिया। सपा को सिर्फ पांच सीटें हासिल हुई थीं। सपा प्रदेश में अपनी सरकार होने के बावजूद इतनी बुरी तरह से लोकसभा में पराजित हुई।  

भाजपा ने कैराना के चुनाव में मुजफ्फरनगर दंगे का मामला भी उठाया और जिन्ना का भी इस प्रकार लेकिन विपक्ष के समीकरणों तथा जनता के दबाव के आगे उसकी एक न चल सकी। कैराना लोकसभा की पांच सीटों में से चार पर भाजपा का कब्जा है उनमें से दो मंत्री भी हैं। सुरेश राणा प्रदेश में गन्ना मंत्री हैं और गन्ना किसानों के मुद्दे ने आग में घी डालने का काम चुनाव में किया। सवेरे-सवेरे ईवीएम और उसकी सहयोगी वीवीपैट मशीनों को लू लग गई जिसके कारण उन्हीं क्षेत्रों में सबसे अधिक मशीनें खराब हुईं जहां से रालोद प्रत्याशी तबस्सुम हसन को सबसे अधिक बढ़त मिली। यदि पुनर्मतदान न हुआ होता तो परिणाम कुछ और होते।

इस चुनाव ने चुनाव आयोग पर भी सवालिया निशान खींच दिये। गोरखपुर और फूलपुर चुनाव के बाद भाजपा की नयी रणनीति 50 फीसदी से अधिक वोट पाने की तैयारी है लोकसभा चुनाव तक भाजपा और विपक्ष किस स्थिति में पहुंचता है इसी पर 2019 का चुनाव निर्भर करेगा। इसके पहले तीन राज्यों छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश के चुनाव प्रस्तावित हैं विपक्ष की भूमिका उन चुनाव में कैसी होगी यह भी भावी राजनीति का हिस्सा होगा क्योंकि इन राज्यों के राजनीतिक समीकरण उत्तर प्रदेश से भिन्न हैं, ऐसे में राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का क्षेत्रीय दलों के साथ क्या व्यवहार होगा यह भी मायने रहेगा क्योंकि इन राज्यों में आमने-सामने मुकाबले में भाजपा और कांग्रेस भी होंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व होने वाले वास्तविक सेमीफाइनल तो इन राज्यों के चुनाव ही होंगे।
 

Source:Agency