By: Sabkikhabar
01-06-2018 09:07

3 राज्यों की 4 लोकसभा सीटों और 9 राज्यों की 10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों के जो नतीजे आएं हैं, उन्हें भाजपा कतई 2019 का सेमीफाइनल नहीं मानेगी। कर्नाटक के परिणामों के पखवाड़े भर बाद ही उसे दूसरा बड़ा झटका लगा है। अब तक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पार्टी की हर जीत पर कहते थे हमने कांग्रेस मुक्त भारत की ओर एक और कदम बढ़ा लिया। अब उपचुनावों के नतीजों पर वे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तो खामोश हैं, अलबत्ता गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने एक पुरानी कहावत का सहारा लिया है कि वन स्टेप फारवर्ड, टू स्टेप बैक। एक जमाने में बोल्शेविकों में उत्साह भरने और पाार्टी में आए संकट की समीक्षा के लिए रूसी क्रांति के नेता लेनिन ने इसी शीर्षक से किताब लिखी थी।

1907 में छपी यह किताब भाजपा के नेताओं ने पढ़ी है या नहीं, यह तो नहीं मालूम, लेकिन इसके शीर्षक की जरूरत भाजपा को पड़ रही है, क्योंकि उसे लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। उत्तरप्रदेश में गोरखपुर, फूलपुर में सपा-बसपा गठबंधन पर पार्टी नेताओं ने कैसे-कैसे फिकरे कसे। लेकिन फिर भी जनता ने भाजपा की जगह मायावती-अखिलेश के साथ को चुना। अब बारी कैराना और नूरपुर की थी, जहां जीत के लिए भाजपा ने फिर सारी तिकड़में अपनाईं। सांप्रदायिक बातें की, विरोधियों को कोसा, मोदीजी ने निकट ही बागपत में रोड शो भी कर लिया, ताकि उसका असर मतदाताओं पर पड़े। लेकिन भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। झारखंड में भी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा को हरा दिया और बिहार में भी राजद ने जदयू को हराया।

14 सीटों के उपचुनावों में मात्र दो सीटों महाराष्ट्र में पालघर लोकसभा सीट और उत्तराखंड में थराली विधानसभा सीट पर ही भाजपा की जीत हुई है। जबकि कांग्रेस ने पंजाब में शाहकोट, महाराष्ट्र में पलुसकड़े (गांव) और मेघालय में अंपाती विधानसभा सीटें जीती हैं। तो चाहे अकेले हो या सहयोगियों के साथ, कांग्रेस की जीत भाजपा से बड़ी है। अब इसके बाद भी भाजपा को अपनी जीत की हेकड़ी दिखानी हो तो कोई क्या कर सकता है? हालांकि उपचुनावों में जीत या हार राजनीति की दशा-दिशा तय नहीं करती हैं, न ही इसका कोई व्यापक प्रभाव होता है। लेकिन बीते चार बरसों में भाजपा ने देश की राजनीति में माहौल ऐसा बना दिया कि लोकसभा सीट से लेकर नगरीय निकाय की सीट तक यानि हर छोटे-बड़े चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया गया। इसके कारण गैरजरूरी प्रतिद्वंद्विता बढ़ी ही, अनैतिक, अवांछित तौर-तरीके भी बढ़े। इससे पहले एकाध उपचुनाव ही राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनते थे, लेकिन अब हर चुनाव पर लंबी-निरर्थक चर्चाएं चलाई जाती हैं। अनावश्यक मुद्दे खड़े किए जाते हैं, जिनसे जनता का ध्यान बंटे। 

प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और बड़े नेता उपचुनावों में अपना समय लगाते हैं, जिससे देशहित के जरूरी काम टलते हैं। लोकतंत्र में चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके अलावा भी बहुत सी बातें महत्वपूर्ण हैं, जिनकी उपेक्षा भाजपा करती रही है। और भाजपा को हराने के चक्कर में बाकी दल भी उन बातों पर ध्यान देना छोड़ देते हैं। चुनाव के खेल और तिकड़मों में जनता को असल मुद्दों के लिए जागरूक करना छोड़ दिया गया, उसे मुफ्त सामान और खैरात लेने की आदत डाल दी गई। सरकारी स्कूलों, अस्पतालों की बदहाली, किसानों की दुर्दशा, तेल की बढ़ती कीमतें, उनके कारण बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, बिजली, पानी, सड़क, आवास की सुविधा, दलितों-पिछड़ों की स्थिति में सुधार, ये सारे मुद्दे राजनीतिक दलों ने अपने-अपने तरीकों से भुनाए और इनके दम पर वोट हासिल करने की कोशिश की। लेकिन जनता इन पर सवाल पूछे और अपना हक मांगे, इसकी गुंजाइश खत्म करके, उसे मंदिर-मस्जिद, सवर्ण-दलित, गाय-सूअर में उलझा दिया गया। इन गैरजरूरी बातों में व्यस्त जनता के नाक के नीचे से उसके हक छीने जा रहे हैं और फिर एक कदम आगे, दो कदम पीछे का पाठ पढ़ाया जा रहा है। यह स्थिति खतरनाक है। अब उपचुनावों के परिणामों पर बेकार की बहस का दौर चलेगा। इसलिए जनता सावधान रहे और अपने कदम पीछे करने की जगह आगे ही बढ़ाती जाए।
 

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