By: Sabkikhabar
25-05-2018 07:07

पहले ही रिकार्ड स्तर पर जा चुकी डीजल व पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने से तेल कम्पनियां अभी भी परहेज नहीं बरत रहीं। जब हम ये पक्तियां लिख रहे हैं, उन्होंने लगातार नवें दिन इनमें वृद्धि का ऐलान कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों के बढ़ने व डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने को इस वृद्धि की वजहों में गिना जा रहा है और भले ही पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कह रहे हैं कि सरकार ने स्थिति पर नजर बनाई हुई है और उपभोक्ताओं को राहत दिलाने के अनेक विकल्पों पर गौर कर रही है, स्थिति में कोई परिवर्तन होता नहीं दिख रहा। पेट्रोलियम मंत्री ने कई दिन पहले कहा था कि सरकार इस बारे में जल्दी ही कोई घोषणा करेगी, लेकिन लगता है कि सरकार की निगाह में वह 'जल्दी' अभी आई नहीं है। फिलहाल, वह किसी घोषणा की जल्दी में नहीं है। 

इस मूल्यवृद्धि पर विचार करते हुए याद रखना होगा कि यह सिर्फ  उपभोक्ता हित या औचित्य से जुड़ी न होकर सरकार की नीतियों से जुड़ी हुई है और इस कारण काबू में नहीं है कि सरकार के पास इस सम्बन्धी व्यावहारिक नीति का अभाव है। याद कीजिए कि उसने बहुस्तरीयता की विडम्बनाओं का खात्मा कर करप्रणाली व कर दरों मे एकरूपता लाने के लिए जीएसटी लागू किया तो उपभोक्ता वस्तु होने के बावजूद पेट्रोलियम पदार्थों को उसके दायरे से अलग रखा। जानकारों की मानें तो इसके पीछे उसकी वह बदनीयत है, जिसके तहत वह इन पदार्थों पर जीएसटी की सर्वोच्च दरों से भी अधिक कर वसूलती रहना चाहती है। 

सवाल मौजूं है कि जीएसटी के रूप में  माल करों और सेवाओं की राष्ट्रीय नीति का निर्धारण कर दिए जाने के बावजूद क्या किसी वस्तु को उससे अलग रखा जाना चाहिए? जहां तक डीजल और पेट्रोल का सम्बन्ध है, वे आयात मूल्य के दुगुने से अधिक दरों पर बिक रहे हैं। कारण यह कि केन्द्र सरकार के अलावा राज्य सरकारें भी उन पर करों से होने वाली आय से खुद को अलग नहीं करना चाहतीं, न ही उसे लेकर कोई समझौता करना चाहती हैं। ऐसे में यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या राज्यों को करों की मनमानी दरें निर्धारित करने का अधिकार है? अगर नहीं तो इस निर्धारण में भेदभाव करने का, सो भी निराधार, अधिकार कैसे हो सकता हैं? हम जानते हैं कि व्यवस्था का संचालन करने वाली संस्था के तौर पर राज्य खुद को अधिकतम् लाभ अर्जित करने का माध्यम नहीं बना सकता। जाहिर है कि उसकी भेदभावकारी मनमानी भूमिका को स्वीकार नहीं किया जा सकता।  

जहां तक डीजल व पेट्रोल की उपलब्धता का सम्बन्ध है, वे देश में आवश्यकता भर उपलब्ध नहीं हैं और उनका 80 प्रतिशत आयात करना होता है। लेकिन देश में उत्पादित और आयातित पेट्रोलियम पदार्थों के दामों के बाजार मूल्य में कोई अन्तर नहीं है। सो भी, जब देश में इन पदार्थों का उत्पादन सार्वजनिक क्षेत्र में है और उसका लाभ सरकार के ही खाते में जाता है। यानी आयातित पेट्रोलियम पदार्थ और निजी तेल कम्पनियां तो अपनी जगह पर रहें, सरकारी तेल कम्पनियों द्वारा उत्पादित पेट्रोलियम पदार्थ भी उपभोक्ताओं को सस्ते नहीं मिलते। 

जाहिर है कि इस मामले में उपभोक्ताओं की दृष्टि में राज्य अपनी स्थिति का अनुचित लाभ उठाने वालों की श्रेणी ही आता है। इसे उसका गुण नहीं दोष ही माना जायेगा। उसके इस तर्क पर विचार करें कि पेट्रोलियम पदार्थों पर ज्यादा कर लगाने यानी उन्हें महंगा करके बेचने के पीछे राष्ट्रीय विकास को प्रोत्साहित करने का उद्देश्य है, तो डीजल व पेट्रोल का सबसे बड़ा उपभोक्ता खुद राज्य ही है। निजी और सरकारी अधिकारियों की कारें, मोटरें, बसें, रेलगाड़ियां और बिजली का उत्पादन करने वाली कम्पनियां इनके सबसे बड़े उपभोक्ताओं में शामिल हैं और उनके द्वारा अदा किया जाने वाला इनका मूल्य अन्तत: देश की अर्थव्यवस्था से जुड़कर उसे प्रभावित करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसका भार अन्तत: जनता को ही उठाना पड़ता है। 

यह तो राज्य नामक संस्था के गठन के साथ ही तय हो गया था कि नागरिक अपनी कमाई का एक भाग उसके संचालन के लिए देंगे, लेकिन तब यह संस्था नागरिकों के कल्याण यानी उनकी सुख-सुविधाओं के विस्तार और रक्षा एवं सुरक्षा के समुचित उपायों के लिए थी, उनका संकट बढ़ाने के लिए नहीं। लेकिन आज, जब उसका स्वरूप बदल गया है, उससे क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि से अधिकतम लाभ उठाने का सिद्धान्त क्या राष्ट्रीय विकास दर को बढ़ाने वाला सिद्ध हो सका है? 

मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्वकाल में भी इन पदार्थों के मूल्य बढ़ने पर सवाल उठे थे। तब इनके मूल्यों का निर्धारण राज्य की सहमति से होता था और तेल कम्पनियां अपने बढ़ते घाटे का रोना रोकर इसका औचित्य सिद्ध करती थीं। लेकिन जब उनकी आय-व्यय के वार्षिक संतुलन पत्र प्रकाशित हुए तो किसी भी कम्पनी का घाटा इस सीमा तक नहीं बढ़ा था कि वह मूल्यवृद्धि का आधार बन सके। 

अब राज्य ने पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण के अधिकार सम्बन्धित कम्पनियों को दे रखे हैं। यह काम पहले प्रतिमाह होता था, लेकिन अब प्रतिदिन होता है। इसलिए कम्पनियां जब चाहें, दाम बढ़ा सकती हैं। यानी उन्हें अपने लाभ के लिए उनकी बिक्री दरें पुनर्निर्धारित करने में एक दिन की प्रतीक्षा की आवश्यकता भी नहीं रह गयी है। अरसा पहले दिया गया एक मंत्री का यह तर्क मान लिया जाये कि डीजल-पेट्रोल का बहुतायत में इस्तेमाल करने वाले निजी गाड़ियों के मालिक कोई भिखमंगे नहीं बल्कि करोड़पति हैं, तो उसे इस तथ्य तक ले जाना होगा कि स्वतंत्रता के बाद नयी मोटरगाड़ियों, कारों और स्कूटरों आदि के निर्माण के लिए नयी कम्पनियां नहीं बुलायी गयी थीं, लेकिन अब राज्य की ही नीतियों के कारण इनके लाभकारी व्यवसाय में सबसे अधिक दिलचस्पी विदेशी कंपनियों की ही है। वे प्रतिस्पर्धा में अपने द्वारा उत्पादित वाहनों के दाम घटाकर पेट्रोलियम पदार्थों का उपभोग बढ़ा रही हैं। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की असफलता के फलस्वरूप भी सड़कों पर निजी दोपहिया व चौपहिया वाहनों की भरमार होती जा रही है। 

राज्य ने भी अपने छोटे कर्मचारियों की कार्यकारी सुविधाओं में विस्तार को गाड़ियों के उपभोग और उपलब्ध कराने की सुविधा से जोड़ दिया है। उसकी मानें तो यह अब विकास की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। लेकिन क्या इसके फलस्वरूप देश में अब तक विकास के लाभों से वंचित व असमर्थ लोगों की, जो कुल आबादी का लगभग आधा हैं, क्षमताओं में कोई विस्तार हुआ है? अगर नहीं तो यह प्रश्न हमें क्यों नहीं चिंतित करता? 

अरसा पहले सरकार की ओर से कहा गया था कि वह पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी के दायरे में शामिल करना चाहती है लेकिन उसने अब तक ऐसा नहीं किया और भेदभाव की नीति जारी रखे हुए है। अभी भी पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान सिर्फ  यह आश्वासन दे रहे हैं कि वे मूल्यवृद्धि से पैदा हुई समस्या के समाधान के प्रयास करेंगे, जबकि असली सवाल यह है कि ये पदार्थ जीएसटी प्रणाली में शामिल होंगे या नहीं क्योंकि प्रधान तेल कम्पनियोंं सेे इनके दाम थोड़े  गिरवा भी दें तो इससे उपभोक्ताओं के साथ होने वाला सतत अन्याय समाप्त नहीं हो सकता। इसलिए इस मूल्यवृद्धि को नीतिगत प्रश्न मानकर हल किया जाना चाहिए। बेहतर हो कि पेट्रोलियम पदार्थों को राजस्व अर्जित करने का साधन न माना जाये और उनके सिलसिले में, कई दूसरे देशों की तरह, वह राह चुनी जाये, जिससे वे अर्थव्यवस्था पर बोझ बनने के बजाय उसके विकास में सहायक की भूमिका निभा सकें।  
वैसे भी किसी भी आयातित वस्तु को दूने से अधिक मूल्य पर बेचना और उसका भार उपभोक्ताओं पर डालना न्यायसंगत या लोकसम्मत नहीं कहा जा सकता।
 

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