By: Sabkikhabar
23-05-2018 06:20

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की सोची शहर में हुई मुलाकात कई मायनों में यादगार कही जा रही है। काले सागर के तट पर बसे इस शहर में दोनों शासन प्रमुखों की अनौपचारिक मुलाकात हुई। अभी हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मोदीजी ने अनौपचारिक मुलाकात की थी। उनके सम्मान में हिंदी फिल्मों का संगीत बजा था और नौकाविहार का आनंद भी दोनों नेताओं ने उठाया था। अब रूस के सोची शहर में भी मोदी और पुतिन ने एकसाथ नौका विहार किया, छात्रों को संबोधित किया, देश-दुनिया के कई मुद्दों पर अनौपचारिक चर्चा की और साथ में पुरानी यादों को ताजा किया।

वैश्विक राजनीति में अमूमन शीर्ष स्तर पर नेताओं की औपचारिक माहौल में, पहले से तय एजेंडे पर औपचारिक चर्चा ही होती है। लेकिन जब राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं तो तौर-तरीकों में भी बदलाव आ रहा है। खैर, नरेन्द्र मोदी ऐसे वक्त रूस पहुंचे, जब व्लादीमीर पुतिन ने चौथी बार रूस की कमान संभाली है और एक ताकतवर वैश्विक नेता के रूप में उनकी पहचान नए सिरे से रेखांकित हुई है। हाल ही में जर्मनी से एजेंला मार्केल ने रूस में पुतिन से भेंट की थी और अब इमैनुअल मैक्रों भी रूस जाने वाले हैं। बीते दिनों अमेरिका ने ईरान से हुए परमाणु करार से अलग होने का जो फैसला लिया है, उससे ये तमाम देश अमेरिका से नाराज हैं, साथ ही उसके होने वाले परिणामों को लेकर चिंतित भी।

डोनाल्ड ट्रंप अपनी जिद छोड़ने तैयार ही नहीं हैं, भले उससे विश्व में अशांति और अस्थिरता क्यों न बढ़ जाए। अमेरिका धमकी भी दे रहा है कि जो ईरान से संबंध रखेगा, उससे वे सब रिश्ते तोड़ लेंगे। हालांकि यह परमाणु संबंधों की बात होगी, लेकिन फिर भी अंतरराष्ट्रीय पटल पर ऐसी घुड़कियों से तनाव बढ़ता है। जहां तक भारत की बात है, तो हमारे ईरान से व्यापारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। हम उससे कच्चा तेल खरीदते हैं। अभी भारत वहां चाबहार बंदरगाह विकसित कर रहा है, जिसका खुद हमारे लिए आर्थिक, सामरिक महत्व है। ऐसे में भारत-ईरान के रिश्तों पर अमरीकी छाया न पड़े, यह हमें देखना है और इसमें रूस हमारी मदद कर सकता है।

रूस ईरान का भी मित्र है और हमारा पुराना हितैषी तो है ही। प्रधानमंत्री मोदी जून में होने वाली शंघाई सहयोग संगठन और जुलाई में ब्रिक्स की बैठक में राष्ट्रपति पुतिन से मिलेंगे ही, लेकिन उससे पहले ऐसी अनौपचारिक मुलाकात का होना ठीक ही हुआ, क्योंकि पिछले कुछ समय से भारत की विदेश नीति में जो बदलाव आया है, उससे रूस के लिए बहुत अच्छे संकेत नहीं गए हैं। मोदीजी दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं। वे इजरायल का सगा भी दिखना चाहते हैं और फिलीस्तीन के सगे भी बने रहना चाहते हैं। वे अमेरिका को भी मित्र बताते हैं और रूस से पुरानी दोस्ती का हवाला भी देते हैं।

निजी तौर आप किसी भी वैश्विक नेता को नाम से बुलाने वाले या अचानक उसके घर पहुंच जाने वाले संबंध भले रखें, लेकिन जब देश की बात होती है तो कहीं कोई रेखा खींचनी ही पड़ती है, ताकि संतुलन बना रहे। अभी भारत के सामने संतुलन दिखाने की ही परीक्षा है। सीरिया और यूक्रेन के मसले पर अमेरिका और रूस में काफी तल्खी बढ़ी हुई है। रूस पर अमेरिका नए प्रतिबंध लगा सकता है और जो देश उसके साथ खुफिया व रक्षा संबंध रखते हैं, उन पर भी प्रतिबंध लगाने की धमकी दे रहा है। जबकि भारत तो रूस से बड़े रक्षा सौदे करता रहा है। अब हमारे सामने चुनौती है कि हम अमेरिका से डर कर, दब कर रहें या बिना झिझक के रूस से दोस्ती बनाएं रखें।

रूस से केवल पुरानी दोस्ती को बनाए रखना ही नहीं, आगे बचा कर रखना भी भारत के लिए जरूरी है। अभी पाकिस्तान और रूस के बीच रक्षा सौदे शुरु हो गए हैं, जो भारत के लिए तो कतई अच्छी बात नहीं है। अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-पाक मसले पर रूस ने हमेशा भारत का साथ दिया है। लेकिन अगर रूस और पाकिस्तान के बीच संबंध व्यापार से आगे बढ़ें तो भारत रूस को कैसे साधेगा, यह बड़ा सवाल है। 

बहरहाल, मोदीजी ने इस अनौपचारिक मुलाकात में बार-बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को याद किया और कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी और राष्ट्रपति पुतिन द्वारा बोये गये रणनीतिक साझेदारी  के बीज अब दोनों देशों के बीच विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी में तब्दील हो गये हैं। अगर वे पूरा इतिहास याद करें तो पाएंगे कि रूस के साथ हमारी यह घनिष्ठ और परखी हुई मित्रता नेहरूजी की देन है। अगर वे नेहरूजी की बनाई विदेश नीति पर चलें तो संतुलन साधने में भी उन्हें मदद मिलेगी।
 

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