By: Sabkikhabar
14-05-2018 06:40

राजस्थान में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालयों में आठवीं कक्षा की किताब में बाल गंगाधर तिलक को  'आतंकवाद का जनक' बताया जा रहा है। किताब की पेज संख्या 267 पर 18-19 वीं शताब्दी के राष्ट्रीय आंदोलन की घटनाएं शीर्षक से जुड़े पाठ में कहा गया है कि तिलक ने राष्ट्रीय आंदोलन में उग्र प्रदर्शन के पथ को अपनाया था और यही वजह है कि उन्हें आतंक का पितामह कहा जाता है। वह मानते थे कि अंग्रेजी हुकमरानों के सामने हाथ फैलाने और गिड़गिड़ाने से कुछ हासिल नहीं होगा। ऐसे में शिवाजी और गणपति उत्सव के सहारे तिलक ने देश में जागृति पैदा की।

स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा, ऐसा क्रांतिकारी नारा देने वाले तिलक को क्या सोच कर आतंक का जनक कहा गया, यह तो लेखक ही जाने। लेकिन जब इस मामले पर विवाद खड़ा हुआ तो सफाई सामने आई है। प्रकाशक इसे अनुवाद की गलती बता रहे हैं तो राजस्थान के शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी का कहना है कि यह मुख्य पाठ्यपुस्तक नहीं बल्कि संदर्भ पुस्तक है। वे यह भी कहते हैं कि तिलक का उद्देश्य अंग्रेजों के मन में आतंक का तात्पर्य मात्र भय उत्पन्न कर उन्हें देश से भगाना था। इस मुद्दे पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से फिलहाल कोई सफाई, स्पष्टीकरण, खेदप्रकट सामने नहींआया है।  

शायद इसलिए कि राजस्थान की राजनीति में तिलक से भाजपा को कोई लेना-देना न हो। वहां विधानसभा चुनाव तो होने हैं, उसके लिए जब रैलियां होंगी तो महाराणा प्रताप, अकबर, खिलजी, रानी पद्मिनी आदि के इतिहास और उस पर खड़े विवाद से ही भाजपा का काम चल जाएगा। जब महाराष्ट्र में चुनाव होंगे तब बाल गंगाधर तिलक का इतिहास खंगाला जाएगा। हमारे इतिहासविद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों से साबित कर देंगे कि तिलक महापुरूष थे, लेकिन नेहरू ने उनके साथ न्याय नहीं किया। वे चाहें तो यह भी कह दें कि तिलक को लोकमान्य की उपाधि भाजपा शासन में ही हासिल हुई है। कहने का आशय यह कि राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास के साथ छेड़छाड़ और तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत करने की एक परिपाटी सी चल पड़ी है और जनता उसे सामान्य भाव से स्वीकार रही है, यह बेहद खतरनाक है। 

इतिहास का मतलब अतीतजीवी होना नहीं है, बल्कि उसे देखकर भविष्य की नींव गढ़ने की तैयारी की जाती है। लेकिन जब हम इतिहास में अपना स्वार्थ, अपनी मर्जी चलाएंगे तो तय मानिए अपने भविष्य के लिए नींव नहीं कब्र खोदेंगे। तिलक क्या थे और आजादी की लड़ाई में उनका योगदान क्या था, यह बात कई प्रामाणिक किताबों में दर्ज है। पर एक जगह उन्हें आतंकवाद का जनक लिख दिया गया तो समझ लीजिए उनके योगदान को कमतर करने की कोशिशें शुरु हो गई हैं। अगर यह लेखक की गलती है तो उसकी मंशा पर सवाल उठने चाहिए और अगर अनुवादक की गलती है तो और सतर्क होना चाहिए कि अपने बच्चों को हम किस स्तर का ज्ञान दे रहे हंै। वैसे भी भारत में इतिहास को सही-सही जानने की दिलचस्पी बहुत कम लोगों में रह गई है, जिसका फायदा उठाकर सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारियां फैलाई जाती हैं।

हम शोध से ज्यादा सुनी-सुनाई बात पर भरोसा करते हैं और बात अगर प्रधानमंत्री कद का कोई आदमी कहे तो उसे पत्थर की लकीर भी मान लेते हैं। जैसे हाल ही में कर्नाटक की एक रैली में मोदीजी ने नेहरूजी पर झूठा आरोप मढ़ दिया कि वे भगत सिंह से जेल में मिलने नहीं गए थे। जबकि सच्चाई यह है कि नेहरूजी भगतसिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों से मिलने गए थे, उनकी दशा का मार्मिक वर्णन भी किया था। नेहरू और बोस, नेहरू और पटेल, नेहरू और अंबेडकर, ऐसे कई झूठे विवाद भाजपा और उसके सहयोगियों ने खड़े किए हैं और प्रधानमंत्री ने अपनी चुनावी सभाओं में कई बार इतिहास का गलत वर्णन किया है। ऐसा करके उन्हें शायद राजनीतिक फायदा मिलता होगा, लेकिन देश का नुकसान ही होता है।

इतिहास की अगर कोई बात आपको पसंद नहीं है, तो भी आप उसे बदल नहीं सकते हैं। लेकिन खेद है कि इस वक्त यह खतरनाक खेल खेला जा रहा है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे हिस्टाोरिकल डिनायलिज्म यानी ऐतिहासिक नकारवाद कहते हैं। फेक न्यूज इसका ही विस्तार है। एकाध बार अगर तथ्यों में गलती हो जाए, तो बात टाली जा सकती है। लेकिन लगातार ऐसा हो रहा है, तो इसे गंभीर बीमारी मानना चाहिए और इसका इलाज शुरु करना चाहिए। राजनीतिक दलों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एजेंडे हो सकते हैं, जिनके मुताबिक वे देश को चलाना चाहते हैं, लेकिन अगर ये अपना ऐतिहासिक एजेंडा देश पर थोपना चाहें तो जनता को इसका कड़ा विरोध करना चाहिए। जनता याद रखे कि यह देश और इसका इतिहास उसका अपना है, उसमें किसी को छेड़छाड़ की इजाजत वह न दे। 
 

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