By: Sabkikhabar
11-05-2018 07:11

सहारनपुर के पिछले जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि एक बार फिर उसे चोट पहुंचाई गई है। बीते बरस भी महाराणा प्रताप जयंती पर यहां जातीय हिंसा हुई थी,  और इस बार फिर यहां हिंसा के बाद तनाव का माहौल है। बुधवार को सहारनपुर के रामनगर में भीम आर्मी जिलाध्यक्ष कमल वालिया के छोटे भाई सचिन वालिया की संदिग्ध परिस्थितियों में गोली लगने से मौत हो गई। इसका आरोप महाराणा प्रताप जयंती मना रहे राजपूत समुदाय के कुछ युवकों पर लगाया गया है। पूरे इलाके में तनाव पसरा हुआ है और स्थिति को काबू में लाने के लिए सुरक्षा बल की तैनाती, इंटरनेट पर रोक जैसे उपाय किए जा रहे हैं।

मुमकिन है सचिन वालिया के दोषियों को कानून से सजा भी मिल जाए। लेकिन क्या इससे जातीयता के कारण समाज में बन चुकी खाई को पाटा जा सकेगा? क्या यह महज संयोग है कि जब कैराना में उपचुनाव होने वाले हैं, उसके पहले यह हिंसा भड़की है? अभी पिछले रविवार ही सोशल मीडिया पर खबर फैली कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद रावण कैराना उपचुनाव लड़नेे जा रहे हैं। बाद में यह बात अफवाह साबित हुई। यह भी गौरतलब है कि ऐसी अफवाह फैलाने का मकसद क्या है? क्या यह किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा है? याद रहे कि चंद्रशेखर को पिछले साल सहारनपुर हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था, उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा है, पिछले दिनों उन पर लगे एनएसए को तीन महीने के लिए बढ़ा दिया गया है।

क्यों कोई उभरता नेता सत्ताधीशों के लिए अचानक खतरा बनने लगता है, यह भी विचारणीय है। केेंद्र की मोदी और उत्तरप्रदेश की योगी सरकार यानी भाजपा सरकार चाहे जितने दावे कर ले, जो हकीकत है, वह नजर आ ही रही है। देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ा है और इसके साथ-साथ जातियों के बीच भी कट्टरता बढ़ गई है। मोदीजी दलितों को अपना बनाने के तमाम पैंतरें आजमा रहे हैं। आज भी कर्नाटक चुनाव प्रचार में उन्होंंने भाजपा के अजा, जजा कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। अंबेडकर, फुले जैसे दलित मसीहाओं को याद किया, और उनकी उपेक्षा का आरोप कांग्रेस पर लगाया।

योगीजी और उनके मंत्री दलितों के घर खाना खाने का प्रहसन रच रहे हैं। उमा भारती जैसे कुछ भाजपा नेता दलितों के घर खाना खाने की रणनीति पर सहमत नहीं हैं। इन सबके बीच दलित किस हाल में है, और सवर्ण तबका उसे लेकर क्या सोच रखता है, यह महाराणा प्रताप जयंती के बहाने जाहिर हो रहा है। बात अकेले उत्तरप्रदेश की नहीं है, देश की राजधानी नई दिल्ली में, केेंद्र सरकार की नाक के नीचे अकबर रोड के साइन बोर्ड पर महाराणा प्रताप का पोस्टर लगाया गया। यह काम किसने किया, इसका पता लगना बाकी है, लेकिन क्यों किया, यह बताने की शायद जरूरत नहीं है।

 इतिहास को वर्तमान संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करने की खतरनाक साजिश चल रही है। महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुए युद्ध को हिंदू-मुस्लिम युद्ध या धर्म की रक्षा के लिए किया गया युद्ध बताया जा रहा है। जबकि यह सब जानते हैं कि यह विशुद्ध राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित युद्ध था, जिसमें एकमात्र उद्देश्य साम्राज्य का विस्तार था। राणा प्रताप की सेना में हकीम खां सूर थे, तो अकबर की सेना में राजा मानसिंह। इस बात को प्रचारित करने की जगह यह क्यों बताया जाता है कि यह लड़ाई महाराणा प्रताप और अकबर के बीच थी। यह क्यों नहींबताया जाता कि इस लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम दोनों ओर थे? यह क्यों नहीं प्रचारित किया जाता कि महाराणा प्रताप को इस लड़ाई में आदिवासियों का साथ भी मिला था?

इतिहास, जो बातें घट गईं, उनका लेखा-जोखा है, इसमें अपने फायदे की बात निकालना और बाकियों को छोड़ देना, तात्कालिक लाभ तो दे सकता है, लेकिन इससे भविष्य का बिगड़ना तय है। जो लोग आज महाराणा प्रताप के समर्थक बने फिरते हैं या उनका गुणगान अपनी राजनीति चमकाने के लिए करते हैं, वे क्या सही अर्थों में महाराणा प्रताप की वीरता के साथ न्याय कर रहे हैं? 16वीं शताब्दी के महाराणा प्रताप को 21वीं सदी आते-आते कई बार याद किया गया है, लेकिन उनकी जयंती इस तरह बेकसूरों के लिए पुण्यतिथि नहीं बनी थी। अब ऐसा क्यों हो रहा है, सभ्य समाज को इस पर सोचना चाहिए। 
 

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