By: Sabkikhabar
10-05-2018 07:23

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का नोटिस नामंजूर करने के राज्यसभा सभापति के फैसले के विरोध में दायर याचिका को कांग्रेसी सांसद एवं वकील कपिल सिब्बल ने जिस तरह वापस लिया उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वह चाहते क्या हैं? उनकी ओर से जिस आधार पर यह याचिका वापस ली गई उससे तो यही लगता है कि वह या तो इस मसले को तूल देकर कोई संकीर्ण राजनीतिक हित साधना चाहते हैं या फिर इस कोशिश में हैं कि उनकी मनपसंद बेंच ही इस मामले की सुनवाई करे? आम तौर पर किसी भी याचिकाकर्ता की पहली कोशिश यह होती है कि उसकी सुनवाई जल्द से जल्द हो, लेकिन किन्हीं अबूझ कारणों से कपिल सिब्बल यह जानने पर अड़े कि पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किसने और किस आधार पर किया? यह जानने का औचित्य समझना इसलिए कठिन है, क्योंकि न तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस याचिका की सुनवाई करने वाली पीठ का हिस्सा थे और न ही वे चार वरिष्ठ न्यायाधीश जिन्होंने सार्वजनिक रूप से सामने आकर यह शिकायत की थी कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ सही नहीं। न्याय और नैतिकता का तकाजा यही कहता था कि इस याचिका की सुनवाई से मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ चार वरिष्ठ न्यायाधीश भी दूर रहें। ऐसी ही व्यवस्था की गई और सुप्रीम कोर्ट के छह से दस नंबर तक के पांच शीर्ष न्यायाधीशों को यह मामला सौंपा गया। जैसे यह जरूरी था कि हितों के टकराव से बचने के लिए मुख्य न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई से दूर रहें वैसे ही वे चार वरिष्ठ न्यायाधीश भी जिनकी शिकायत ही एक तरह से महाभियोग नोटिस का आधार बनी। आखिर इस सबसे कहीं भली तरह परिचित होने के बाद भी कपिल सिब्बल चार वरिष्ठ न्यायाधीशों में से एक से ही अपनी याचिका को सूचीबद्ध कराने पर क्यों अड़े?

मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत का झंडा बुलंद करने वाले न्यायाधीश से ही उनसे संबंधित याचिका को सूचीबद्ध करने को कहना हितों के टकराव से भी कहीं अधिक गंभीर बात है। महाभियोग सरीखे गंभीर मामले में तमाशा करने का जैसा काम किया गया उसकी मिसाल मिलना कठिन है। समझना कठिन है कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की अगुआई करने वाले कपिल सिब्बल उक्त याचिका पर बहस करने कैसे पहुंच गए? क्या यह हितों का एक और टकराव नहीं? अगर कपिल सिब्बल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य के साथ ही एक बड़े वकील हैं तो इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि उन्हें यह तय करने का अधिकार दे दिया जाए कि किस याचिका की सुनवाई कौन करे और कौन नहीं? उन्होंने याचिका वापस लेकर एक तरह से यह भी माहौल बनाया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ छह से लेकर दस नंबर तक के पांच शीर्ष न्यायाधीशों पर भी भरोसा नहीं? भले ही वह यह कह रहे हों कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की साख की परवाह है, लेकिन उनका आचरण ठीक इसके उलट है। इससे गंभीर बात और कोई नहीं हो सकती कि वरिष्ठ वकील ही सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा से जानबूझकर खिलवाड़ करते नजर आएं।

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