By: Sabkikhabar
09-05-2018 07:31

उत्तर प्रदेश का कोई भी पूर्व मुख्यमंत्री अब सरकारी बंगले में रहने का हकदार नहीं है। सरकारी बंगलों पर काबिज पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। एक गैरसरकारी संस्था लोकप्रहरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने यह फैसला दिया है। इससे पहले भी लोकप्रहरी की ही याचिका पर एक अगस्त 2016 को पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवासों के साथ ही ट्रस्टों, सोसायटीज व संस्थाओं को सरकारी संपत्तियों के आवंटन को अवैध ठहराया गया था। लेकिन तत्कालीन अखिलेश सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले बचाने के लिए कानून में संशोधन का फैसला लेते हुए 1981 के मूल अधिनियम में संशोधन करके नए विधेयक को पारित कराकर पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास आवंटन को कानूनी दर्जा दिया था। इसमें प्रावधान था कि प्रदेश के किसी पूर्व मुख्यमंत्री को उनके अनुरोध पर जीवनपर्यंत राज्य संपत्ति विभाग द्वारा निर्धारित मासिक किराये पर सरकारी आवास आवंटित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इसी कानून को रद्द कर दिया है।

समाजवादी पार्टी की सरकार ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंग्ला आबंटित करने के पक्ष में थी। लोकप्रहरी ने सुप्रीम कोर्ट में अगस्त 2017 में एक विशेष अनुमति याचिका दायर कर मांग की थी कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी खर्च पर इस तरह के बंगले देना गैरकानूनी है। जिस पर योगी सरकार ने जवाब दिया था कि पूर्व मुख्यमंत्री एक 'विशिष्ट वर्ग' के व्यक्ति होते हैं क्योंकि पद छोड़ने के बाद वे पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में जाने जाते हैं और उनके कुछ प्रोटोकॉल भी होते हैं,इसीलिए उन्हें सुविधाएं दी जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी पद छोड़ने के बाद कई सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए पूर्व मुख्यमंत्रियों को उम्र भर के लिए सरकारी आवास देने को गलत नहीं कहा जा सकता। 

यानी पार्टी और विचारधारा कोई भी हो, जब सरकारी सुख सुविधा लेने की बात आती है, तो सबके विचार एक जैसे हो जाते हैं। अच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट के विचारों में आम जनता के हितों को प्राथमिकता मिली हुई है। इसलिए उसकी गाढ़ी कमाई की बर्बादी पर उसने रोक लगाई है। गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को 1980 से आजीवन आवास सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। पूर्व मुख्यमंत्रियों को शहर के सबसे पॉश इलाके में, लंबी-चौड़ी जमीन पर बंग्ले दिए जाते हैं। राज्य संपत्ति विभाग इसके लिए सालाना बजट आवंटित करता है। इनके रखरखाव का जिम्मा सरकार का होता है, लाखों रूपए हर साल मरम्मत या सुविधाओं के नाम पर खर्च होते हैं, जबकि उनका किराया बेहद मामूली होता है। यह मान लिया जाए कि पूर्व मुख्यमंत्री 'विशिष्ट वर्ग' के होते हैं, या उन्हें सुरक्षा की जरूरत होती है, तो उन्हें सामान्य सरकारी आवास दिया जाना भी समझ में आता। लेकिन भव्य बंगलों की जरूरत इन्हें क्यों है?

अगर उन्हें राजसी ठाटबाट से रहने का शौक है, तो वे अपने खर्च पर उसे पूरा करें, जनता की कमाई पर ऐश करने को बिल्कुल न्यायोचित नहीं माना जा सकता। गरीब जनता को नारकीय स्थितियों में रहना पड़ता है, सरकारें जो आवास योजना बनाती हैं, उसमें एक कमरे के दड़बेनुमा घर रहने के लिए दिए जाते हैं, और बहुत से लोगों को तो वह भी नसीब नहीं होता। उत्तरप्रदेश की ही तरह बहुत से राज्यों में जनता के धन को इसी तरह पूर्व माननीयों पर बेरहमी से लुटाया जाता है। इस पर भी रोक लगनी चाहिए। सरकारी बंगलों, दफ्तरों, मंत्रालयों, सचिवालयों में भी जिस तरह सुख सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, वह भी चिंतनीय है। कहीं लाखों के बाथरूम बनाए जाते हैं, कहीं 24 घंटे एसी चलते हैं, कहीं करोड़ों रुपए चाय-पानी में ही खर्च हो जाते हैं।

सरकारी लोगों की सुविधाओं पर अरबों खर्च करने के बाद अगर जनता का जीवन स्तर सुधारने के ईमानदार प्रयास दिखाई देते, तब भी समझ में आता। लेकिन हिंदुस्तान में जहां नजर दौड़ाइए, छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए आम आदमी जूझता ही नजर आएगा। बिजली, पानी, सड़क, शौचालय इन सबका घोर अभाव है, केवल इसलिए कि सरकारों की नीयत साफ नहीं है। वो चाहती ही नहीं कि आम आदमी रोजमर्रा की तकलीफों से निजात पाए। जब तक वह पानी की कतार में खड़ा है, या टीन-टप्पर डालकर छत का इंतजाम कर रहा है, तब तक उसका ध्यान बाकी बातों की ओर जाएगा ही नहीं। वह यह भी नही ंदेख पाएगा कि जिस जमीन पर उसके लिए साफ-सुथरे, हवादार घर बन सकते थे, उस जमीन पर किसी माननीय का कब्जा हो गया है। अच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस ओर उचित फैसला लिया है। 
 

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