By: Sabkikhabar
03-05-2018 08:49

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यू एच ओ ने दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित 15 शहरों की सूची जारी की है, जिसमें पहले 14 शहर भारत के हैं और 15वां कुवैत का है। इन 14 शहरों में देश की राजधानी दिल्ली, आर्थिक राजधानी मुंबई और प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी है। मुंबई को शंघाई और वाराणसी को क्योटो बनाने का दावा क्या हुआ, यह सवाल तो अभी पूछना बेकार है, लेकिन सरकार से यह तो पूछा जाना चाहिए कि चार सालों में आपने कैसा स्वच्छता अभियान चलाया है कि दुनिया के सर्वाधिक गंदे शहर आपके देश में ही मिले हैं। अब क्या मोदीजी इसमें भी पंडित नेहरू और उनके खानदान का दोष ढूंढेगे? जनता को बताएंगे कि नेहरू-गांधी परिवार के लोग पेड़-पौधों से प्यार करते हैं, इंदिरा जी को वनस्पति शास्त्र का अच्छा ज्ञान था, वे कई पेड़-पौधों को उनके नाम और विशेषताओं के साथ पहचानती थीं और भाइयों-बहनों इस खानदान के पर्यावरण के लिए प्रेम के कारण ही प्रदूषण बढ़ा है।

मोदीजी चाहें तो राहुल गांधी को चैलेंज भी दे सकते हैं कि वे 15 मिनट में किसी भी भाषा में 15 पेड़ों के नाम गिना दें। आखिर बीते चार सालों में वे यही तो करते आए हैं। आते ही झाड़ू हाथ में थामकर फोटो खिंचाई कि देश को साफ करके दम लेंगे। देश से पुराने नोटों पर झाड़ू फेर दी। स्वच्छता अभियान के नाम पर टैक्स लगाकर लोगों की जेब थोड़ी और ढीली कर दी, नमामि गंगे परियोजना में करोड़ों बह गए, गंगा अब पहले से अधिक गंदी और प्रदूषित हो गई है, नर्मदा की यात्रा निकालने का भी कोई लाभ नहीं दिख रहा, कावेरी पर फैसला आने के बावजूद विवाद जारी है और इन सबके बीच हवा, पानी, मिट्टी सबका प्रदूषण बढ़ता जा रहा है।

डब्ल्यू एच ओ की रिपोर्ट मोदी सरकार के लिए आईना है, जिसमें वह अपने कामों का परिणाम देख सकती है। लेकिन इसे भाजपा सरकार की हठधर्मिता ही कहेंगे कि वह अपने चेहरे की धूल झाड़ने की जगह आईने को ही पोंछने में लगी रहती है, मानो इससे उसकी छवि स्वच्छ दिखेगी। कुछ बड़बोले नेता, मंत्री चाहें तो इस गंदगी के लिए वर्ग विशेष या प्रांत विशेष के लोगों को भी जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, क्योंकि ऐसा पहले हो चुका है। अपनी गंदगी घर से निकाल कर गली में डाल देना और फिर कहना कि मोहल्ला गंदा है, यही आदत तो है हमारे राजनेताओं और सरकारों की। जो हर चीज के लिए दूसरे को दोषी ठहराते हैं।

गंदगी की जड़ें कहां हैं, इस पर कोई ध्यान नहीं देता। एक दिन कुछ घंटों के लिए बिजली बंद करने या कुछेक शहरों में पालीथिन के इस्तेमाल को रोकने से गंदगी खत्म नहीं होगी। कुछ दिनों का आड-ईवन फार्मूला भी प्रदूषण का स्थायी समाधान नहीं होगा। स्वच्छता के लिए मैराथन दौड़ कर भी हम कहां पहुंचे हैं, यह देख लीजिए। दरअसल यह सब कार्पोरेट और पूंजीवादी व्यवस्था के ढकोसले हैं, जो खुद आर्गेनिक फूड खाना चाहते हैं, लेकिन गरीब के लिए साफ पानी, साफ हवा मुहैया हो, यह उन्हें खटकता है। स्वच्छता के अपने ढोंग को आगे बढ़ाने के लिए सरकार और पंूजीपति आध्यात्म का सहारा भी बखूबी लेते हैं। 

याद करें आर्ट आफ लिविंग का यमुना किनारे किया गया भव्य कार्यक्रम, जिसमें कई किसानों की खेती उजड़ गई, पर्यावरण का भारी नुकसान हुआ, एनजीटी को दखल देना पड़ा, लेकिन जीने की कला पर कोई संकट नहीं आया। इसी तरह ईशा फाउंंडेशन के जग्गी वासुदेव ने रैली फार रिवर निकाली। कई बड़े नेता उनके समर्थन में आगे आए। कई हफ्तों तक मिस्ड काल देकर इस मुहिम को समर्थन देने का नाटक भी चला। इन

सद्गुरू पर आरोप है कि कोयबंटूर में ईशा फाउंडेशन का आश्रम रिजर्व फारेस्ट क्षेत्र में बनाया गया है। इन्हीं सद्गुरू के साथ कोयबंटूर में आदिशिव की 112 फीट ऊंची मूर्ति का अनावरण प्रधानमंत्री मोदी ने किया। मोदीजी ने मुंबई में समुंदर में छत्रपति शिवाजी की 312 फीट ऊंची मूर्ति की आधारशिला भी रखी थी। क्या ऐसी भव्य मूर्तियों, कार्पोरेट प्रायोजित मैराथन या खर्चीली परियोजनाओं से पर्यावरण स्वच्छ रखा जा सकता है?

अगर ऐसा होता तो देश इतना गंदा नहीं होता। अदालत को ताजमहल का रंग बदलने पर सवाल उठाना पड़ रहा है, महाकाल में अभिषेक के लिए आरओ वाटर के इस्तेमाल का नियम बनाना पड़ रहा है, अमरनाथ यात्रा पर जयकारों के शोर के बारे में सचेत करना पड़ रहा है, और सरकार है कि अब भी स्वच्छ भारत अभियान का ढोल पीट रही है। सरकार न आप अपनी विरासत को संभाल पा रहे हैं, न धार्मिक स्थलों को प्रदूषण की मार से बचा रहे हैं, न आम जनता को साफ पानी और हवा का हक दे रहे हैं, तो क्या आपका सारा ध्यान उद्योगपतियों की बरकत पर लगा हुआ है, जो जल, जंगल, जमीन सब पर अपना हक जमा रहे हैं, विकास के नाम पर गंदगी दे रहे हैं और दुनिया में नाम भारत का खराब हो रहा है। कैसे कामदार हैं आप, देश को साफ करने के लिए कुछ तो सही करिए। 
 

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