By: Sabkikhabar
30-04-2018 08:43

भाजपा सरकार के पास अब कुछ बचा नहीं जिससे जनता को भरमाये। बच्चा जब खूब रोता है और मां के पास उसकी भूख मिटाने कुछ नहीं रहता तो मां बच्चे का अंगूठा उसके मुंह में दे देती है- बच्चा अंगूठा चूसते-चूसते सो जाता है। भाजपा सरकार भी इसी गुंताड़े में लगी है। अब आगे अगले ही साल चुनाव होगें... जनता को भरमाने के लिए भाजपा सरकार नये-नये तरकीब निकाल रही है। कई बार जनता शांत दिखती है लेकिन समय पर बड़ा निर्णय ले लेती है।

केन्द्र की भाजपा सरकार के पास अब जनता को देने के लिए कुछ भी नहीं है- आश्वासनों का पिटारा खाली हो चुका। जुमलेबाजी भी जरूरत से ज्यादा हो गई। भाजपा सरकार पूरी तरह फेल हो गई- हां न्यूज चैनल्स में भाजपा के प्रवक्ता अपनी सरकार को पास का प्रमाण पत्र देते रहे। भारतीय लोकतांत्रिक सरकारों के इतिहास में शायद मोदीजी के नेतृत्व वाली यह सरकार एकमात्र ऐसी हो जिस पर 5 साल पूरा होने से पूर्व ही जनता का विश्वास डिग गया है। वैसे अटलजी की सरकार 5 साल से आगे नहीं चल सकी थी, लेकिन अटलजी की सरकार और मोदी जी की सरकार में एक बड़ा फर्क यह है कि अटलजी की सरकार संयोग की सरकार थी वह कोई बड़े-बड़े वायदे करके नहीं आई थी सत्ता में। सत्ता में आने के बाद 'शायनिंग इंडिया' की झूठी चमक दिखाने लगी थी। अत: कोई अटलजी की सरकार अन्य कारणों से गई थी। लेकिन मोदी जी ने चुनाव पूर्व ही ढेरों मनमोहक वायदे किए इतने कि गिनती तक नहीं की जा सकती। अब तो भाजपा अध्यक्ष उन्हें 'चुनावी जुमले' कहने लगे हैं। मोदी जी की सरकार को लेकर जनता में घोर निराशा है- न्यूज चैनल्स में सब हरा-हरा दिखाई देता है। लेकिन बात एकदम अलग है। इस सरकार से जनता के बड़े हिस्से का मोह भंग हो गया है- एक कहावत है कि ऊपर की टीमटाम। अंदर की जाने राम...।। वर्तमान भाजपा सरकार पर कहावत एकदम फिट बैठती है। 

भाजपा सरकार के पास अब कुछ बचा नहीं जिससे जनता को भरमाये। बच्चा जब खूब रोता है और मां के पास उसकी भूख मिटाने कुछ नहीं रहता तो मां बच्चे का अंगूठा उसके मुंह में दे देती है- बच्चा अंगूठा चूसते-चूसते सो जाता है। भाजपा सरकार भी इसी गुंताड़े में लगी है। अब आगे अगले ही साल चुनाव होगें... जनता को भरमाने के लिए भाजपा सरकार नये-नये तरकीब निकाल रही है। कई बार जनता शांत दिखती है लेकिन समय पर बड़ा निर्णय ले लेती है।

बच्चे की भूख मिटाने के लिए मां के पास कुछ नहीं होता- बच्चा रोते जाता है तो मां कई करतब करती है- चूल्हे पर खाली पानी की बटलोही चढ़ा देती है और बच्चे से कहती है कि जल्दी खाना पकेगा। कभी चंदामामा की तरफ ऊंगली दिखाकर बच्चे का मन बहलाने की कोशिश करती है तो कभी झूला झुलाने लगती है। घर में एक दाना नहीं है, लेकिन बच्चे को कहती है कि मुन्ना के लिए मीठी खीर बना रही हैं। भाजपा सरकार भी देश की जनता को भरमाती रही है। शुरू के तीन साल तो जनता भरम में पड़ गई। एक मजेदार बात यह कि जब कांग्रेस नीत यूपीए सरकार 2014 में हारी और भाजपा सत्ता में आई तो बिल्ली के भाग से सींका टूटा की तर्ज पर पेट्रोल के दाम कुछ कम हुए लेकिन अन्य वस्तुओं के दाम बढ़ रहे थे।

न्यूज चैनल्स पर महंगाई को लेकर चर्चा होती तो भाजपा प्रवक्ता पेट्रोल के दाम कम होने की बात करते- अब नहीं करते क्योंकि पेट्रोल-डी•ाल के दाम बेतहाशा बढ़े हैं। जब कांग्रेस नीत यूपीए-2 के समय पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते तो भाजपा आसमान सर पर उठा लेती- कांग्रेस सरकार का सांस लेना मुश्किल कर रखा था। अब चुप है। यह भी सोचनीय है कि कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल भी पेट्रोल-डीजल के बढ़े दाम पर बोल नहीं रहे। आंदोलन करने की तो बात ही अलग। लगता है डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ना विपक्ष के लिए कोई मायने नहीं रखता। यह भी हो सकता है कि पेट्रोल-डीजल के बढ़े दाम के बीच जनता ने जीवन चलाना सीख लिया हो। यह जीवन व्यवहार का एक हिस्सा बन गया हो- अत: जनता भी खामोश है। जिन्हें बोलना चाहिए वे चुप हैं और जो बढ़े दाम का दर्द सह रहे हैं वे 'का करी-कहां जाई...' की स्थिति में आ गए हैं। उनकी आवाज बनने वाले संगठन ही शांत है। वे मानकर चल रहे हैं कि यह तो होते रहेगा- 2014 के चुनाव के समय भाजपा नारे लगाती- 'नहीं सहेंगे महंगाई की मार। अबकी बार भाजपा सरकार...।' और जनता इस लुभावने नारे में बह गई।

2014 के चुनाव सभाओं में मोदी जी कहते रहे कि 2 करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष देंगे। अब रोजगार-नौकरी की क्या-क्या परिभाषाएं गढ़ रहे हैं। एक नया जुमला दिया कि युवा नौकरी करने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बने। यह नारा समझ से परे है- कैसे बने नौकरी देने वाले हो और सभी नौकरी देने वाले हो जाएं तो नौकरी कौन करेगा- काम कौन करेगा? 

सारे तो मालिक हो गए। कामगार तो कोई नहीं। कितना मनगढ़ंत नारा दिया। और नौकरी की बात निकलने पर स्वरोजगार की बात करने लगते हैं। लोग स्वरोजगार कर रहे- कौशल शिक्षा की बात उठाते हैं। जबकि वास्तविकता यह है अपने देश में 90 प्रतिशत से अधिक लोग पुरुष-महिला तो स्वरोजगार ही लगे हैं। संगठित क्षेत्र में तो 8-10 करोड़ ही लगे होंगे। अपना देश बहुत ही उद्यमी लोगों का देश है। यहां लोग जरा में हरिया जाते हैं। धान का पौधा देखा है- पानी नहीं बरसता तो धान पिरिया जाता है, सूखे पपड़ी पड़े खेत की मिट्टी में हवा से इधर-उधर डोलता है।

किसान दुखी होता है कि अब की अकाल है। लेकिन पानी गिरा कि वहीं धान के पौधे हरिया जाते हैं- हवा के झोंके के साथ प्रसन्न होकर नृत्य-सा करने लगते हैं। किसान की आशा जरा में हरिया जाती है। भारत की जनता भी 2014 में भाजपा के सुनहरे नारों से हरिया गई लेकिन धोखे में आ गई। मोदीजी प्राय: हर चुनाव सभा में कहते कि विदेशों जमा काला धन वापस लाएंगे- हर भारतीय के बैंक खाते में 15-15 लाख जमा हो जाएंगे। पता नहीं और क्या-क्या वायदे किए, जनता अभिभूत होती गई। एक तरह का भ्रम की चादर डाल दी गई थी- जनता को लग रहा था कि अब ''अच्छे दिन'' आएंगे और जनता के भाजपा को गद्दी सौंप दी। 

अब सारी स्थिति सामने है। जनता त्रस्त है। ऐसी अराजकता आ•ाादी के बाद देश में कभी नहीं रही। ऐसा भय का वातावरण भी नहीं रहा। जो उनके मत से सहमत नहीं वे उन्हें पाकिस्तान जाने का हुक्म-सा सुनाया जाता है। बहुत ही अराजक स्थिति है। भ्रष्टाचार भी हो रहा है-  आर्थिक मंदी पर चर्चा नहीं होती-गैर जरूरी सवालों पर चर्चा कराई जाती रही है। देश में हिन्दू-मुस्लिम ही मानो एकमात्र विषय हों। संविधान में संशोधन की ओर इशारा किया जाता है। आरक्षण को लेकर देश में भ्रम की स्थिति जानबूझ कर पैदा कर दी गई है। यहां भाजपा सरकार बड़ा व चालाकी भरा दांव खेल रही है, एक तरफ आरक्षण कायम रखने के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाती है तो दूसरी ओर उसी से जुड़े लोग आरक्षण समाप्त करने आवाज उठाते हैं। सरकारी क्षेत्र में प्रायमरी शिक्षा की दुर्दशा कर दी गई है- नियमित शिक्षक नहीं हैं।

एक तरह से निजी स्कूलों में जाना अनिवार्य सा किया जा रहा है कॉलेज को स्वायत्तता देने के पीछे गरीबों को शिक्षा से वंचित रखना ही होगा क्योंकि फीस स्ट्रक्चर में स्वायत्त शिक्षण संस्थाएं स्वत: निर्णय लेंगी। आज हर काम ठेके पर कराया जा रहा है। इससे एक तो आर्थिक शक्ति का केन्द्रीयकरण हो रहा है। जनता के हस्तक्षेप पर एक तरह से रोक लग रही है और सबसे बड़ी बात यह कि आरक्षण खत्म हो रहा है क्योंकि निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है। इस तरह गरीब हर क्षेत्र में परेशानी का सामना करने विवश हो रहा है। यह सरकार जनता की शक्ति को इतना पंगु बना देना चाहती है कि वह केवल वोट देने के दिन ही निकले। रेल में बड़ी ठग विद्या चल रही है।

प्लेटफार्म टिकिट तो बढ़ा दी गयी- अब तत्काल व आनलाईन रिजर्वेशन व उसके कैंशिलेशन को लेकर भाजपा सरकार ने ऐसे नियम बना दिए हैं कि भुगतना ही हैें। जनता को उनके जरूरी सरोकारों से ध्यान हटाकर गैरजरूरी बातों पर ध्यान केन्द्रित करने में अपने मकसद में सफलता पा ली है। आर्थिक बातों पर चर्चा ही नहीं की जा रही। धीरे-धीरे सारा आर्थिक व्यवहार निजी क्षेत्र को सौंप दिये जाने की ओर सरकार के कदम बढ़ रहे हैं। ऐसी स्थिति पहले नहीं थी। करों (टैक्स) का ऐसा मायाजाल फैला दिया गया है कि टैक्स पर बातें होती हैं, व्यापार पर बात के लिए समय नहीं रह गया।

आर्थिक मोर्चे पर सरकार पूरी तरह फेल हो गई है- यह तो पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा (वे एनडीए सरकार में वित्त मंत्री रहे और भाजपा के नेता भी) कह चुके हैं, आर्थिक मोर्चे पर सरकार की बुरी तरह असफलता व गलत नीतियों से क्षुब्ध होकर यशवंत सिन्हा ने भाजपा ही छोड़ दी। यशवंत सिन्हा जब एनडीए सरकार (अटल जी की सरकार) में वित्तमंत्री बने तो उन्होंने स्वीकार किया था कि वे आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण पर खड़े हैं। पहला चरण डॉ. मनमोहन सिंह ने शुरू किया था। यशवंत सिन्हा आर्थिक सुधारों के विशेषज्ञ हैं और आर्थिक सुधारों  को वैश्विक पूंजीवाद की ''सही मांग'' के अनुरूप ढालने के पक्षधर रहे हैं- वे पूंजीवादी आर्थिक सुधारों के महाज्ञाता हैं।

वर्तमान सरकार की ढुलमुल नीतियों के कारण आर्थिक सुधारों का आधा-अधूरा कदम आर्थिक रूप से सरकार व देश को जर्जर कर रहा है। यह वे देखते रहे और बीच-बीच में इस पर अपनी पार्टी को संकेत भी दिया। लेकिन मोदी जी व जेटली जी ने जिस हड़बड़ी में नोटबंदी का कदम उठाया उसने व्यापार-उद्योग व आमजन की कमर ही तोड़ दी- आर्थिक सुधारों की बात एक कोने में डाल दी गई। अपने गलत कदम को सही साबित करने के लिए प्रधानमंत्री व जेटली जी लगातार तर्कजाल गढ़ते रहे। लेकिन तर्क गढ़ने से तो आर्थिक सुधार का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता- उधर दाद में खुजली की तरह नोटबंदी के बाद जीएसटी ने व्यापार जगत को हिलाकर रख दिया- आज भी इसका गोरखधंधा समझ से परे माना जाता है।

आर्थिक हालत का सत्यानाश होना बचा था जिसे इस साल बैंकों में नोटों की कमी ने पूरा कर दिया- शायद आजादी  के बाद पहली बार हुआ कि बैंकों में नोट ही नहीं थे। आम लोग नोटबंदी के समय की परेशानी में रहे अब फिर पड़े- अपना रुपया निकालने भटकते रहे। यह भी पहली बार हुआ कि रिजर्व बैंक व वित्त सचिव जनता को बताएं कि नोटों की छपाई युद्ध स्तर पर चल रही है। इस तरह वित्तीय प्रबंधन में वर्तमान सरकार एकदम असफल रही है- वित्तमंत्री अपने ही कदमों को जस्टीफाय नहीं कर पा रहे- गोल-मोल जवाब देना समस्या का हल नहीं है। इस तरह वर्तमान सरकार अपने हर कार्य क्षेत्र में फेल रही और थोथा चना, बाजे घना की स्थिति को पहुंच गई है। हालत बहुत ही सोचनीय है। 
 

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