By: Sabkikhabar
27-04-2018 07:36

उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में एक स्कूल बस मानवरहित रेलवे क्रासिंग पार करते वक्त ट्रेन से टकरा गई, जिसमें 13 बच्चों की मौत हो गई। कुशीनगर के डिवाइन मिशन स्कूल में पढ़ने वाले ये बच्चे सरकारी लापरवाही का शिकार न हुए होते, तो सचमुच बड़े होकर कुछ डिवाइन यानी दैवीय कहलाने वाले भले कामों में लगते। लेकिन अब तो केवल दैवीय शक्तियों से प्रार्थना ही की जा सकती है कि उनकी आत्मा को शांति मिले।

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख के मुआवजे का ऐलान कर ढांढस बंधाने की कोशिश की है, रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भी 2-2 लाख के मुआवजे की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी निभा दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो अपना भाषण बीच में रोककर इस घटना पर दुख जताया और कहा कि भगवान इस कठिन परिस्थिति में उन माता-पिता को हौसला दे, जिन्होंने अपना बच्चा खोया है। सही कहा मोदीजी ने, मां-बाप के पास हौसला रखने और भगवान भरोसे रहने के अलावा और रह ही क्या गया है? और केवल कुशीनगर क्यों पूरे भारत में आम जनता भगवान भरोसे ही तो रह गई है।

सरकार बहादुर तो चुनाव जीतने और विरोधी पार्टियों से हिसाब-किताब चुकता करने में लगे हैं। देश में किस-किस तरह की विडंबनाओं से आम आदमी दो-चार हो रहा है, उसकी फिक्र उन्हें नहीं है। सारी बातें, सारे वादे, सारे दावे केवल चुनाव केन्द्रित हो गए हैं, मानो इसी के लिए वे इस दुनिया में अवतरित हुए हैं। पुरानी सरकारों के फैसलों को उलटने-पलटने में अपनी बहादुरी समझने वाली मौजूदा सरकार ने इस बात की समीक्षा शायद ही कभी की हो कि उसके फैसलों का व्यापक असर किस तरह से हुआ है। आम बजट और रेल बजट को मिला दिया, लेकिन क्या इससे रेलवे की हालत सुधर गई। ट्रेनों में साधारण तबका मजबूरी में सफर करता है, क्योंकि चार्टर्ड प्लेन या हेलीकाप्टर तो उसके सपनों में भी दूर की कौड़ी है। आम आदमी की इस मजबूरी का फायदा सरकार खूब उठाती है।

किराए मनमाने तरीके से तय होते हैं, ट्रेनों में सुविधाएं मनमाने ढंग से दी जाती हैं और अब तो प्लेटफार्म संख्या भी शायद मनमर्जी से तय होने लगी है। इस सप्ताह की शुरुआत में ही लखनऊ-कानपुर रूट के हरौनी स्टेशन पर अचानक कानपुर से लखनऊ आने वाली ट्रेन का प्लेटफार्म बदलने की घोषणा हुई। प्लेटफार्म नंबर तीन पर खड़े यात्रियों में प्लेटफार्म नंबर चार पर जाने की भगदड़ मच गई। इस अफरा-तफरी में एक पच्चीस साल के युवक की मौत हो गई और दो व्यक्ति घायल हो गए। यह कोई पहली घटना नहीं है, जब अचानक ट्रेन का प्लेटफार्म बदल दिया गया हो।

लखनऊ कैैंट स्टेशन पर इसी हफ्ते 72 घंटों में 19 ट्रेनों के प्लेटफार्म अचानक बदले गए। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 21 अप्रैल से 23 अप्रैल के बीच 8 ट्रेनों के प्लेटफार्म बदले गए। जिससे यात्रियों में अफरा-तफरी तो मची, लेकिन कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई। शायद व्यवस्था सुधारने के लिए सरकार को और बहुत हद तक जनता को भी बड़ी दुर्घटनाओं का इंतजार रहता है। जब हम अपनों को खोते हैं, या अपने सामने कोई बड़ा हादसा देखते हैं, तभी हमारे भीतर असंतोष या आक्रोश जागता है। अन्यथा हम अपने सुविधा के खोलों के भीतर दुबके रहते हैं। 

कुशीनगर में आज जैसा हादसा हुआ है, 2016 में भदोही में हुआ था। तब 8 स्कूली बच्चे मारे गए थे। तब भी दुख प्रकट करने, सांत्वना देने की औपचारिकता पूरी की गई थी। लेकिन दो साल में केवल हादसे की जगह और मृतकों की संख्या बदली है, हालात नहीं। कुशीनगर की घटना में बस चालक की लापरवाही बतलाई जा रही है, कि उसने ईयरफोन लगाए हुए थे और इस वजह से ट्रेन की आवाज नहीं सुन सका। मोबाइल पर बात करने, गाने सुनने या सेल्फी लेने के चक्कर में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं पर सरकार ने अब तक कोई सख्ती नहीं दिखाई है, क्योंकि इससे उसकी चुनावी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन लोगों को तो कम से कम अपनी सेहत, अपनी जान की परवाह करनी चाहिए।

कुशीनगर में 13 बच्चे ड्रायवर, प्रशासन और सरकार की लापरवाही के कारण मारे गए। इधर दिल्ली में भी सुबह एक स्कूल वैन दूसरी गाड़ी से टकराकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई और इसमें सवार बच्चे बुरी तरह घायल हुए हैं। इस घटना के बाद भी लोग गुस्सा दिखाने सड़क पर उतर आए। बुरी बातें पर गुस्सा करना जायज है, लेकिन यह नाराजगी क्षणिक या परिस्थितियों के हिसाब से क्यों होती है? क्यों नहीं जनता को अपनी शक्ति का प्रदर्शन सार्थक तरीके से करना चाहिए ताकि सरकारें और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी को निभाने के लिए मजबूर हों। आम जनता के जीवन से खिलवाड़ कर मुआवजे बांटने का ढोंग अब बंद होना ही चाहिए। 
 

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