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आश्रमों में मासूमों का शिकार

By Sabkikhabar :26-04-2018 07:29


नाबालिग से बलात्कार मामले में आसाराम दोषी पाया गया है। उसके साथ उसके छिंदवाड़ा आश्रम का डायरेक्टर शरतचंद्र और वहां की वार्डन शिल्पी को भी जोधपुर की अदालत ने दोषी करार दिया है। आसाराम को उम्रकैद की सजा मिली है, जबकि शरतचंद्र और शिल्पी को 20 -20 साल की सजा सुनाई गयी है। आसाराम पर आरोप था कि जोधपुर के निकट मनाई आश्रम में इलाज के लिए लायी गई 16 बरस की नाबालिग का उसने बलात्कार किया था। दरअसल लड़की के माता-पिता आसाराम के भक्त थे और उसे इलाज के लिए वहां लेकर गए थे।

कठुआ में मंदिर में हुए गैंगरेप से संवेदनशील समाज स्तब्ध रह गया और सवाल उठाए जाने लगे कि देवी के स्थान पर ऐसा घिनौना अपराध कैसे किया जा सकता है? लेकिन आसाराम से लेकर, रामरहीम, नित्यानंद, रामपाल, वीरेंद्र देव दीक्षित जैसे दर्जनों बाबाओं ने अपराध के लिए धर्म को ही सबसे आसान माध्यम माना। और कमजोर तबके की, महिलाओं, नाबालिग लड़कियों को अपना शिकार बनाया। प्राचीन भारत की गौरवगाथा करते वक्त गुरु-शिष्य परंपरा, आश्रमों आदि का बखान हम बड़े गर्व से करते हैं। लेकिन आज इन ढोंगी साधु-संतों ने आश्रमों को मोगैंबो और शाकाल के अड्डों से भी भयावह जगह बना दी है।

फिल्मों के इन खलनायकों के बारे में तो पता था कि ये बुरे लोग हैं, लेकिन बलात्कारी बाबाओं के बारे में पता होने के बाद भी उन्हें बचाने की कुटिल चालें चली जाती रहीं। इन तमाम बाबाओं को सत्ता का भरपूर संरक्षण हासिल रहा। मुख्यमंत्रियों से लेकर, कद्दावर नेता जब इन फर्जी संतों के आगे सिर झुकाएं तो भला जनता उनसे प्रभावित क्यों न होगी। यही कारण है कि राम रहीम या रामपाल की गिरफ्तारी में पुलिस-प्रशासन को अड़चनें आईं। अभी आसाराम पर फैसला आने के पहले भी किसी भी किस्म की अराजकता से बचने के लिए जोधपुर को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। बलात्कार पीड़िताओं के लिए भले दो आंसू न ढलकें, लेकिन इन ढोंगी बाबाओं के लिए भक्त जैसे प्राण न्यौछावर करने तैयार रहते हैं, उसे देखकर लगता है कि आखिर किस तरह के कपटी, बनावटी समाज में हम रह रहे हैं। और हमारी राजनीति कितनी गलित हो चुकी है। 

बीते चार सालों में भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की जी-तोड़ कोशिश की गई है। लेकिन इन चार सालों में फर्जी बाबाओं के बारे में निंदा के कितने शब्द हिंदुत्व के रक्षकों ने कहे हैं? आखिर अधर्मियों को बचाकर कौन से धर्म की रक्षा की जा सकती है? बात करें आसाराम की, तो उसके पैरों पर झुकने वालों में कई कद्दावर नेता रहे हैं, जो आज रसूखदार पदों पर रहे हैं। सत्ता में बैठे लोगों के सहारे ही आसाराम ने देश के कई राज्यों में जमीनें हड़पीं या जबरन दान में ले ली। विदेशों में भी संपत्ति बनाई। और इन जमीनों पर बने आश्रमों में न जाने कितने किस्म के गैरकानूनी कामों को अंजाम दिया। अगर कुछ पीड़िताएं जान जोखिम में डालकर आसाराम के खिलाफ आवाज न उठातीं तो न जाने कितनी और बच्चियां, युवतियां, महिलाएं उसके आश्रमों में शिकार बनतीं। दरअसल आस्था के नाम पर आसाराम जैसे ठगों ने भारत की जनता का खूब शोषण किया है।

राजनेता भी शायद ऐसा ही चाहते हैं कि जनता की धर्मभीरूता का फायदा उठाते रहें, ताकि उनकी दुकानदारी चलती रही। इसलिए जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन जैसी सुविधाओं से वंचित रखने के नित नए षड्यंत्र हो रहे हैं। कहने को भारत में लोककल्याणकारी सरकार है, लेकिन उसकी नीतियां, योजनाएं चंद बड़े व्यापारिक घरानों के लिए फायदेमंद होती है और शेष जनता को ये लोग खैरात बांटते हैं। दो-तीन रुपए में राशन देकर या थोड़ा बहुत दवाइयां मुफ्त में बंटवाकर ढोल पीटते हैं कि जनता को इतने करोड़ की सौगात दी। अरे भाई, जनता का पैसा आप जनता पर ही खर्च करें तो इसमें वाहवाही किस बाात की है। कई तरह के सुखों-सुविधाओं से वंचित जनता थोड़ी राहत पाने के लिए धर्म की शरण में जाती है और अंधश्रद्धा का शिकार बनती है। आसाराम किस्म के लोग इस अंधश्रद्धा का पूरा लाभ उठाते हैं। अगर जनता को वैज्ञानिक चेतना से संपन्न किया जाए। उसे अपना हक पाने के लिए जागरूक किया जाए। तो शायद उसका शोषण बंद हो। लेकिन फिर अधर्म का व्यापार चौपट हो जाएगा।

विद्यार्थी उत्तीर्ण होने की चिंता में पढ़ाई से ज्यादा पूजा करने में मन लगाता है। गृहणियां पुत्र की इच्छा के लिए व्रत करती है। बेरोजगार नौकरी पाने के लिए टोटके आजमाता है। अगर सरकार इन्हें सामाजिक समस्या मानती तो ऐसी अंधश्रद्धा खत्म होती। लेकिन सरकार फिलहाल महाभारत काल में इंटरनेट और महामानवों की खोज को बढ़ावा देने में लगी है। इन हालात में एक आसाराम को सजा मिल भी गई, तो क्या सैकड़ों अभी अपने आश्रमों में मासूमों का शिकार करने तैयार बैठे हैं। 
 

Source:Agency