By: Sabkikhabar
25-04-2018 07:41

भारत में इस वक्त तेल में लगी आग की तपिश महसूस की जा सकती है। पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं और उन पर अंकुश लगाने की सरकार की नीयत फिलहाल नहीं दिख रही है। अभी अप्रैल में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16वें इंटरनेशनल एनर्जी फोरम के मंत्री स्तर की बैठक में कहा कि बेवजह तेल की कीमतें बढ़ाने से आयातक देशों की मुसीबतें काफी बढ़ जाएंगी। उन्होंंने इशारों-इशारों में ही ओपेक को चेताया भी दुनिया में सभी को सस्ती ऊर्जा मुहैया कराने के लिए जरूरी है कि तेल कीमतों पर जिम्मेदाराना रवैया अपनाया जाए। श्री मोदी ने कहा कि दुनिया पिछले काफी वक्त से तेल कीमतों के भारी उतार-चढ़ाव से जूझ रही है। हमें ऐसी कीमतें तय करनी होगी जिससे तेल उपभोक्ता और उत्पादक दोनों देशों को फायदा हो।

भारत के लोग तो मोदीजी का प्रवचन सुन लेंगे, लेकिन ओपेक देश उनकी नसीहत किसलिए सुनेंगे? वैसे मोदीजी ये बात अच्छे से जानते हैं कि तेल की कीमतों पर भारत सरकार का नियंत्रण एक हद तक ही है, और उसे निर्यातक देशों की मर्जी माननी ही होगी। फिर क्यों उन्होंने 2014 के चुनाव में भारत की जनता को मूर्ख बनाया। याद करें अपनी चुनावी रैलियों में नरेन्द्र मोदी तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर यूपीए की कड़ी आलोचना करते थे। इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपये के लिए भी वे पिछली कांग्रेस सरकारों को कोसते थे। एक रैली में उन्होंने डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत का ग्राफ बताते हुए कहा था कि कांग्रेस ने जब पहली बार सरकार बनाई तो तब तक मामला 42 रुपये तक पहुंच गया था। लेकिन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कालखंड में ये साठ रुपये में पहुंच गया है। उनकी ऐसी बातें सुनकर जनता को लगता था कि तेल की कीमतें जानबूझ कर बढ़ाई गई हैं और भारतीय रुपए को भी कांग्रेस ने कमजोर कर दिया है। हकीकत यह है कि चाहे तेल की कीमत हो, या रुपए का अवमूल्यन, यह बहुत कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही तय होता है।

इसका गणित दो और दो चार जैसा सरल नहीं होता, लेकिन मोदीजी ने इसका अतिसरलीकरण किया और जनता को लुभाकर सत्ता हासिल भी कर ली। अब आज जो स्थिति है, वह सब देख रहे हैं। रुपए की कीमत एक डालर के मुकाबले 67 रुपए तक जा पहुंची है और सीरिया संकट, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध, तेल उत्पादक देशों यानी ओपेक के उत्पादन में कटौती के फैसले आदि के कारण तेल की कीमत भी पिछले 55 महीनों में सबसे ज्यादा है। यूं तो अंततराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने से सभी देश प्रभावित होते हैं, लेकिन बात करें दक्षिण एशियाई देशों की तो इनमें भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सबसे अधिक हैं। इसकी एक वजह तरह-तरह के टैक्स हैं। केेंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती है, तो राज्य सरकारें वैट लगाती हैं। फिलहाल केेंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी हटाने से साफ इंकार कर दिया है, क्योंकि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा।

मौजूदा वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 प्रतिशत तक नियंत्रित करने का सरकार का लक्ष्य है। पिछली बार यह 3.5 प्रतिशत था। अगर सरकार पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को एक रुपए भी घटाती है, तो उसे 13 हजार करोड़ रुपयों का नुकसान होगा। जबकि उसका मानना है कि एक-दो रुपयों का अतिरिक्त बोझ उठाने में उपभोक्ताओं को कोई दिक्कत नहीं होगी। आपकी यह बात भी जनता मान लेगी सरकार, लेकिन आप उसे बरगलाना कब छोड़ेंगे?  

पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त करने समय तर्क दिया गया था कि इससे उपभोक्ताओं को लाभ ही होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होने से खुदरा बाजार में पेट्रोल-डीजल की कम कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। लेकिन ऐसा हुआ ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होने के बावजूद उसका लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाया, क्योंकि सरकार ने कर बढ़ा दिए थे।  अभी भी केेंद्र सरकार चाहती है कि राज्य सरकारेंं वैट कम कर दें तो ग्राहकों को राहत मिले। लेकिन चाहने और कहने में बड़ा फर्क होता है।  केेंद्र में भाजपा काबिज है, और देश के तीन चौथाई राज्य भगवा रंग में रंग चुके हैं। तो क्या यहां की भाजपा या भाजपा समर्थित सरकारों को वैट कम करने के लिए केेंद्र सरकार नहीं कह सकती है। या अभी वह इसलिए नहीं कह रही है, क्योंकि आम चुनावों में एक साल का समय है, तब तक महंगाई से जनता का थोड़ा तेल और निकल जाए, फिर महात्मा, महामना, महापुरूष मोदीजी मलहम लगाने मंच पर आएंगे। तेल की बढ़ती कीमतों का असर खेती, व्यापार, उद्योग सभी पर पड़ता है। इसलिए इसमें झूठी उम्मीदें नहीं बंधानी चाहिए। 2014 में आर्थिक नीतियों के चमत्कारिक विकल्प का विजन मोदीजी ने पेश किया लेकिन उसमें पूरी तरह से असफल रहे हैं। कम से कम अब तो वे धरातल की सच्चाई को देखकर सही-सही बात जनता के सामने पेश करें। 
 

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