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लंदन में मैजिक शो

By Sabkikhabar :20-04-2018 07:27


अगर राजनेताओं के अभिनय, संवाद अदायगी, मंच प्रस्तुति, वेशभूषा इन सबके लिए आस्कर जैसा कोई पुरस्कार होता तो निश्चित ही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार चार सालों तक उसे जीतने का रिकार्ड बना देते।  भारत का वाराणसी हो या अमेरिका में टाइम स्क्वेयर या लंदन में वेस्टमिंस्टर सेंट्रल हाल, साल दर साल मोदीजी की नाटकीय प्रस्तुति में निखार आता जा रहा है। क्या ग•ाब के अभिनेता और शो मैन हैं नरेन्द्र मोदी। या उन्हें जादूगर कहना ठीक होगा।

जादूगर स्टेज पर आकर सारे दर्शकों को सम्मोहित कर लेता है और फिर वह दिखाता है कि देखो बक्सा खाली है तो दर्शक मान लेते हैं कि खाली है। फिर उसी बक्से से वह रंगीन कागज निकालते जाता है, हवा में उड़ाते जाता है, इसके बाद वह इसी बक्से से एक कबूतर निकालता है, दूसरा कबूतर निकालता है, उन्हें भी उड़ा देता है और दर्शक यह सब मंत्रमुग्ध से देखते रह जाते हैं। जादूगर दर्शकों को थोड़ा सहमा भी देता है जब वह उन्हीं में से किसी एक को मंच पर बुलाकर एक बक्से पर लेटा देता है, फिर उस बक्से को हटाता है, फिर संगीत थोड़ा तेज होता जाता है, थोड़ा डरावना भी, फिर जादूगर उस व्यक्ति को बीच से आरी से काट देता है और संगीत एकदम से थम जाता है, लोगों की सांस अटक जाती है, जादूगर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आती है।

फिर वह अपने हाथों का कमाल दिखाता है, और आदमी को जोड़ देता है। दर्शक चैन की सांस लेते हैं कि वह जिंदा है। हाथ की सफाई, सम्मोहन, थोड़ी चालाकी, थोड़ी बेईमानी, ये सब जादू के खेल में होते हैं। जादूगर इस खेल के बाद दर्शकों की तालियां बटोरते हुए उन्हें नमन करता है और फिर अगले शहर जादू का मायाजाल फैलाने के लिए पहुंच जाता है। क्या मोदीजी भी ऐसा ही नहीं कर रहे? बतौर प्रधानमंत्री उनके लिए संवैधानिक रूप से जो मंच उपलब्ध कराया गया है, वह है संसद। लेकिन देख लें कि संसद में उनकी प्रस्तुति कितने बार हुई है। देश के जरूरी मुद्दों पर संसद में आन द रिकार्ड उनकी बातें होनी चाहिए, लेकिन वह नहीं होती है। हाल में बजट सत्र कैसा व्यर्थ गया है, सबने देखा है। 

प्रधानमंत्री संसद में नहीं बोलते, मन की बात में बोलते हैं, चुनावी रैलियों में बोलते हैं और विदेश में आयोजित, प्रायोजित सभाओं में बोलते हैं। मन की बात की स्क्रिप्ट पहले से तैयार होती है, चुनावी सभाओं के एजेंडे भी जगह के हिसाब से तय होते हैं और विदेश की सभाओं में भी सब कुछ पूर्व नियोजित होता है। अब तक वे भाषण देते थे, इस बार उन्होंने राहुल गांधी स्टाइल में सवाल-जवाब का तरीका चुना। लेकिन यहां भी सब पहले से तय था। कौन क्या सवाल पूछेगा और मोदीजी उस पर क्या जवाब देंगे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था।

सूत्रधार प्रसून जोशी हिंदी सिनेमा के लिए, विज्ञापनों के पहले ही बहुत कुछ लिख चुके हैं और अब तो वे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। लिहाजा उनके साथ मोदीजी की जुगलबंदी खूब जमी। वे मुदित भाव से प्रश्न पूछते रहे, मोदीजी आशीïर्वचनों की तरह जवाब देते रहे। दो घंटे के इस कार्यक्रम में मोदीजी ने ऐसे सुविचार प्रकट किए कि इनसे नया धार्मिक ग्रंथ बन जाए। वे अपना नाम इतिहास में दर्ज नहींकराना चाहते, लेकिन जब मोदी-मोदी का घोष होता है, तो क्या मारक मुस्कान उनके चेहरे पर छा जाती है। वे राज करने की इच्छा नहीं रखते, लेकिन जहां चुनाव हों वहां 10-20 सभाएं करते हैं, ताकि बाजी हाथ से न निकले और अगर सीटें कम आती हैं, तो भी भाजपा की सरकार बनवा लेते हैं। वे अब तक सर्जिकल स्ट्राइक के लिए छाती ठोंक रहे हैं, जबकि उसके बाद न जाने कितनी बार पाकिस्तान से हुए संघर्ष में हमारे जवान, आम नागरिक मारे गए हैं।

वे भारतीयों से कहते हैं कि आपका पासपोर्ट ताकतवर हुआ है, आपको भारतीय पासपोर्ट रखने पर गर्व होता है, जबकि ग्लोबल पासपोर्ट पावर रैंक की रिपोर्ट बतलाती है कि हमारा पासपोर्ट कमजोर हुआ है, पिछले साल 75वें स्थान के साथ हमें 51 देशों में वीजा फ्री था, इस बार 86वें स्थान के साथ केवल 49 देशों में वीजा फ्री है। यानी एक देश के रूप में हमारी साख कमजोर हुई है, जो फिलहाल जादू की चमक-धमक में हमें नहींं दिख रही है। वे डिजीटल इंडिया, स्किल इंडिया, कौशल विकास का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हैं, लेकिन डेटा चोरी, बेरोजगारी, छोटे कारोबारियों की दुर्दशा पर कुछ नहीं बोलते। वे कठुआ और उन्नाव की घटनाओं का दर्द लंदन में जाकर व्यक्त करते हैं। हर बात पर मैं ऐसा, मैं वैसा, मोदी ने ये किया, मोदी ने वो किया का गुणगान करते हैं, लेकिन ये नहीं कह सकते कि मेरी माताओं, बहनों, बेटियों जब तक ये मोदी है, तब तक तुम पर कोई अत्याचार नहीं होगा। अगर ऐसा एकाध डायलाग वे मारते तो तालियां बजती हीं, लड़कियों को भी थोड़ी देर राहत मिलती।

कविराज प्रसून जोशी ने राजाधिराज नरेन्द्र मोदी से उनकी फकीरी पर भी सवाल किया। अहा, क्या फकीराना ठाठ छिपा था उस सवाल और उसके जवाब में। भारत ने कबीर, मीरा बाई, रैदास, गुरु नानक की फकीरी देखी और फिर गांधीजी की। लेकिन मोदीजी की फकीरी ने तो इन सबको मात दे दी है। वे सुनहरी कढ़ाई में नमो-नमो लिखा हुआ राजसी परिधान पहनते हैं, लेकिन फिर भी कहते हैं कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो जो मिलता है, वह सब मैं तोशाखाना में जमा कर देता हूं। अपने इस त्याग का गुणगान करने वाले मोदीजी क्या यह नहीं जानते हैं कि वे ही नहीं, सरकारी तौर पर किसी भी पदाधिकारी को जो उपहार मिलते हैं, वह सब तोशाखाना में जमा करने का नियम ही है, क्योंकि वह किसी व्यक्ति को नहींं बल्कि उसके पद को मिला उपहार होता है, जिस पर देश का हक होता है। बहरहाल, वेस्टमिंस्टर सेंंट्रल हाल में दो-ढाई घंटों के जादुई शो का लोगों ने काफी आनंद लिया। उस हाल से बाहर निकलते ही असली दुनिया और देश की असली तस्वीर का दीदार उन्हें फिर हुआ ही होगा।  

Source:Agency