By: Sabkikhabar
18-04-2018 07:50

हमारी जांच एजेंसियां किस कदर लाचार, पंगु और अनुपयोगी हो चुकी हैं, इसका ताजा नमूना मक्का मस्जिद धमाका मामले में देखने मिला है। 18 मई 2007 को हैदराबाद की इस मशहूर मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान बम धमाका हुआ, जिसमें 9 लोग मारे गए थे और 58 घायल हुए थे। धमाके से अफरा-तफरी मची और भीड़ बेकाबू हुई तो हालात संभाल रही पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें पांच और लोगों की जान चली गई थी। इतने बेकसूर अकाल मौत मारे गए, लेकिन उनके दोषियों को 11 साल बाद भी पकड़ा नहीं जा सका है और अब यह उम्मीद भी खत्म हो गई है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की विशेष अदालत ने सभी पांच आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है, जिसमें दक्षिणपंथी नेता असीमानंद भी शामिल है। लेकिन यह मामला इतना सीधा-सरल नहीं है कि इसमें सबूत न मिलने का बहाना काम कर जाए।

मक्का मस्जिद धमाका भारत के उन चंद मामलों में शुमार होता है, जिसमें शक हिंदूवादी संगठनों पर जाता है। यूं तो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, फिर भी पूरी दुनिया में एक मिथ खड़ा कर दिया गया है कि आतंकवाद यानी इस्लाम का चरमपंथी रूप, आतंकवादी यानी दाढ़ी वाला कोई इंसान। यह मिथ इतना ज्यादा प्रचारित हो गया है कि अगर आप किसी बच्चे को कहें कि आतंकवादी का चित्र बनाए तो वह भी दाढ़ी, टोपी वाला इंसान ही बनाएगा। इतना दुराग्रह किसी विकसित सभ्यता के लिए ठीक नहीं है। लेकिन दुख की बात है कि हम सब उसका शिकार हो गए हैं। इसमें निश्चित ही दूसरे धर्मों की कट्टर ताकतों का हाथ है, जिन्होंने सोची-समझी साजिश के तहत एक धर्म को नीचा दिखाने का काम शुरु किया है।

भारत भी इस दुराग्रह का शिकार है, जबकि हम खुद आतंकवाद के हाथों घायल हुए बैठे हैं। यही कारण है कि कल जब असीमानंद को अदालत ने बरी किया तो भाजपा के बोल बांकुरों ने कमान संभाली और कांग्रेस पर हिंदुओं को बदनाम करने का आरोप लगा दिया। लेकिन क्या इन लोगों को यह सवाल नहीं उठाने चाहिए थे कि 11 साल तक आखिर दोषियों तक जांच एजेंसियां क्यों नहीं पहुंच पाईं? क्यों आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं मिले? क्या 11 साल तक यह समझ ही नहींआया कि जांच सही दिशा में नहीं बढ़ रही है? क्या जांच एजेंसियों ने सबूत जुटाने में कोताही बरती? अगर हां, तो किसके इशारों पर ऐसा किया गया? यह विचित्र संयोग है कि जज रवींद्र रेड्डी ने दिन में फैसला सुनाया और रात तक उनके इस्तीफे की खबर आ गई। उनका कहना है कि इस्तीफा निजी कारणों से दिया गया। लेकिन यह तर्क भी गले से नीचे नहीं उतरता।

मक्का मस्जिद धमाके की जांच पहले स्थानीय पुलिस ने की, फिर सीबीआई के पास मामला आया और बाद में एनआईए के पास। इन 11 सालों में केवल जांच एजेंसियां ही नहीं बदलीं, केेंद्र और प्रदेश की सत्ता भी बदल गई। एक प्रमुख आरोपी सुनील जोशी की हत्या हो गई। 2010 में असीमानंद ने दिल्ली में जज के सामने स्वीकार किया था कि मैं मंदिरों पर हमले से दुखी था, इसलिए ब्लास्ट को अंजाम दिया। बाद में वो इस बयान से पलट गए। इस मामले में 66 और गवाह भी अपने बयान से पलट गए, लिहाजा मामला एनआईए के हाथ से फिसल गया।

 अब बड़ा सवाल यह है कि मामला फिसल गया या फिसल जाने दिया गया। क्योंकि बीते कुछ सालों में हम लगातार देख रहे हैं कि किस तरह महत्वपूर्ण मामलों में जांच को सत्ता के दबाव में प्रभावित किया जाता है। फिर उन्हें ऐसा उलझा दिया जाता है कि असल दोषी बच निकलते हैं और देश के सामने उन्हें अबूझ पहेली की तरह रख दिया जाता है। जनता सीआईडी और क्राइम पेट्रोल जैसे कार्यक्रम देखकर खुश है कि अपराधी को सजा मिलती है। लेकिन हकीकत में अपराध और राजनीति का गठजोड़ उसे नजर नहीं आ रहा है। अब तो इसमें धर्म भी शामिल हो गया है। बलात्कार हो या आतंकवाद, इन गंभीर अपराधों पर भी राजनैतिकदलों के धार्मिक एजेंडे हावी हो रहे हैं। हम अक्सर पाकिस्तान पर आरोप मढ़ते हैं कि वह आतंकवाद को पनाह देता है, पर हम खुद किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, यह भी सोचना चाहिए। रहा सवाल जांच एजेंसियों का, तो संविधान ने उन्हें शक्ति दी है, लेकिन वे खुद उसे सत्ता के पास गिरवी रख रहे हैं। सीबीआई को पिंजरे का तोता कहा गया, क्या एनआईए को खूंटे से बंधी गाय कहा जाए? 
 

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