By: Sabkikhabar
16-04-2018 07:44

शनिवार सुबह सीरिया में अजान की आवाज मिसाइलों के शोर के साथ सुनाई दी। अमेरिका ने एक बार फिर विश्व का रहनुमा बनते हुए तथाकथित शांति पाठ और दुष्टों का संहार करने के लिए सीरिया पर हमला बोला। इसमें उसका साथ फ्रांस और ब्रिटेन ने दिया। सीरिया पिछले सात सालों से गृहयुद्ध में फंसा हुआ है। इसे गृहयुद्ध कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यहां लड़ाई केवल सीरिया की सरकार और विद्रोहियों के बीच नहीं है, बल्कि इसमें बाहरी तत्वों का दखल भी भरपूर है। यह कहा जा सकता है कि बाहरी देशों की मदद से ही दोनों पक्ष लड़ाई जारी रखे हुए हैं। अगर दखलंदाजी नहीं होती, तो शायद सरकार और विद्रोही आपस में वार्ता कर मतभेदों को दूर करने, शिकायतों के समाधान तलाशने की कोशिश कर सकते थे। पर इससे शांति स्थापित होती, जिससे पूंजीवाद का नुकसान होता।

सीरिया में इस वक्त जो हालात बने हैं, वैसे ही हालात इराक में भी थे। वहां सद्दाम हुसैन तानाशाही चला रहे थे, लेकिन बहुत से सुधारवादी, प्रगतिशील काम भी कर रहे थे, जिससे इराक की जनता का बड़ा वर्ग फायदे में था। सद्दाम हुसैन अमेरिका की धौंस में नहीं आते थे। जिसका बदला अमेरिका ने उस पर हमला करके लिया। विनाशकारी हथियार रखने का इल्जाम लगाकर पूरे इराक को तबाह किया गया, सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी गई। अमेरिकी जनता पर इस युद्ध का भार थोपा गया। बाद में कहा गया कि इराक में विनाशकारी हथियार नहीं मिले। अमेरिका की इस ज्यादती पर संयुक्त राषष्ट्र संघ ने कोई सख्ती नहीं दिखाई।

दुनिया के अधिकतर देश भी खामोश ही रहे। अब अमेरिका वही खेल सीरिया में खेलने पहुंच गया है। यहां अरब क्रांति के बाद शुरु हुए गृहयुद्ध में अमेरिका ने विद्रोहियों की मदद की। जबकि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद का साथ देने रूस सामने आया। उन्हें अपने पिता से सत्ता विरासत में मिली। लेकिन वे सीरिया में सुधार और खुलेपन के हिमायती थे। पर कट्टरपंथी ताकतें उनकी प्रगतिशीलता में रोड़ा बन गईं।  2013 में सीरियाई सरकार पर आरोप थे कि उसने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया है। लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सीरिया पर कोईर् कार्रवाई नहीं की थी। वे तब तक शांति का नोबेल पुरस्कार हासिल कर चुके थे। वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तो ऐसे किसी सम्मान का बोझ या दबाव भी नहीं है। वे शुरु से अमेरिका फर्स्ट यानी अमेरिका के व्यापारिक हितों को सबसे ऊपर रखे हुए हैं।

इसलिए इस बार भी जब सीरियाई सरकार पर आरोप लगा कि उसने डूमा शहर में रासायनिक हमले किए हैं, तो अमेरिका ने पहले चेतावनी दी और फिर हमला बोल दिया। अमेरिका ने कुल 120 मिसाइलें दागीं, जिसमें एक कीमत करीब साढ़े 9 करोड़ रुपए है, यानी कुल 11 सौ करोड़ रुपयों की मिसाइलें इस हमले में खर्च हुईं। शस्त्रागार में ये मिसाइलें रखी रहतीं तो हथियार निर्माता और मिसाइलें कैसे बेच पाते। अब फिर से सौ-डेढ़ सौ मिसाइलों की बिक्री की गुंजाइश बढ़ गई है। साथ ही विश्वयुद्ध जैसी नौबत बनेगी तो अमेरिका के साथ-साथ अन्य देश भी अपना रक्षा बजट बढ़ाएंगे। जनता को समझाएंगे कि तुम्हारी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास के बजट में कटौती करके हम देश को मजबूत बना रहे हैं। राष्ट्रप्रेम के नए पाठ लिखे जाएंगे, जिसमें जनता से ही त्याग मांगा जाएगा। कहने को लड़ाइयां देशों के बीच होती हैं, लेकिन उसका बोझ तो जनता ही उठाती है। ट्रंप जैसे व्यापारी जानते हैं कि जनता पर बोझ डालकर अमीर कैसे बना जाता है।

 बहरहाल, सीरिया में जिस रासायनिक हथियार के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया, उससे वह साफ इंकार कर रहा है, रूस भी कह रहा है कि रासायनिक हथियारों का उपयोग नहीं हुआ है। अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस का भी कहना है कि सात अप्रैल को डूमा में सारिन गैस समेत दूसरे रासायनिक हथियारों के हमले की अमेरिका ने अभी पुष्टि नहीं की है। अलबत्ता उन्होंने क्लोरीन के इस्तेमाल की बात जरूर कही है।

हालांकि क्लोरीन का इस्तेमाल औद्योगिक रूप से भी होता है और इससे पहले कभी अमेरिका ने इसके इस्तेमाल पर सैन्य कार्रवाई नहीं की है। तो सवाल यह है कि जब यही तय नहीं है कि सीरिया ने रासायनिक हथियारों का उपयोग किया है, तो फिर उस पर कार्रवाई क्यों की गई और अमेरिका ने किस अधिकार से उस पर मिसाइल दागीं। अगर सीरिया की सत्ता मानवता के खिलाफ काम कर रही है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने उस पर सीधी कार्रवाई क्यों नहीं की? अब अगर अमेरिका के हमलों का जवाब रूस देता है और फिर ईरान, चीन भी साथ आते हैं, तो क्या इससे तीसरे विश्वयुद्ध के हालात नहीं बनेंगे, जो पहले के युद्धों से अधिक खतरनाक होंगे, क्योंकि सबके पास परमाणु हथियार हैं।

मिसाइल हमले के बाद अमेरिका का दावा है कि मिशन पूरा हुआ। जबकि सीरिया कह रहा है कि उसने अधिकतर मिसाइलों को नष्ट कर दिया। यह भी कहा जा रहा है कि जिन सैन्य ठिकानों पर हमले हुए, उन्हें  सीरिया ने पहले ही खाली करा लिया था। कुल मिलाकर दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं और कौन सही है, कौन गलत, इसका निष्पक्ष निर्णय सुनाने वाला कोई नहीं है। दुनिया के लिए यह स्थिति गंभीर है।
 

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