By: Sabkikhabar
12-04-2018 07:36

कांग्रेस और भाजपा के बीच 2019 के चुनावी मुकाबले से पहले उपवास का मुकाबला शुरु हो गया है। जिसमें पहला दांव कांग्रेस खेल चुकी है और अब भाजपा अपना दांव खेलने की तैयारी में है। प्रधानमंत्री मोदी धार्मिक व्रत करते ही हैं, अब उन्होंने राजनीतिक उपवास रखने का निर्णय भी लिया है। उन्हें पीड़ा है कि इस बार संसद का बजट सत्र व्यर्थ चला गया, तो वे इसका गम गलत करने के लिए उपवास पर बैठ रहे हैं, जिसमें उनके अनुयायी साथ दे रहे हैं। नरेन्द्र मोदी तो दिल्ली में अपने कार्यालय में काम करते हुए उपवास करेंगे, जबकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कर्नाटक में उपवास करेंगे। उन्होंने कर्नाटक का चयन क्यों किया, समझना कठिन नहीं है।

हेमामालिनी अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा में उपवास करेंगी और गांधी जी की मूर्ति के सामने धरना भी देंगी। कांग्रेस ने भी राजघाट पर ही उपवास किया था। दरअसल भारत की आधुनिक राजनीति में उपवास गांधीजी का हथियार था। हालांकि गांधीजी केवल राजनीतिक कारणों से उपवास नहीं रखते थे। अगर वे अंग्रेजों की गलत नीतियों का विरोध करने के लिए अनशन करते थे, तो हिंदू-मुसलमानों की लड़ाई रोकने के लिए भी उपवास करते थे। साध्य प्राप्ति के लिए अगर साधन में खोट आ जाए तो उसका प्रायश्चित भी उपवास से करते थे। एक वाक्य में कहा जाए तो मन, वचन और कर्म तीनों की शुद्धि के लिए गांधीजी उपवास करते थे। अब ये सवाल आज के नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि वे केवल वोटशुद्धि के लिए उपवास करते हैं या उसके वृहत्तर मायने भी हैं।

कांग्रेस हो या भाजपा क्या इनके एक दिन के उपवास के प्रहसन से देश की गंभीर समस्याएं सुलझ जाएंगी। संसद सत्र बेकार चले जाने पर प्रधानमंत्री और अन्य सांसद अगर अब उपवास कर रहे हैं तो क्या इससे बीता हुआ समय वापस आ जाएगा? गंवाया हुआ समय फिर उपयोग में लाया जा सकेगा? इस उपवास से तो यह गारंटी भी नहीं मिलेगी कि आइंदा चाहे जो हो, हम संसद में व्यवधान नहीं होने देंगे। अगर सरकार को संसद में काम न होने की इतनी ही पीड़ा है, तो क्यों नहीं प्रधानमंत्री ने तब कोई कदम उठाया, जब सत्र चल रहा था। बात अकेले कांग्रेस के विरोध की नहीं है। टीडीपी, टीएमसी आदि के सांसद भी जो मांगें उठा रहे थे, जो सवाल पूछ रहे थे, तब भाजपा ने उन्हें सुनना जरूरी क्यों नहीं समझा? ऐसा तो है नहीं कि संसद सत्र पहली बार हंगामेदार रहा हो।

 बीते कुछ सालों में तो संसद का मतलब ही हंगामे, विरोध का सदन हो गया है। इस स्थिति को सुधारने की पहल प्रधानमंत्री समेत अन्य दिग्गज नेताओं ने क्यों नहीं की? आज उपवास का खेल इसलिए खेला जा रहा है, क्योंकि चुनाव सामने है, जहां जनता को जवाब देना है। कमोबेश यही स्थिति दलित बनाम सवर्ण के मुद्दे की है। सदियों से हिंदू धर्म वर्ण विभाजन का शिकार हुआ है, जिसका लाभ गुलाम भारत में अंग्रेजों ने उठाया और आजाद भारत में राजनीतिकदलों ने। कई सौ सालों की प्रताड़नाओं, शोषण, गैरबराबरी की पीड़ा को थोड़ा कम करने के लिए, दलितों के लिए आरक्षण की जो व्यवस्था की गई, उसे भी सवर्णों के सामने गलत तरीके से पेश किया गया। नतीजा यह निकला कि आज सवर्णों का एक बड़ा तबका यह मानता है कि उनका हिस्सा कम करके दलितों को दिया जा रहा है।

आरएसएस के खुद के विचार आरक्षण पर डांवाडोल हैं, लेकिन दलितों को पुचकारना उसकी मजबूरी बन गई है। हकीकत यह है कि दलित हों या सवर्ण दोनों का ही हिस्सा सरकार की गलत नीतियों के कारण खत्म हो रहा है। सरकार रोजगार और शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं कर रही है, नौकरियां देने में उसने हाथ खड़े कर दिए हैं। इसलिए बहुत से नौजवान बेरोजगार हैं। दूसरी ओर निजी क्षेत्र अपनी शर्तों पर शिक्षा, रोजगार देते हैं, जिसमें लोककल्याण नहीं निजकल्याण का ध्यान रखा जाता है। निजी क्षेत्र की सुविधाओं का लाभ संपन्न तबका ही उठा पाता है। इसलिए दलित यहां भी पीछे रह जाते हैं। इस तरह सवर्ण और दलित दोनों वर्गों की युवा पीढ़ी हताशा, कुंठा का शिकार हो रही है। सरकार इस निराशा को दूर करने की जगह उनका ध्यान भटकाने में लगी है।

इसलिए भारत बंद, उपवास जैसे खेल चल रहे हैं। एससीएसटी एक्ट में बदलाव पर दलितों के 2 अप्रैल के भारत बंद पर हिंसा हुई, तो प्रचार किया गया कि दलितों ने हिंसा फैलाई, जबकि इसमें मरने वाले भी दलित ही ज्यादा है। इसके बाद आरक्षण के विरोध के नाम पर 10 अप्रैल को फिर भारत बंद हुआ। आरक्षण मुक्ति दल जैसे संगठनों ने इस बंद का आह्वान किया और कहने की आवश्यकता नहीं कि इसमें किस तबके के लोग शामिल थे। इस बंद में भी हिंसा हुई, लेकिन उसे मीडिया ने अधिक तवज्जो नहीं दी। गुजरात दंगों के वक्त क्रिया की प्रतिक्रिया का तर्क पेश किया गया था। जिसके बाद हिंदुओं-मुसलमानों के बीच विभाजन की खाई और गहरी हो गई थी। अब एक बार फिर वैसा ही प्रयोग किया जा रहा है। फर्क यह है कि विभाजन रेखा के एक ओर दलित हैं, दूसरी ओर सवर्ण। इनके बीच की खाई इस बार इतनी गहरी हो गई है कि इसे कम करने में बरसों लगेंगे, वह भी तब, जबकि गांधी जैसी ईमानदार नीयत वाला कोई नेता कोशिश करे। फिलहाल तो जनता मेरा उपवास और तेरा उपवास, मेरा बंद और तेरा बंद की रस्साकशी देखे।
 

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