By: Sabkikhabar
09-04-2018 07:44

6 अप्रैल को भाजपा का 38वां स्थापना दिवस मनाया गया। हर पाार्टी, संस्था अपने-अपने स्थापना दिवस का जश्न भी मनाती है। लेकिन भाजपा का स्थापना दिवस तो राष्ट्रीय सुर्खी बन गया। पार्टी की स्वर्ण या हीरकजयंती नहीं थी, न ही उसने अभी कोई महान उपलब्धि हासिल की थी। पर केेंद्र की सत्ता पर भाजपा का कब्जा है। और अगले साल चुनाव हैं, इसलिए भाजपा का स्थापना दिवस देशव्यापी आयोजन बन गया। इस माौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। अमूमन मोदीजी का भाषण चर्चा में रहता है, लेकिन इस बार बाजी मार ले गए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह। उन्होंने मुंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संबोधित किया।

अमित शाह राजनैतिक विचारक नहीं हैं, कि इस मौके पर वे कोई नया विचार, कोई नयी बात लोगों के सामने रखते। वे राजनीतिज्ञ यानी स्टेट्समैन भी नहीं हैं, वे तो खांटी राजनेता यानी पालिटिशियन हैं, जिनका मकसद हर चुनाव में जीत हासिल करना है, चाहे वह किसी भी तरह से हो। इसलिए भाजपा के स्थापना दिवस पर भी उन्होंने 2019 के आम चुनाव को अपने भाषण का मुद्दा बनाया। और इसमें विपक्ष को कोसने की बाढ़ में वे खुद बेकाबू होकर बह गए। भाजपा को रोकने के लिए कई विपक्षी दल अपने मतभेदों और राजनीतिक हितों को भुलाकर एक साथ आने की तैयारी में है। यह बात भाजपा अध्यक्ष को रास नहीं आ रही। शायद इसलिए कि चुनाव जीतने की सारी तिकड़मों पर वे अपना कापीराइट समझते हैं। 

बहरहाल, विपक्षी एकता पर तंज कसते हुए अमित शाह ने कहा कि जब बहुत बाढ़ आती है तो सारे पेड़-पौधे पानी में बह जाते हैं। एक वटवृक्ष अकेले बच जाता है तो सांप भी उस वृक्ष पर चढ़ जाता है, नेवला भी चढ़ जाता है, बिल्ली भी चढ़ जाती है, कुत्ता भी चढ़ जाता है, चीता भी चढ़ जाता है, शेर भी चढ़ जाता है, क्योंकि नीचे पानी का डर है, इसलिए सब एक ही वृक्ष पर इक_ा होते हैं। यह मोदी जी की बाढ़ आई हुई है, इसके डर से सांप, नेवला, कुत्ती, कुत्ता, बिल्ली सब इक_ा होकर चुनाव लड़ने का काम कर रहे हैं।

गठबंधन की राजनीति पर इतने निम्न स्तर की टिप्पणी इससे पहले शायद कभी नही ंआई। बाढ़ की आपदा हाल के बरसों में बिहार, गुजरात, उत्तराखंड, महाराष्ट्र. जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु  इन तमाम प्रांतों के लोगों ने खूब सही है। यहां के लोगों ने जब अमित शाह की यह कड़वी टिप्पणी सुनी होगी, तो उनके जख्म ताजा हो गए होंगे, जब उन्हें भी जान बचाने के लिए न जाने किन-किन परिस्थितियों में रहना पड़ा होगा। लेकिन अमित शाह ने तो बाढ़ की आपदा का ही मजाक बना दिया। वो बिल्कुल नरेन्द्र मोदी की राह पर चले हैं। याद करें संसद में बीते साल फरवरी में नरेन्द्र मोदी ने उत्तराखंड के भूकंप पर कहा था कि आखिरकार भूकंप आ ही गया।

दरअसल मोदीजी ने राहुल गांधी के उस बयान का मजाक उड़ाया था, कि सहारा-बिड़ला पेपर्स के संबंध में अगर उन्हें संसद में बोलने दिया जाए तो भूकंप आ जाएगा। तो दूसरों की पीड़ा पर मजाक बनाना भाजपा की नयी परंपरा है, ऐसा हम मान सकते हैं। रहा सवाल अमित शाह द्वारा की गई तुलना का, तो इसमें समझना कठिन है कि उन्होंने वटवृक्ष किसे कहा है? क्योंकि 2014 में तो ऐसा कहा गया कि मोदी लहर में सब बह गए। क्या शाह के मुताबिक कांग्रेस वटवृक्ष है, क्योंकि विपक्षी मोर्चे का आधार तो वही है। फिर तो अमित शाह को कांग्रेसमुक्त भारत का राग छोड़ देना चाहिए, क्योंकि वटवृक्ष की जड़ें कितनी गहरी और फैली हुई होती हैं, यह भी उन्हें पता होगा।

मोदीजी भी लहर बने रहते तो ठीक था, लेकिन सुनामी या बाढ़ तो जानलेवा होती है। फिर अमित शाह ने प्रधानमंत्री की तुलना एक डरावने प्रतीक से क्यों की? क्या अब देश को नरेन्द्र मोदी से डरना चाहिए? बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए मतभेदों को भूलना चाहिए और एक होना चाहिए। इस वक्त कांग्रेस, सपा, बसपा, टीएमसी, टीआरएस, टीडीपी, एनसीपी, यही करने की कोशिश तो कर रहे हैं। एक घाट पर शेर और बकरी पानी पिएं, इससे अधिक आदर्श स्थिति क्या हो सकती है? तो अमित शाह को एकता की यह कोशिश खटक क्यों रही है?

क्या इसलिए कि इससे उनकी सत्ता के लिए खतरा पैदा होता है। क्या विपक्ष की तुलना जानवरों से करने और उसकी तबाही की सोच लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है? राहुल गांधी ने अमित शाह के बयान पर सही कहा है कि पीएम मोदी और अमित शाह को छोड़कर सब जानवर हैं। वो जो करें तो सब सही, चाहे वह पीडीपी के साथ गठबंधन हो या नीतीश कुमार को दोबारा साथ लेना हो। लेकिन सपा-बसपा साथ आएं तो उन्हें सांप-छुछंूदर कहा जाता है और कई विपक्षी एक साथ हो रहे हैं, तो सबको जानवर बतलाया जा रहा है। वैसे ये बात तो अमित शाह भी जानते होंगे कि जानवर बिना भूख के दूसरों का शिकार नहीं करते और जंगल में सबको अपनी प्रकृति, स्वभाव, खानपान की आदतों के साथ रहने की छूट होती है। भारत फिर से वैसा ही जंगल बन जाए तो शायद दलितों, अल्पसंख्यकों के लिए भी अच्छा हो। 
 

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