By: Sabkikhabar
15-01-2018 08:06

देश में इस वक्त सुप्रीम संकट की चर्चा जोरों पर है। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों का प्रेस कांफ्रेंस में यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है और देश का लोकतंत्र खतरे में है, वाकई सुप्रीम संकट ही है। लेकिन इसे केवल न्यायपालिका तक सीमित रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। दरअसल यह पूरे देश के सामने अभूतपूर्व सवाल और समस्या है। आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक अनबन इस तरह सार्वजनिक तौर पर प्रकट की गई हो।

प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चारों न्यायाधीशों, जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस रंजन गोगोई, ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर काम के बंटवारे में नियमों का पालन न करने समेत कई अनियमितताओं का खुलासा किया है और यह कहा है कि अपनी शिकायतों का एक पत्र उन्होंने प्रधान न्यायाधीश को भी सौंपा है। ये चारों न्यायाधीश कानून और संविधान की परंपराओं के विशेषज्ञ हैं।

उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि जो कदम उन्होंने उठाया है, उसके क्या परिणाम हो सकते हैं।  इनकी परिणति उनके त्यागपत्र के रूप में हो सकती है और जिनके पास तरक्की के अवसर हैं, उससे वंचित हो सकते हैं। लेकिन आशंकाओं के गढ़ों और मठों को तोड़ते हुए उन्होंने अभिव्यक्ति का खतरा उठाया। अब इस मुद्दे पर न्यायपालिका के भीतर सक्रियता बढ़ गई है कि इस मतभेद को जल्द से जल्द सुलझाया जाए। सरकार भी अपनी तरह से मामले को देख रही है और विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे गंभीर मामला बताया है।

भाजपा को यह रास नहींआया कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मसले पर प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी चिंता जाहिर की है। लेकिन यह वक्त राजनीति का नहीं बल्कि गहन विमर्श का है कि चारों न्यायाधीशों ने जो कुछ कहा, उसके पीछे कारण क्या रहे होंगे और क्यों उन्हें इस तरह लीक से हटकर अपनी तकलीफ जाहिर करने की जरूरत पड़ी।

 
 भारत का लोकतंत्र कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के आधार स्तंभों पर खड़ा है। इनमें से किसी का भी हिलना लोकतंत्र की बुनियाद हिला सकता है। इन तीनों अंगों में भी आतंरिक लोकतंत्र बेहद जरूरी है,  और इस वक्त सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं है, की जो बात सामने आई है, उससे यही पता चलता है कि न्याय की इस सर्वोच्च संस्था में लोकतांत्रिक मूल्य ताक पर रखे जा रहे हैं। अब तक यहां यही परंपरा रही है कि महत्वपूर्ण मामलों में सामूहिक तौर पर निर्णय लिए जाते हैं। लेकिन अपने पत्र में न्यायाधीशों ने यह कहा है कि मुख्य न्यायाधीश महत्वपूर्ण मामलों को बिना किसी पुख्ता कारण के उन बेंचों को सौंप रहे हैं, जो उनकी पसंद के हैं। जब प्रेस कांफ्रेंस में यह पूछा गया कि क्या जज लोया की मौत की जांच के संबंध में भी पत्र में कहा गया है तो जवाब केवल एकशब्द में मिला- यस। लेकिन इस एक शब्द के पीछे बहुत बड़ी व्यथा दिखाई देती है। जज लोया की मौत की गुत्थी सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ से जुड़ी है और सत्तारूढ़ पार्टी तक इसके सूत्र जाते हैं।

इस तरह के कई हाई प्रोफाइल मामले और हैं, जिनका खुलासा अभी देश के सामने हुआ ही नहीं है। लेकिन एक बात जाहिर है कि न्यायतंत्र में भी इंसाफ के नाम पर खिलवाड़ चल रहा है। आज चारों न्यायाधीशों ने जो बात सबके सामने कही है, वह सुप्रीम कोर्ट की चारदीवारी के भीतर भी कही जाती रही होगी, लेकिन शायद वहां सुनवाई न होने पर न्यायाधीशों को प्रेस के जरिए जनता की अदालत के सामने अपनी बात कहनी पड़ी। जनता तो अब तक न्यायपालिका पर भरोसा करती आई है कि यहां देर-सबेर न्याय मिलेगा ही। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट के भीतर न्याय का संकट हो, तो जनता अपने इंसाफ के लिए किस पर यकीन करेगी? फिलहाल इस विवाद के जल्द सुलझने की उम्मीद की जा रही है। लेकिन आइंदा ऐसा नहीं होगा, यह सुनिश्चित करने की जरूरत है। वर्ना न्याय तंत्र लड़खड़ाएगा और लोकतंत्र औंधे मुंह गिरेगा।
 

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