By: Sabkikhabar
13-01-2018 07:07

मोदी सरकार ने जब योजना आयोग को समाप्त कर उसकी जगह नीति आयोग बनाने की घोषणा की थी तभी यह अंदेशा हो चला था कि भारतीय अर्थव्यवस्था आने वाले दिनों में किस दिशा में जाएगी। दरअसल, भारत जैसे बड़े और आर्थिक आधार पर बंटे देश के लिए जरूरी है कि आर्थिक योजनाएं लक्षित उद्देश्यों से संचालित हों क्योंकि आप को एक साथ कई स्तर के आर्थिक कार्यक्रम चलाने होते हैं। भारत के समकक्ष लगभग सभी देशों में अर्थव्यवस्था इसी फामूर्ले से संचालित है, चाहे वे समाजवादी मॉडल वाले देश हों या पूंजीवादी। इससे सरकार के पास अपनी आर्थिक योजनाओं की समीक्षा करने का ठोस आधार उपलब्ध होता है।

सरकारें इससे अपनी आगामी पंचवर्षीय योजनाओं की दिशा तय करती हैं, लेकिन नीति आयोग के सामने चूंकि कोई समयबद्ध लक्षित उद्देश्य नहीं है, इसलिए एक तरह से आर्थिक मामलों में चाहे वह निवेश का मसला हो या रोजगार का, एक अराजकता की स्थिति पैदा होती गई। ऐसी आर्थिक अराजकता के दौर में क्रोनी कैपिटलिज्म यानी पूंजीगत भाई-भतीजावाद की गुंजाइश बढ़ जाती है। यह मजह संयोग नहीं है कि इस दौरान कुछ गिने चुके सरकार समर्थित उद्योगपतियों के मुनाफे में कई गुणा वृद्धि हुई और दूसरी तरफ आम रोजगारशुदा लोग छटनी के शिकार होते रहे।

इसीलिए भारतीय अर्थव्यवस्था की दुर्गति को तकनीकी करणों से व्याख्यित नहीं किया जा सकता। यह स्थिति सिर्फ और सिर्फ नीतिगत कारकों की देन है। जिसे हम सरकारी बैंक एसबीआई के इस बयान से समझ सकते हैं कि यह मंदी ‘अस्थाई’ या ‘तकनीकी’ कारकों से नहीं है और यह अभी स्थाई तौर पर रहने वाली है। जबकि सरकार की तरफ से इसे ‘तकनीकी’ करकों का परिणाम बताते हुए इसे अस्थाई बताया गया था।1इस पतन को अगर हम जीडीपी के आंकड़ों से समङों तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है।

मसलन, 2015-16 के लिए हमारी जीडीपी 8 प्रतिशत थी तो वहीं उसके बाद 2016-17 और 2017-18 में यह सीधे गिरकर क्रमश: 7.1 व 5.7 प्रतिशत पर आ गई। कहने की जरूरत नहीं कि 2015-16 तक में पिछली संप्रग सरकार के प्र्दशन के कारण यह 8 फीसद थी। यानी मोदी सरकार की अपनी आर्थिक नीतियों के कारण ही यह गिरावट देखी जा रही है। इसकी जिम्मेदारी पिछली सरकार पर नहीं लादी जा सकती। जाहिर है जीडीपी में गिरावट का सीधा असर बेरोजगारी के बढ़ने में ही नहीं प्रकट होगा, इससे रोजगार कर रहे लोगों की छटनी भी होगी। ऐसे में मोदी सरकार द्वारा दो करोड़ रोजगार देने का वादा मजाक साबित होने जा रहा है। ‘मेक इन इंडिया’ भी सफेद हाथी साबित हुआ है।

इस निष्कर्ष को ऐसे भी समझ सकते हैं कि दुनिया में इस समय उस स्तर की मंदी भी नहीं है कि हम उसे बाहरी कारकों का परिणाम बता सकें। अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच तनाव के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था किसी तरह की नई मंदी के खतरे से विचलित नहीं है। लिहाजा, कोई बहाना नहीं हो सकता कि हम इसकी जिम्मेदारी किसी और पर लाद दें। किसी भी देश में नीतिगत कारणों से ऐसी स्थिति का आना कोई हैरानी की बात नहीं है, पर समस्या यह है कि सरकार इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

यहां तक कि खुद बैंकों के जरिए न्यूनतम बैलेंस के नाम पर लोगों का पैसा निकाल रही है। यह रवैया अपने आप में विरोधाभासी और अर्थव्यवस्था की नासमझी को दिखाता है कि जब आप एक तरफ मंदी को स्वीकार कर रहे हैं जिसके कारण लोगों के खातों में पैसे की कमी होनी स्वाभाविक है तो फिर उसे न्यूनतम बैलेंस के आधार पर ले क्यों रहे हैं? जाहिर है यह कुंठा में उठाया गया कदम है, जिससे लोगों में आर्थिक असुरक्षा और बढ़ेगी।

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