By: Sabkikhabar
05-01-2018 07:34

असम में नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स यानी एनआरसी का पहली सूची जारी हो गई है और इसमें 3.29 करोड़ आवेदकों में से केवल 1.9 करोड़ लोगों को ही भारत का वैध नागरिक माना गया है। शेष अब दूसरी सूची पर आस लगाए बैठे हैं। असम में बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ राजनीतिक दलों के लिए हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है, जिसे अक्सर चुनावों के वक्त भुनाया जाता है। बांग्लादेश की सीमा से सटे इस पूर्वोत्तर प्रदेश में पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश बन गए भू भाग से बड़ी संख्या में प्रïवासी पहुंचे।

राजनैतिक हालात के शिकार इन लोगों के खिलाफ असम में अक्सर असंतोष भड़कता रहा, क्योंकि यहां के बहुत से नागरिकों को यह लगा कि उनके रोजगार व अन्य संसाधनों को दूसरे उनसे छीन रहे हैं। 1979 से 1985 तक बांग्लादेश से आने वाले लोगों के खिलाफ यहां व्यापक आंदोलन भी चला। 1980 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन, यानी आसू ने एनआरसी को नवीनीकृत करने की मांग मुखर की। तब 1951 के बाद आए तमाम बाहरी लोगों को सूबे से बाहर भेजने की जरूरत बताई गई थी। मगर 1985 में हुए 'असम समझौता' के तहत आसू को मानना पड़ा कि 25 मार्च, 1971 से पहले जो भी प्रवासी असम पहुंचे हैं, उन्हें भारतीय नागरिक माना जाएगा।

2005 में केंद्र, राज्य सरकार और आसू के बीच असमी नागरिकों का कानूनी दस्तावेजीकरण करने के मुद्दे पर सहमति बनी और अदालत के हस्तक्षेप से इसका एक व्यवस्थित रूप सामने आया। असम में एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया इसी का नतीजा है। अभी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही एनआरसी, 1951 को अपडेट करने का काम चल रहा है। जिसमें कुछ करोड़ लोग तो भारत के नागरिक माने जा चुके हैं, जबकि बहुत से अभी इंतजार में हैं। कई प्रकरण ऐसे भी सामने आए हैं कि सूची में परिवार के एक सदस्य का नाम निकला है, औैर दूसरे का छूट गया है। यह सारी प्रक्रिया बेहद पेचीदगी भरी है, क्योंकि असम में केवल असमिया लोग ही नहीं रहते हैं या केवल बांग्लादेश से आए प्रवासी ही नहीं हैं, बल्कि भारत के दूसरे राज्यों के लोग भी हैं और हिंदू आबादी के साथ-साथ मुस्लिम आबादी भी है। ऐसे में धार्मिक आधार पर भेदभाव की बात भी उठ रही है। बहुत से मुस्लिम नेताओं ने आरोप लगाया है कि एनआरसी उन्हें बेघर करने का काम करेगी। सांप्रदायिक तनाव इस प्रदेश में पहले भी पसरा है और अब भी स्थिति काफी संवेदनशील है। असम के हालात आईएमडीटी यानी इलीगल माइग्रेंट्स डिटर्मिनेशन बाई ट्रिब्यूनल कानून के कारण भी खराब हुए हैं। 1

 
983 में यह कानून  अवैध बांग्लादेशियों की पहचान करने के इरादे से बनाया गया था, पर इसके कई प्रावधान ऐसे थे, जिससे प्रवासियों की पहचान करना काफी मुश्किल था। इसी वजह से 1985 में पहली बार बनी असम गण परिषद सरकार अवैध बांग्दालेशियों के खिलाफ कुछ खास नहीं कर सकी। बाद के वर्षों में आसू ने इस कानून को जब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तब 2005 में इस कानून को असंवैधानिक करार दे दिया गया। लेकिन तब से अब तक उन बांग्लादेशी नागरिकों की तीसरी-चौथी पीढ़ी आ चुकी है। उन्हें किस आधार पर अवैध कहा जाएगा? 1951 से 25 मार्च, 1971 के बीच जो बांग्लादेशी शरणार्थी आए हैं, उनके पास जरूरी कागजात नही हैं और असली उलझन इसी बात को लेकर है कि अगर वे यहां के नागरिक नहीं माने जाते, तो उनका क्या होगा? क्या उन्हें देश से निकलने कहा जाएगा? और क्या बांग्लादेश की सरकार उन्हें वापस स्वीकारेगी या रोहिंग्या लोगों की तरह उनका जीवन भी अपनी जमीन की तलाश में निकल जाएगा। 

बांग्लादेश से आए लोगों में हिंदू भी हैं और मुसलमान भी। तो क्या भारत से बाहर निकालने में धार्मिक तौर पर भेदभाव करने की आशंका भी रहेगी? अगर बांग्लादेश भेजने के बाद भी वे कुछ समय बाद दोबारा आ जाते हैं, तब उनके साथ क्या व्यवहार होगा? बांग्लादेश से जो लोग 30-40 साल पहले आए थे और अब जिनकी अगली पीढ़ियां असम में ही रह रही हैं, क्या उन्हें उनकी जड़ों से काटना आसान होगा और ऐसा करने का सामाजिक, आर्थिक परिणाम क्या निकलेगा? ये सारे सवाल एनआरसी की प्रक्रिया में बेतरतीबी से गुंथे हुए हैं, लेकिन इनके जवाब तलाशना ही होगा, अन्यथा भारत भी म्यांमार की राह पर चल पड़ेगा। 
 

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