By: Sabkikhabar
02-01-2018 06:29

विकासशील देशों की मौद्रिक नीति वहां की राजकोषीय नीति के समान ही उत्पादन को  बढ़ावा देने वाली तथा अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने वाली होनी चाहिए जिससे कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ प्रति व्यक्ति उपभोग में भी वृद्धि हो सके। राजकोषीय नीतिे वित्त मंत्रालय द्वारा बनाई जाती है जबकि केद्रीय बैंक द्वारा मौद्रिक नीति बनाई जाती है। जब दोनों ही नीतियों का लक्ष्य एक ही हैं तो दोनों नीतियों में तालमेल होना चाहिए, किंतु वास्तव में अनेक बार खासकर ब्याज दरों में कमी करने के बिन्दु पर तालमेल नहीं दिखाई दिया है। भारत के उद्योगपति चाहते रहे हैं कि विकसित देशों के समान भारत में भी ब्याज दर नीची होनी चाहिए। उद्योगपतियों की मांग अपनी जगह जायज है क्योंकि उत्पादन लागत के दो महत्वपूर्ण घटकों श्रम एवं पूंजी में से पूंजी एक है।

भारत के अर्थशास्त्रियों की प्रतिनिधि संस्था भारतीय आर्थिक परिषद का चार दिवसीय शताब्दी सम्मेलन का आयोजन दिसंबर के अंतिम सप्ताह में आचार्य नागार्जुन विश्वविद्यालय गुंटुर के तत्वावधान में किया गया था। 27 दिसंबर को सम्मेलन का उदघाटन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया। उद्घाटन समारोह में आंध्रप्रदेश के राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन, मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडु, सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. सी. रंगराजन, बंगलादेश के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. मोहम्मद युनूस, अर्थशास्त्री प्रो. कौशिक बासु एवं  प्रो. सुखदेव थोराट ने भी उद्घाटन समारोह में अपने विचार व्यक्त किए। भारतीय आर्थिक परिषद की स्थापना इंडियन इकानॉमिक एसोसिएशन के नाम से 1917 में की गई थी। सम्मेलन में देश-विदेश के 1000 से अधिक अर्थविदों ने हिस्सा लिया।  चार दिन के सम्मेलन में पिछले 70 सालों में हुए आर्थिक विकास की दिशा और दशा की समीक्षा के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की संभावनाओं पर चर्चा की गई। 

भारतीय आर्थिक परिषद के 100वें सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. सी. रंगराजन अपने अध्यक्षीय उद्बोधन हेतु भारतीय अर्थव्यवस्था, आर्थिक विकास, वृहत आर्थिक नीतियां, वर्तमान सरकार का 2032 वि•ान, सात वर्षीय रणनीति या तीन वर्षीय कार्य योजना, गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन आदि में से कोई भी वृहत विषय चुन सकते थे किंतु उन्होंने भारत की मौद्रिक नीति की समोच्चकता विषय को चुना तथा उसमें समय-समय पर हुए बदलाव और उसके परिणामों पर पर चर्चा की। 2017 से पहले 1988 में भी डॉ. रंगराजन जब वे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर थे, भारतीय आर्थिक परिषद के अध्यक्ष रह चुके हैं। उस समय भी उन्होंने मौद्रिक प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में चर्चा की थी। इस प्रकार डॉ. रंगराजन ने मौद्रिक नीति को सबसे अधिक महत्व देते हुए अर्थविदों के बीच चिंतन एवं विमर्श हेतु भारत की मौद्रिक नीति को अध्यक्षीय उद्बोधन हेतु चुना था। इसलिए यहां पर भारत की मौद्रिक नीति के विभिन्न पहलुओं और प्रभावों पर चर्चा करना सार्थक होगा। 

भारत के आम व्यक्ति या आम पाठक को मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति इन शब्दों में कोई रुचि नहीं रहती क्योंकि वह इन नीतियों की गूढ़ता नहीं समझता किंतु यदि महंगाई या आवास कर्ज पर ब्याज दर शब्द का प्रयोग किया जाय तो उसकी रुचि बढ़ जाती है जिस प्रकार कि राजकोषीय शब्द की बजाय सरकार की करारोपण या सब्सिडी संबंधी नीति अधिक आकर्षित करते हैं। गहराई से देखा जाय तो मौद्रिक नीति उपभोक्ता, किसान, उत्पादक, व्यवसायी, गृहिणी आदि सभी वर्ग के व्यक्तियों को प्रभावित करती है। मौद्रिक नीति से आशय रिजर्व बैंक द्वारा करेंसी मुद्रा की पूर्ति एवं प्रचलन, साख मुद्रा का प्रचलन व नियंत्रण नीति से होता है। बाजार अर्थव्यवस्था में व्यवसायिक सौदों में मुद्रा की तुलना में साख मुद्रा का अधिक प्रयोग होता है। बैंकों के लिए रिजर्व बैंक की रेपो रेट व रिवर्स रेपो रेट, बैंकों की अपने ग्राहकों के लिए चालू खातों पर ब्याज दर आदि साख नियंत्रण के महत्वपूर्ण उपाय होते हैं। 

विकासशील देशों की मौद्रिक नीति वहां की राजकोषीय नीति के समान ही उत्पादन को  बढ़ावा देने वाली तथा अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने वाली होनी चाहिए जिससे कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ प्रति व्यक्ति उपभोग में भी वृद्धि हो सके। राजकोषीय नीतिे वित्त मंत्रालय द्वारा बनाई जाती है जबकि केद्रीय बैंक द्वारा मौद्रिक नीति बनाई जाती है। जब दोनों ही नीतियों का लक्ष्य एक ही हैं तो दोनों नीतियों में तालमेल होना चाहिए, किंतु वास्तव में अनेक बार खासकर ब्याज दरों में कमी करने के बिन्दु पर तालमेल नहीं दिखाई दिया है। भारत के उद्योगपति चाहते रहे हैं कि विकसित देशों के समान भारत में भी ब्याज दर नीची होनी चाहिए। उद्योगपतियों की मांग अपनी जगह जायज है क्योंकि उत्पादन लागत के दो महत्वपूर्ण घटकों श्रम एवं पूंजी में से पूंजी एक है। पूंजी की लागत ब्याज होती है इसलिए यदि ब्याज दर नीची होगी तो उत्पादन लागत भी नीची होगी। उत्पादन लागत नीची होने पर भारत में निर्मित उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्द्धात्मक हो जाते हैं।

 
उद्योगपतियों की ब्याज दर कम करने के तर्क से सहमत पी. चिदम्बरम एवं प्रणव मुखर्जी अपने वित्तमंत्रित्व कार्यकाल में रिजर्व बैंक को ब्याज दर में कटौती की सलाह देते रहे हैं किंतु संवैधानिक सार्वभौमिकता प्राप्त रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने मुद्रा स्फीति नियंत्रण रखने का तर्क देते हुए ब्याज दर में कटौती करना तो दूर अपने कार्यकाल में ब्याज दरों में आधे दर्जन से अधिक बार वृद्धि की थी। लेखनीय है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में पिछले तीस सालों में फेडरल ब्याज दर 0.5 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत के बीच रही है जबकि भारत में पिछले 30 सालों में केन्द्रीय बैंक की ब्याज दर 6.0 से 8.0 प्रतिशत के बीच अर्थात अमेरिका से चार गुना रही है। इसलिए भारतीय उद्योगपतियों की तुलना में भारत में प्रत्यक्ष निवेश करने वाले अमेरिकी उद्योगपति सदैव ही बहुत बेहतर स्थिति में रहते हैं।

भारतीय उद्योगपतियों को रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. रघुराम राजन से ब्याज दर में कटौती की बहुत अपेक्षाएं थीं, डॉ. रघुराम राजन ने ब्याज दरों में कटौती तो किन्तु वे वित्तमंत्री अरुण जेटली की अपेक्षानुसार मुद्रा स्फीति  नियंत्रण को प्राथमिकता देते हुए वित्तमंत्री की अपेक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहे।

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने मौद्रिक नीति बनाने में रिजर्व बैंक गवर्नर की स्वायत्तता खतम करते हुए संसद से अनुमोदन लेकर जून 2017 में 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की व्यवस्था का ऐलान कर दिया, इस समिति में तीन सदस्य वितमंत्रालय द्वारा मनोनीत किए जाने की व्यवस्था की गई है। विरोधी दल कांग्रेस ने भी पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम एवं प्रणव मुखर्जी के कटु अनुभवों को देखते हुए मौद्रिक नीति समिति की व्यवस्था का अनुमोदन किया। यद्यपि मौद्रिक नीति उपकरणों में केवल ब्याज दर ही नहीं इसके अनेक उद्देश्य एवं आयाम होते हैं किन्तु ब्याज दर सबसे महत्वपूर्ण घटक होने के कारण यहां उसकी ही चर्चा की जा रही है।

भारतीय उद्योपतियों के अनुसार वर्तमान में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की अभिवृद्धि दर बहुत नीची चल रही है इसमें वृद्धि हेतु ब्याज दरों में कटौती की जानी चाहिए,  किन्तु मौद्रिक नीति समिति ब्याज दरों को रिजर्व बैंक के गवर्नर की भांति मौद्रिक नीति समिति द्वारा बनाई गई मौद्रिक नीति के तहत ब्याज दरें अधिक हैं। रिजर्व बैंक का मुद्रा स्फीति नियंत्रण या महंगाई को काबू में रखने का तर्क भी बहुत दमदार तथा जनसमर्थन वाला है। मान लीजिए कि महंगाई को काबू करना और आवास व अन्य घरेलू वस्तुओं को खरीदने हेतु कर्ज पर नीची ब्याज दर इन दो विकल्पों में एक विकल्प चुनने हेतु जनमत संग्रह करवाया जाय तो भारत की कम से कम 90 प्रतिशत लोग महंगाई को काबू करना विकल्प चुनेंगे। वस्तुत: भारत सरीखे विकासशील देशों में  मौद्रिक नीति का प्रमुख उद्देश्य महंगाई में काबू करना न होकर उच्च जीडीपी दर या उत्पादन वृद्धि दर और अर्थव्यवस्था की मजबूती होता है। इन उद्देश्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। चूंकि लोकतंत्र में विकास का वादा कर जनता के बहुमत का समर्थन प्राप्त करके राजनैतिक दल सत्तारूढ़ होते हैं इसलिए वित्तमंत्री की जनता के प्रति जनता के प्रति जवाबदेही बनती है। इस बात को ध्यान में रखकर मौद्रिक नीति समिति के अध्यक्ष रिजर्व बैंक गवर्नर को  सभी उदद्ेश्यों को समन्वित करते हुए संतुलित मौद्रिक नीति बनाना चाहिए।

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