By: Sabkikhabar
01-01-2018 07:46

जनता मेट्रो यात्रा पर गर्व करे- और मंत्रीगण, अधिकारी और बड़े लोग क्या करें। वे अपने-अपने  महंगे वाहनों पर गर्व करें। अगर मेट्रो की यात्रा पर गर्व करने की बात है तो प्रधानमंत्री मेट्रो में बैठकर रोज दफ्तर जाएं। उनका पूरा मंत्रिमंडल मेट्रो में सफर करे- अधिकारी मेट्रो में जाए। केवल क्षेत्र के दौरे पर या विशेष अवसर पर ही सरकारी या व्यक्तिगत कार का उपयोग हो। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, अधिकारी सब फ्लैट में रहें। क्यों ऐसा न हो कि प्रधानमंत्री जिस फ्लैट में रहते हैं उसके बाजू के फ्लैट में उनका कोई सहयोगी रहता हो...। काम के लिए दफ्तर हैं। जहां मेट्रो न हो वहां बस से आया-जाया जाए। सारा त्याग जनता करे। मेट्रो में, बस में जनता आए-जाए और धक्के खाते, धूल खाते इस यात्रा की सुविधा पर गर्व भी करे। 

दिल्ली मेट्रो ट्रेन की मैजेंटा लाइन का उद्घाटन व उसमें सफर करने के बाद हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने बड़ी ही नीति की बात कही। उन्होंने कहा कि मेट्रो में यात्रा को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाए। उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि 'बड़े गर्व से' कहो कि मेट्रो की यात्रा की। प्रधानमंत्रीजी के इस उपदेश को सुनकर कई तरह के विचार उमड़ने-घुमड़ने लगे। वैसे प्रधानमंत्री जी का आशय यह है कि अधिक से अधिक सार्वजनिक सेवा का सहारा लिया जाए- सार्वजनिक सेवा का सहारा लेने में खुद को छोटा न समझा जाए- न ही इसमें शर्म की जाए। यह बताने में गर्व का अनुभव किया जाए कि हम सार्वजनिक परिवहन सेवा की सेवा ले रहे हैं- मेट्रो से दफ्तर, दुकान आते-जाते हैं। मेट्रो से स्कूल-कॉलेज आते-जाते हैं।  उत्तम विचार दिया प्रधानमंत्री जी ने। लेकिन उन्होंने केवल यह ही कहा कि मेट्रो से आने-जाने को गर्व से स्वीकार किया जाए। अब केवल मेट्रो की यात्रा को ही गर्व की बात मानने की बात इसलिए कही क्योंकि उन्होंने मेट्रो का उद्घाटन किया और कुछ दूर तक मेट्रो में सफर भी किया। उन्होंने सार्वजनिक सिटी बस सेवा का उद्घाटन तो किया नहीं।

अब मूल बात पर आएं। सार्वजनिक परिवहन सेवा में चलना या सार्वजनिक परिवहन सेवा का रोज उपयोग करना 'गर्व की बात' कैसे हो जाएगी- गर्व के साथ इसका उल्लेख क्यों किया जाए। इसका उत्तर हमारी इस पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में छिपा है। यह पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था समाज में घोर गैरबराबरी पैदा करती है। आज तो यह अपने देश में विकराल रूप में आ खड़ी हुई है। पूंजीवादी व्यवस्था व्यक्तिवाद को बढ़ाती है और तभी उसका विकास होता है। आज सार्वजनिक परिवहन सेवा में चलना गर्व की बात कहना, इस पर उपदेश देना बड़ा आसान है। अगर सार्वजनिक परिवहन सेवा अनिवार्य हो जाए तो देश को कई तरह के प्रदूषण से मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन पूंजीवाद यह नहीं होने देगी-वह धंधा करता है। आज तो कारों का ऐसा काफिला लगा है कि हर गली में लाइन से कारें खड़ी दिखती हैं।

घरों में कार रखने की जगह नहीं-बाहर खड़ी कर रहे हैं। कारों के कारण भयानक ट्रैफिक जाम की समस्या और भयानक प्रदूषण से आमजन परेशान हैं लेकिन रोज ही खासकर त्यौहार पर नये-नये मॉडल की कारें, दोपहिया वाहन के विज्ञापन आते हैं और गर्व के साथ दूसरे दिन अखबारों में प्रकाशित कराया जाता है कि इस वर्ष इतने लाख गाड़ियां बिकीं। मजेदार बात यह कि कार खरीदने, वाहन खरीदने नये-नये 'शुभ मुहूर्त' अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किए जाते हैं।  मीडिया नये कारों के गुण गिनाने में लग जाता है। हालत यह कि जितने भाई उतनी कारें, जितनी बहुएं उतनी कारें। पूंजीवादी 'वैभव प्रदर्शनट की मानसिकता पैदा करता है।

अब अगर यह कहा जाए कि कारों का उत्पादन बंद कर केवल सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया जाए तो लोग ऐसी राय देने वालों पर हंसेंगे। लेकिन कारों का उत्पादन बंद करने की बात नहीं है। बात है पूंजीवाद में व्यक्तिवाद की स्पर्धा को नियंत्रित करने की। लेकिन पूंजीवाद में यह होगा नहीं। इस सैद्धांतिक चर्चा से हटकर इस पर विचार करें कि सार्वजनिक परिवहन को किस तरह बढ़ावा मिले। कारों की बढ़ती संख्या पर क्या नियंत्रण लगाया जाए। लेकिन सरकार खुद पूंजीवादी रास्ते पर चल रही है वह सार्वजनिक उपक्रमों को कमजोर कर एक तरह से उनका अंतिम संस्कार कर उनका स्मारक बना देना चाहती है। हो सकता है पूंजीवादी रास्ते पर चलने वाली हमारी सरकारें सार्वजनिक उपक्रमों के स्मारक तक शेष न रखना चाहें। वे नहीं चाहतीं कि आने वाली पीढ़ी सार्वजनिक उपक्रमों की देन का दर्शन तक करे- वह आने वाली पीढ़ी को घोर आपराधिक पूंजीवादी रास्ता उपहार में देने तत्पर है। सरकारें अपने कर्मचारियों का वेतन इसलिए बढ़ा रही हैं कि पैसा बाजार में आए और माल ऐसा बने कि यूज एंड थ्रो की श्रेणी का हो- तीन-चार साल में नया माल।

टी.वी. सेट एक साल चले, नया लो। मोबाइल के नये-नये सेट। अब 'रिपेयरिंग वर्कशॉप' की अवधारणा ही समाप्त की जा रही है। इसका दुष्परिणाम है कि देश में कचरे का ढेर लग रहा है। इस कचरे को कहां रखा जाए यह समस्या आ गई है। इसके कारण भी भयानक प्रदूषण फैल रहा है। पिछले दिनों में दिल्ली में ऐसे ही कचरे के एक पहाड़ में आग लग गई- भयानक धुआं उठते रहा- प्रदूषण की दोहरी मार झेलनी पड़ी- कहावत है- 'दाद में खुजलीÓ। कार की आकांक्षा अब इतनी बढ़ा दी गई है कि अब प्राय: हर वेतन भोगी एक कार घर में हो, यह इच्छा पालने लगा है। कार लोन की नई-नई स्कीमें पूंजीवाद ने जागृत की है, इस इच्छा को सार्वजनिक परिवहन से यात्रा का उपदेश कैसे समाप्त कर सकता है।

प्रधानमंत्री जी आप इस पूंजीवादी विकास के रास्ते को त्यागने तैयार हैं क्या? क्या जिस रास्ते पर चलने का प्लान बनाकर चुनाव जीता है वह आपको यह रास्ता छोड़ने देगा?

 परिवहन की ही बात क्यों? शिक्षा पर भी बात की जाए। आज सरकारी स्कूलों की दशा के लिए कौन जवाबदार है- पूंजीवादी रास्ते पर चलने वाली हमारी सरकारें। आर्थिक सुधार का नया रास्ता डॉ. मनमोहन सिंह ने खोला। एनडीए सरकार (प्रथम) ने इसे आगे बढ़ाया। पूंजीवादी रास्ते को ही आगे बढ़ाने का काम भाजपा सरकारों ने किया...। भाजपा की अपनी कोई आर्थिक नीति नहीं है। यह तो कांग्रेस की आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाने का काम करती है। भाजपा कांग्रेस की कार्बन कापी है। कांग्रेस अपने 10 साल (2000 से 2014 तक) की अवधि में सुधार के रास्ते पर धीमी गति से चलती रही तो पूंजीवाद ने उसे नकारा और भाजपा पर भरोसा का उससे इस रास्ते पर तेज दौड़ने की उम्मीद की। भाजपा आज पूंजीवादी रास्ते पर फर्राटा दौड़ दिखा रही है। इसलिए मेट्रो ट्रेन या कहें सार्वजनिक परिवहन की यात्रा का गर्व से उल्लेख करने की बात केवल उपदेश है- सुनने में भला लगता है। कार्पोरेट ने इसलिए नहीं दिया कि सार्वजनिक की बढ़ोतरी हो। पूंजीवाद अपने लाभ को देखकर ही देता-लेता है।

 
कोई एक व्यक्ति मेट्रो की यात्रा को गर्व से कैसे बताए जब वह यह देख रहा है कि उसका पड़ोसी रोज कार में जाता है। और एक कार वाला कैसे कुंठित न हो जब वह देख रहा है कि पड़ोसी के पास चार-चार कारें हैं। तो सार्वजनिक परिवहन सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं कब गर्व की होंगी, जब सब पूरा समाज उसका उपयोग करे।

जनता मेट्रो यात्रा पर गर्व करे- और मंत्रीगण, अधिकारी और बड़े लोग क्या करें। वे अपने-अपने  महंगे वाहनों पर गर्व करें। अगर मेट्रो की यात्रा पर गर्व करने की बात है तो प्रधानमंत्री मेट्रो में बैठकर रोज दफ्तर जाएं। उनका पूरा मंत्रिमंडल मेट्रो में सफर करे- अधिकारी मेट्रो में जाए। केवल क्षेत्र के दौरे पर या विशेष अवसर पर ही सरकारी या व्यक्तिगत कार का उपयोग हो। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, अधिकारी सब फ्लैट में रहें। क्यों ऐसा न हो कि प्रधानमंत्री जिस फ्लैट में रहते हैं उसके बाजू के फ्लैट में उनका कोई सहयोगी रहता हो...। काम के लिए दफ्तर हैं। जहां मेट्रो न हो वहां बस से आया-जाया जाए।
 

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