By: Sabkikhabar
30-12-2017 08:19

अगर हम स्थानीय स्तर के बाबाओं को देखें तो उनकी बांबियां भी कम खतरनाक नहीं हैं। रोज नए किस्से हमें सुनाई देते हैं। परंतु हम अपने कानों में पिघला शीशा डाल चुके हैं, जिसकी वजह से हमें कुछ सुनाई नहीं देता। हमारी आंखें व्यक्तिगत स्वार्थ में इतनी चौंधिया गई हैं कि उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता। हाथ तो सिर्फ नोट गिनने के लिए हैं और पैर डर कर भाग जाने भर के लिए। 

यह कमोबेश सुनिश्चित मान लेना चाहिए कि भारतीय समाज विशेषतया पुरुष समाज अब काफी हद तक पौरुषहीन हो चुका है। निर्लज्ज कथित आध्यात्मिक बाबाओं की फेहरिस्त में जुड़ा नवीनतम नाम वीरेंद्र देव दीक्षित है और उसके कारनामे राष्ट्र की राजधानी से होते हुए बरास्ता राजस्थान, उत्तरप्रदेश अब मध्यप्रदेश के इंदौर तक में गूंज रहे हैं। यह नया बाबा पिछले कई दशकों से छोटी-छोटी बच्चियों के माध्यम से उनके माता-पिता को पुरुषार्थ बेच रहा था। लड़कियां इसके आश्रम में अबोध अवस्था में आईं और अब वे प्रौढ़ता को प्राप्त हो चुकी हैं। बाबा उनके माता-पिता को महीने के पैसे भी भेजता था। क्यों? यह तो बाबा ही बता पाएगा या उस धन को प्राप्त करने वाले उनके माता-पिता। गजब का पुरुषार्थी है भारतीय समाज जो कि पुरुषार्थ भी अपनी बेटियों की गुलामी के माध्यम से पाना चाहता है। ऐसा समाज तो शायद धिक्कार का पात्र भी नहीं बचा है। दर्जनों लड़कियां हमारे पड़ोस में कैद हैं, उन पर बेइंतहा जुल्म ढाए जा रहे हैं पर हम अपने घरों में टेलीविजन देख रहे हैं। मजे से खा-पी रहे हैं, मौज-मस्ती कर रहे हैं और इसके बावजूद चाहते हैं कि सामाजिक परिवर्तन आ जाए!

आसाराम बलात्कार का आरोपी है और जेल में बंद है। लेकिन उसके साहित्य का प्रचार करने महिलाएं तक आ रहीं हैं। राम रहीम का किस्सा अभी कानों में गूंज रहा है। हाल ही में सबसे तेजी से उभरते आध्यात्मिक गुरु पर पत्नी की हत्या का आरोप है और वे पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं और तकरीबन सभी प्रमुख हस्तियों से मिल रहे हैं। बड़े मीडिया घरानों से लेकर विशाल औद्योगिक घराने उनकी यात्रा को प्रायोजित करने के लिए सैकड़ों करोड़ रुपए का 'योगदान' कर रहे हैं। अब कौन लिखेगा उनके खिलाफ? ये सब जिनका जिक्र हुआ है ये सब तो राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रवचनकार हैं। महिलाओं के मामले में न सही तो कोई जमीन-जायदाद, आपसी रंजिश, हत्या, पर्यावरण विनाश तक में लिप्त बताए जाते हैं, परंतु समाज के लिए ये अभी भी आदरणीय बने हुए हैं।

अगर हम स्थानीय स्तर के बाबाओं को देखें तो उनकी बांबियां भी कम खतरनाक नहीं हैं। रोज नए किस्से हमें सुनाई देते हैं। परंतु हम अपने कानों में पिघला शीशा डाल चुके हैं, जिसकी वजह से हमें कुछ सुनाई नहीं देता। हमारी आंखें व्यक्तिगत स्वार्थ में इतनी चौंधिया गई हैं कि उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता। हाथ तो सिर्फ नोट गिनने के लिए हैं और पैर डर कर भाग जाने भर के लिए। दूसरे के भरोसे सब कुछ कर लेना चाहते हैं। कुलभूषण जाधव की मां एवं पत्नी के साथ पाकिस्तान ने बेहद शर्मनाक व्यवहार किया जो कि सर्वथा निंदनीय है। हमारे एक जागरुक राजनीतिज्ञ इससे इतने नाराज हुए कि उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के चार टुकड़े कर देना चाहिए। बिल्कुल कर दीजिए। परंतु वह यह मांग क्यों नहीं करते कि जिन आश्रमों में महिलाओं के साथ बदसलूकी हुई है, सबसे पहले उन्हें ध्वस्त किया जाए? फिर कोई अगली कार्रवाई हो। पर वह ऐसा नहीं कहेंगे। क्यों? यह तो उनसे ही पूछा जाए तो ठीक रहेगा। उनके जैसे लोगों की अतिरेक भरी प्रतिक्रिया मूल विषय से ध्यान ही बंटा देती है। कभी सोचा है कि ऐसे युद्ध का परिणाम क्या होगा? कितने जवान शहीद होंगे और अंत में एकाकी जीवन किसे बिताना पड़ेगा? वे शायद इसकी जरूरत ही नहीं समझते।

भारत में मानव तस्वीर को लेकर जो कानून बना हुआ है, उसमें दोषी पाए जाने पर अधिकतम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है। हम सभी जानते हैं कि मानव तस्करी का सर्वाधिक शिकार महिलाएं एवं बच्चे ही होते हैं। परंतु दूसरी ओर गाय की तस्करी पर कई राज्यों में आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। अब आप इन दोनों की तुलना कीजिए और कोशिश कीजिए किसी नतीजे पर पहुंचने की। क्या आप कोई तार्किक निर्णय पर पहुंच पाएंगे? इन नागरूपी बाबाओं की बीन ने व्यापक समाज को इतना सम्मोहित कर रखा है कि उसे इसके द्वारा खोदी गई बांबियों में हो रही नृशंसता का कोई भान ही नहीं हो। पिछले साल उज्जैन में हुए सिंहस्थ (कुंभ) मेले में जो शिविर सबसे भव्य था और जिसमें 'दर्शन' के लिए सबसे लंबी पंक्ति लगी होती थी, वह शिविर बलात्कार के आरोपी एक बाबा का था। इतनी गंभीर परिस्थिति को भी 'यह तो चलते रहता है' कहकर टाल देते हैं।

 
एक बात पर गौर करना चाहिए कि आखिर देश में संविधान है, तमाम कानून हैं, पुलिस है, प्रशासन है अब तो आधार जैसे व्यक्तिगत निगरानी के तमाम उपकरण/औजार भी बन गए हैं। फिर भी इस समस्या को लेकर कोई गंभीरता क्यों न•ार नहीं आ रही? कहीं यह सुविचारित व सुनियोजित षड़यंत्र तो नहीं जिससे कि महिलाएं स्वयं को दोयम दर्जे का मानती रहें? एक किस्म की मानसिक गुलामी का उन्हें आदी बना दिया जाए। गौरतलब है बाबाओं की इन बांबियों को लेकर कोई महत्वपूर्ण नारीवादी अध्ययन भी अभी सामने नहीं आ रहा है। अन्य तमाम सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर तो चर्चा होती है, लेकिन इस नई विक्षिप्तता को लेकर कोई विस्तृत चर्चा नारीवादी व उनसे संबंधित समूहों में बहुत मुखरता से होती न•ार नहीं आ रही है। अर्थात चर्चा का कोई नया दृष्टिकोण या परिप्रेक्ष्य सामने नहीं आ रहा है। सदियों से स्थापित परंपराओं की दुहाई तक इसे सीमित रखा जा रहा है। गर्डा लर्नर ने पितृसत्ता की बेहद परिपूर्ण परिभाषा में कहा है, 'परिवार में महिलाओं और बच्चों पर पुरुषों की वर्चस्व की अभिव्यक्ति और संस्थागतकरण तथा सामान्य रूप से महिलाओं पर पुरुषों के सामाजिक वर्चस्व का विस्तार है। इसका अभिप्राय है कि पुरुषों का समाज के सभी महत्वपूर्ण सत्ता प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण रहता है और महिलाएं ऐसी सत्ता तक पहुंच से वंचित रहती हैं।'

यही पितृसत्ता और पितृवाद ही विश्व की अधिकांश समस्याओं के मूल में है। एक महिला होने के नाते कुलभूषण जाधव की मां व पत्नी के अक्षम्य अपमान को बहुत कुशलता से बिंदी और मंगलसूत्र उतारने तक सीमित कर, उसे पारिवारिक सीमाओं में बांध दिया जाएगा। जबकि बात परिपूर्णता में और महिलाओं के अधिकारों और उनके उपयोग को लेकर होना चाहिए। इश पूरी बहस को फिर एक बार धर्मविशेष से जोड़कर देखने की बाध्यता समाप्त की जानी चाहिए और तर्क भारतीय महिला के अधिकारों पर ही होना चाहिए। 

मूल मुद्दे पर लौटते हैं। भारत में इन बाबाओं का इस्तेमाल तमाम सामाजिक समूह महिलाओं पर बंदिशें लगाने के लिए भी करते हैं। ड्रेस कोड आदि पर वे सीधे टिप्पणी से करने से बचने के लिए व महिलाओं को पूर्व निर्धारित सीमाओं में बांधे रखने में इन बाबा व उनकी बांबियों के प्रयोग को स्वीकार्यता मिलती है। वरना क्या वजह है कि इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं पर अत्याचार होने पर समाज में कोई उबाल नहीं आता जबकि निर्भया जैसे मामलों में हम जबरदस्त सामाजिक प्रतिक्रिया देख चुके हैं। तो फिर ऐसा क्या है कि धर्म की बात आते ही हम अपनी संतानों को अपनी ही इच्छा से देवदासी बना देते हैं? उनकी याचना भी मां-बाप को डिगा नहीं पाती? अपने लिए स्वर्ग की कामना क्या अपनी बेटी को नर्क में धकेलने से ही पूरी होगी? हम कब उन्हें बराबरी का हक देने को तैयार होंगे या हमें कुछ सदी तक एक महिला सशस्त्र क्रांति की जमीन तैयार करनी होगी?

एक लड़ाई महिलाओं ने सन् 1980 में तब शुरू की थी जब महाराष्ट्र के एक पुलिस स्टेशन में 17 वर्षीय आदिवासी लड़की मथुरा के साथ हुए बलात्कार के बाद महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने बलात्कारियों को यह कहते हुए रिहा कर दिया था कि 'मथुरा के कई प्रेमी हैं, उसका चरित्र खराब है।' एक और लड़ाई राजस्थान में भंवरी देवी ने शुरू की है, जो बलात्कारी सवर्णों के रिहा हो जाने को लेकर है। अब आवश्यकता है कि एक व्यापक संघर्ष इन कथित बाबाओं और उनकी आश्रमरूपी बांबियों के खिलाफ हो और उसे नियत अंजाम तक पहुंचा जाए। आवश्यकता इस बात की है प्रत्येक ऐसे स्थान का जहां महिलाओं का बड़ी संख्या में जाना और निवास शामिल है, को लगातार सामाजिक निगरानी में रखे जाने की पहल हो और इनकी गोपनीयता को समाप्त किया जाए। वरना तो स्थितियां ऐसी ही बनी रहेंगी। मुंशी अनवार हुसैन 'तसलीम' ने लिखा है-
 

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