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मर्यादाओं का निर्धारण कौन करे और कैसे?

By Sabkikhabar :27-12-2017 07:49


धर्म और आस्थाओं की स्वतंत्रता, तद्नुकूल आचरण और व्यवहार उस सीमा तक अनुमन्य है जब तक वह किसी कानून का उल्लंघन न करे। वैयक्तिक रूप से आपके विश्वास कहां और कितने समाहित हैं, अपने जीवन में आप उनका कितना और किस प्रकार अनुसरण करते हैं, प्राचीन मर्यादाओं व मान्यताओं को, जो विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं, किसी का अनुसरण करते हैं या नहीं, इससे तब तक किसी सरकार को कोई मतलब नहीं, जब तक आप कोई कानून नहीं तोड़ते। विधिक सीमाओं में आपको नई मान्यताओं व विश्वासों को संचालित, प्रचारित एवं प्रसारित करने के लिए कोई संस्था बनाने का भी पूरा अधिकार है, बशर्ते आप लोगों को उसमें उनकी इच्छा से शामिल करते हों। ऐसे में, किसी विवाद की स्थिति में सम्बद्ध व्यक्ति का, वह महिला हो या पुरुष, कथन या स्वीकारोक्ति ही किसी कार्रवाई के निर्धारण के लिए निर्णायक हो जाती है।

राजधानी दिल्ली के रोहिणी इलाके में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय्य के नाम से चलाई जा रही एक संस्था या कि आश्रम इन दिनों चर्चा में है, जिसके रचयिता व संचालक वीरेन्द्र देव दीक्षित नाम के व्यक्ति हैं। दीक्षित की गणना संतों में होती है और देश के कई हिस्सों में फैली उनकी संस्था पर आरोप है कि उसमें महिलाओं को उनकी इच्छा के विपरीत बंधक बनाया और बन्द किया जाता रहा है। खुद दीक्षित के खिलाफ भी कई गम्भीर आरोप हैं। सबसे बड़ा यह कि वे रंगीले बाबा हैं और धर्म के नाम पर पापाचार कर रहे हैं। महिलाओं से कहते हैं कि मैं तुम्हारा कृष्ण और तुम सब हमारी गोपियां। यह कहकर वे महिलाओं से शारीरिक सम्बन्ध भी बनाते हैं।

पुलिस ने प्रतिरोध के बीच उनके दिल्ली 'आश्रमÓ के विभिन्न कमरों में बंद 41 लड़कियों को निकाल लिया है, जबकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि उसकी देश भर में जितनी भी शाखाएं हैं, उनकी जांच-पड़ताल की जाए। उत्तर प्रदेश में कई केन्द्रों की जांच शुरू भी कर दी गई है, जिनमें फर्रुखाबाद, बांदा और बस्ती के केन्द्र शामिल हैं। 'आश्रम' की शाखाएं विदेशों में भी बताई जाती हैं। 

सवाल है कि देश में धर्म, मजहब, आस्था व विश्वास के नाम पर कहां, क्या व कैसे हो रहा है, उसमें कितना मर्यादित है, कितना अमर्यादित, कितने की विधिक स्वतंत्रताएं प्राप्त हैं, कितने की नहीं, यानी क्या उचित और क्या अनुचित है, इसका निर्धारण कैसे किया जाये? जवाब इसलिए जरूरी है कि जिन्हें जांच के अधिकार दिये जाते हैं, वे विधिक सीमाओं से परे कोई कार्रवाई नहीं कर सकते, न किसी को आरोपी बताकर उसके विरुद्ध कोई प्रक्रिया ही शुरू कर सकते हैं। 

धर्म और आस्थाओं की स्वतंत्रता, तद्नुकूल आचरण और व्यवहार उस सीमा तक अनुमन्य है जब तक वह किसी कानून का उल्लंघन न करे। वैयक्तिक रूप से आपके विश्वास कहां और कितने समाहित हैं, अपने जीवन में आप उनका कितना और किस प्रकार अनुसरण करते हैं, प्राचीन मर्यादाओं व मान्यताओं को, जो विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं, किसी का अनुसरण करते हैं या नहीं, इससे तब तक किसी सरकार को कोई मतलब नहीं, जब तक आप कोई कानून नहीं तोड़ते। विधिक सीमाओं में आपको नई मान्यताओं व विश्वासों को संचालित, प्रचारित एवं प्रसारित करने के लिए कोई संस्था बनाने का भी पूरा अधिकार है, बशर्ते आप लोगों को उसमें उनकी इच्छा से शामिल करते हों। ऐसे में, किसी विवाद की स्थिति में सम्बद्ध व्यक्ति का, वह महिला हो या पुरुष, कथन या स्वीकारोक्ति ही किसी कार्रवाई के निर्धारण के लिए निर्णायक हो जाती है।

हम जानते हैं कि विभिन्न धर्मों व मान्यताओं में विभाजन की प्रक्रिया अनवरत रूप से चली आ रही है। हिन्दुओं के मामले में तो यह प्रक्रिया अनन्त तक पहुंची है। इस अर्थ में कि उसकी परिणतियों की गणना कर उनकी संख्या ही नहीं बताई जा सकती। इसमें 18 ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो अपने को भगवान कहते हैं। इन भगवानों में एकता व एकात्मकता भी नहीं ढूंढी जा सकती। भले ही कई शंकराचार्यों के अदालतों से वैध या अवैध घोषित होने के बाद उनके नये उत्तराधिकारियों की खोज हो रही है, कई ऐसे महामान्य हैं, जिनके शिष्यों की संख्या हजारों और लाखों में है। उनमें से कई महिलाओं के साथ दुराचार व असंगत व्यवहारों का दंश झेल रहे और विभिन्न आरोपों में जेलों में बन्द हैं। उन्हें न्यायालयों से जमानत तक नहीं मिल पा रही। ईसाई, सिख, बौद्ध व जैन आदि धर्म भी विभिन्न खेमों में बंटे हुए हैं। 

 
इसके बावजूद आस्थाओं का आलम ऐसा है कि एक आश्रमाधीश, जिन्हें आसाराम के नाम से जाना जाता है, जेल से पेशी पर आते हैं तो उनका दर्शन कर पैर छूने वालों में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या राज्यपाल पद पर आसीन लोग भी होते हैं। वे अपने 'गुरु' में कोई विकृति देखने को तैयार नहीं हैं और उन पर लगाये गये या विचाराधीन आरोपों को भी स्वीकार नहीं करते। 

ऐसे ही, वीरेन्द्र देव दीक्षित के आश्रमों से जो महिलाएं बरामद की गई हैं, उनमें से ज्यादातर का कहना है कि हमारे गुरु के रूप में वे साक्षात ईश्वर हैं। उन्होंने हमारी इच्छा के विपरीत न तो कुछ किया है और न उनके किसी कार्य को लेकर हमें ऐसी कोई आपत्ति है, जिसकी जवाबदेही के लिए उनको न्यायालय में प्रस्तुत होना पड़े। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करके निर्धारित तिथि पर न्यायालय में उपस्थित करने का आदेश दे रखा है, लेकिन जिन कुछ महिलाओं ने उनके खिलाफ दुराचार की शिकायतें दर्ज कराई हैं, उनकी विवेचना होना बाकी है। इसके लिए आरोप लगानेवालियों की डॉक्टरी जांच के साथ ही आरोपित की तलाश स्वाभाविक है, जिससे उसका पक्ष जानकर तदनुकूल विधिक कार्रवाई की जाए। 

प्रसंगवश, दीक्षित के खिलाफ पापाचारी, दुर्व्यवहारी, व्यभिचारी और असाधु प्रकृति वाला होने के आरोपों को संवाद माध्यमों में भी प्रचारित किया जा रहा है, क्योंकि लोकमान्यता है कि विवाह के बिना किसी महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाना या रखना अनुचित व दोषपूर्ण है। लेकिन इस सवाल का क्या किया जाए कि संविधान में लैंगिक आधार पर भेदभाव का कोई प्रावधान ही नहीं है तो किसी महिला के दूसरे से सम्बन्ध हों भी तो जब तक वह शिकायत न करे, उसके मामले में कोई कार्रवाई कैसे हो सकती है? आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दे रखी है कि वयस्क मर्दों व औरतों को बिना शादी के भी स्वेच्छा से साथ रहने यानी 'लिव इन' का अधिकार है और उनसे बच्चों का जन्म होता है तो उन्हें सम्पत्ति व उत्तराधिकार का हक मिलने में विवाह नाम की संस्था या लोकमान्यता बाधक नहीं होगी। इतर धर्मावलम्बी के साथ शादी-विवाह को लेकर आपत्तियां की जाती हैं, तो भी न्यायालय का निर्णय वयस्कता और सहमति पर आधारित होता है। क्योंकि इतर धर्मावलम्बी कहकर किसी की इच्छाओं और निर्णयों को रोका नहीं जा सकता और माता-पिता या परिजनों की स्वीकृति उसके अवयस्क रहने तक ही सीमित है। वयस्कता के बाद माता-पिता की असहमति भी उसे विवाह करने से रोकने में सक्षम नहीं है। 

बहरहाल, दीक्षित प्रकरण में कृष्ण, गोपियों और रासलीला के किस्से भी जोड़ दिये गये हैं, जिससे उसे धार्मिक आवरण या रंग दिया जा सके। लेकिन विधिक कसौटी पर कसेंगे तो यही देखना होगा कि सम्बन्ध के पीछे अस्वीकार्यता थी या जोर-जबरदस्ती। सम्बन्ध के पूर्व और बाद की अस्वीकार्यताओं पर भी विचार करना होगा। अलबत्ता, यह एक खुला हुआ तथ्य है कि देश का जनमानस साधुओं-सन्तों और महिलाओं के सम्बन्धों को सहज रूप से स्वीकार नहीं करता, उनके आत्मसंयमी व ब्रह्मचारी होने पर जोर देता है। लेकिन कई लोग ऐसे ऋषि-मुनियों के उदाहरण भी देते हैं, जो गृहस्थ और बाल-बच्चों वाले थे। 

सवाल फिर वही कि मर्यादाओं का सवाल उठे तो उनका निर्धारक कौन हो? विभिन्न प्रकार की मान्यताओं से गुजरकर आदर्शों के नये मानक बनाना क्या किसी भी सरकार के लिए आसान होगा? खासकर, जब आस्था और विश्वास की मर्यादाएं भी परिभाषित नहीं हैं। साथ ही सरकार मानती है कि उसे धार्मिक मान्यताओं के निर्धारण के पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि संविधान इसकी इजाजत नहीं देता। कुछ लोग इस सबको नई परम्परा और अपनी वैयक्तिक स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता से जोड़ सकते हैं, लेकिन मूल तो संविधान ही होगा। वही तय करेगा कि मान्यताओं के क्षेत्र कितने व्यापक या संकुचित हों।
 

Source:Agency