Breaking News

Today Click 521

Total Click 283676

Date 18-12-18

प्रधानमंत्री जी! क्या ऐसे ही दोगुनी होगी किसान की आय

By Sabkikhabar :26-12-2017 07:46


गुजरात और हिमाचल के नतीजे बताते हैं कि किसान को नाराज कर कोई इस देश पर शासन नहीं कर सकता। यही वजह है कि किसानों की मदद के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे आए हैं। किसानों की कर्ज माफी, उर्वरकों के दाम, सिंचाई की सुविधाएं, पंचायतों को अनुदान, स्वच्छ भारत, नारी सशक्तिकरण, ग्रामीण अंचल में सड़कें और विद्युतीकरण के अलावा किसानों को कृषि उपज के सही दाम मिलने की दिशा में कई फैसले हुए। इस दौरान प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक ने साल 2017-18 के लिए नई ब्याज अनुदान योजना को भी मंजूरी दी। इस योजना का मकसद किसानों को उचित ब्याज दर पर कृषि कर्ज उपलब्ध कराना है, जिससे फसल उत्पादन में बढ़ोतरी हो सके। 

आज देश में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए किसान किस तरह हाशिए पर है, इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि किसान दिवस बीत गया और किसी को हवा तक नहीं लगी। कहने के लिए तो हर साल 23 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह के जन्मदिन से किसान दिवस मनाया जाता है, पर रस्म अदायगी के अलावा इस दिन और इसके बाद भी किसानों के लिए कुछ भी नहीं होता।  जबकि चौधरी साहब का मानना था कि बगैर किसानों को खुशहाल किए देश व प्रदेश का विकास नहीं हो सकता। किसानों की खुशहाली के लिए उन्होंने खेती पर बल दिया था। उनका कहना था कि भारत का संपूर्ण विकास तभी होगा जब किसान, मजदूर, गरीब सभी खुशहाल होंगे।

उन्होंने खेती और गांव को महत्व दिया। कहते हैं साल 1952 में चौधरी चरणसिंह की मेहनत के कारण ही 'जमींदारी उन्मूलन विधेयक'  पारित हो सका। इस एक विधेयक ने सदियों से खेतों में खून-पसीना बहाने वाले किसानों को जीने का मौका दिया।  चकबंदी अभियान के दौरान 27000 पटवारियों का त्यागपत्र स्वीकार कर 'लेखपाल' पद का सृजन और नई लोगों को रोजगार ने उन्हें किसानों के मसीहा के रूप में स्थापित कर दिया। पंडित जवाहर लाल नेहरू की हरित क्रांति और कृषि विकास के लिए जल और बिजली के निर्माण हेतु बड़े बांधों के निर्माण, जिसे वह आधुनिक भारत का मंदिर कहते थे, व उनके उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री जिन्होंने 'जय जवान-जय किसानÓ  का नारा दिया था, किसानों के लिए इतने गंभीर प्रयास कभी नहीं हुए थे।

तमाम सरकारी दावों के बावजूद आज किसानों की बदहाली का आलम क्या है, इसे हम तीन अलग-अलग समय की तीन अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के सर्वेक्षण से ही देखते हैं। साल 2003 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के सर्वे ने यह खुलासा किया था कि खेती अब किसानों के लिए मुनाफे का सौदा नहीं रह गई है, ऐसे में अगर किसानों के पास खेती छोड़ने का विकल्प हो तो करीब 40 फीसदी से अधिक किसान खेती छोड़ देंगे। कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन की अगुआई में बने राष्ट्रीय कृषक आयोग ने दावा किया कि एक किसान की औसत आय सरकारी दफ्तर में काम करने वाले चपरासी से भी कम है। पर सरकार नहीं चेती।

इसके बाद सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज ने भारत कृषक समाज नामक एक गैर-राजनीतिक किसान संगठन की ओर से दिसंबर, 2013 से जनवरी, 2014 के बीच देश के 18 राज्यों में करीब 5,350 किसानों के बीच एक सर्वेक्षण कर दावा किया कि देश में किसानी से होने वाले घाटे का आलम यह है कि अगर शहरों में नौकरी मिले तो 61 फीसदी किसान खेतीबाड़ी छोड़ देंगे। इन किसानों का कहना था कि खेती से होने वाली आमदनी उनकी जरूरत पूरी नहीं कर पाती। सर्वे में शामिल करीब 67 फीसदी महिलाओं ने कहा कि खेती से होने वाली आमदनी घर का खर्च चलाने के लिए नाकाफी होती है। 10 किसान परिवारों में से एक परिवार को अकसर भूखे पेट रहना पड़ता है। लगभग 36 फीसदी किसान या तो झोपड़ियों में रहते हैं या कच्चे मकानों में और 44 फीसदी किसान कच्चे-पक्के मकानों में रहते हैं। केवल 18 फीसदी किसानों के पास ही पक्के मकान हैं।

 
साफ है किसानों की आर्थिक बदहाली इसलिए बदस्तूर जारी है क्योंकि उन्हें अपनी उपज का सही दाम नहीं मिल रहा। सरकार का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) उनकी मदद नहीं कर पा रहा। वैसे भी यह समर्थन मूल्य केवल 20 फसलों तक ही सीमित है, वह भी उन चुनिंदा राज्यों में, जहां सरकारी एजेंसियां अनाज खरीदती हैं। मजबूरन फसल कटाई के बाद किसान भारी मात्रा में उसे औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर होते हैं। इसी सर्वेक्षण में एक हैरान करने वाला तथ्य यह पता चला कि करीब 62 फीसदी किसानों को एमएसपी के बारे में पता ही नहीं। यानी सरकारी योजनाओं का लाभ केवल अमीर किसानों को ही मिला।

यही वजह है कि देश में किसान धीरे-धीरे घट रहा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में आबादी तो बढ़ रही है, पर किसान घट रहे हैं। साल 1991 में देश में जहां 11 करोड़ किसान थे, वहीं 2001 में उनकी संख्या घटकर 10.3 करोड़ रह गई, जबकि 2011 में यह आंकड़ा और घटकर 9.58 करोड़ हो गया। मतलब हर रोज 2,000 से ज्यादा लोग खेती छोड़ रहे हैं।

इसी बीच राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की 'एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया' शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट ने खुलासा किया कि किसानों के आत्महत्या करने की रफ्तार बढ़ रही है। साल 2014 में जहां आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5,650 और कृषि मजदूरों की संख्या 6,710 थी, वहीं 2015 में 8,007 किसानों ने जबकि चार 4,595 कृषि मजदूरों ने मौत को गले लगा लिया। किसान आत्महत्या के मामले में एक साल में 42 प्रतिशत की चिंताजनक वृद्धि हुई थी। एनसीआरबी रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या के लिए बैंकों और माइक्रो फाइनेंस को जिम्मेदार माना गया।

गुजरात और हिमाचल के नतीजे बताते हैं कि किसान को नाराज कर कोई इस देश पर शासन नहीं कर सकता। यही वजह है कि किसानों की मदद के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे आए हैं। किसानों की कर्ज माफी, उर्वरकों के दाम, सिंचाई की सुविधाएं, पंचायतों को अनुदान, स्वच्छ भारत, नारी सशक्तिकरण, ग्रामीण अंचल में सड़कें और विद्युतीकरण के अलावा किसानों को कृषि उपज के सही दाम मिलने की दिशा में कई फैसले हुए। इस दौरान प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक ने साल 2017-18 के लिए नई ब्याज अनुदान योजना को भी मंजूरी दी। इस योजना का मकसद किसानों को उचित ब्याज दर पर कृषि कर्ज उपलब्ध कराना है, जिससे फसल उत्पादन में बढ़ोतरी हो सके।

इस योजना के दायरे में सरकारी के साथ निजी, सहकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों को शामिल किया गया और लागू किए जाने की जिम्मेदारी भारतीय रिजर्व बैंक और नाबार्ड को दी गई। इस योजना के तहत किसानों को तीन लाख रुपए तक का कर्ज पर केवल चार फीसदी ब्याज पर देने की बात कही गई। केंद्र सरकार ने इस मद के लिए 20,339 करोड़ रुपए आबंटित भी कर दिए. प्रधानमंत्री बाजार के नियमों को भी किसानों के हक में करना चाहते हैं। डिजिटल इंडिया और आधार निर्धारित भुगतान प्रणाली इसी दिशा के बढ़े हुए कदम हैं। इन्हीं सबके भरोसे प्रधानमंत्री का दावा है कि पांच साल में किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। पर अगर केवल वादों और दावों से पेट भरता तो इस देश में कोई भूखा मरता ही नहीं। फिर खेती के हलके में बड़े पूंजीपति घरानों का घुसना और खुदरा बाजार में भी उनका दखल, किसान और किरानियों के लिए एक अलग तरह की समस्या हैं, समय रहते अगर इनसे नहीं निबटा गया, तो अन्नदाता का नाराज होना हमें कहां ले जाएगा, कहना मुश्किल है।

Source:Agency