By: Sabkikhabar
25-12-2017 07:52

येरूशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के अमरीकी फैसले को संयुक्त राष्ट्र संघ ने नकार दिया है। येरूशलम को इजरायल की राजधानी मानने के फैसले को रद्द करने के प्रस्ताव पर संरा महासभा में मतदान हुआ। जिसमें भारत समेत 128 देशों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में अपना मत दिया, जबकि केवल 9 वोट इसके खिलाफ पड़े। यानी ये 9 देश अमरीका के समर्थन में थे। 35 देशों ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया। संरा में हुए इस मतदान से फिलीस्तीन-इजरायल संघर्ष में दुनिया का झुकाव फिलीस्तीन की ओर नजर आया ही, उसके अलावा तीन और बातें उभर कर सामने आई हैं। पहली, दुनिया पर अमरीकी धौंस को अधिकतर देशों ने नकार दिया है। दूसरी, संयुक्त राष्ट्र की महत्ता पुनर्स्थापित हुई। तीसरी, भारत में नेहरूयुगीन विदेश नीति की प्रासंगिकता फिर स्पष्ट हुई। 

गौरतलब है कि येरूशलम इस्लाम, ईसाई और यहूदी, तीनों धर्मों का उद्गम स्थल है और इस नाते विश्व की बड़ी आबादी के लिए काफी महत्व का शहर है।  1947 में संयुक्त राष्ट्र ने येरूशलम को अलग से अंतरराष्ट्रीय नगर का दर्जा दिया था और इसके प्रशासन पर अंतरराष्ट्रीय देखरेख का फैसला किया था लेकिन 1948 में स्वतंत्र इजरायल के अस्तित्व में आते ही अरब-इजरायल युद्ध हुआ। 1949 में युद्ध समाप्त होने पर आर्मिटाइस सीमा खींची गई, जिसे ग्रीन लाइन भी कहा जाता है, क्योंकि यह हरे रंग की स्याही से नक्शे पर खींची गई थी। आर्मिटाइस सीमा से शहर का पश्चिमी हिस्सा इजरायल और पूर्वी हिस्सा जॉर्डन के हिस्से में आया लेकिन 1967 के तीसरे अरब-इजरायल युद्ध में इजरायल ने येरूशलम के पूर्वी हिस्से को भी जीत लिया।

1980 में इजरायल ने इसे अपनी राजधानी घोषित किया तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव पारित कर पूर्वी येरूशलम पर इजरायल के कब्जे की निंदा की और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। 22 साल पहले 1995 में यू एस कांग्रेस ने येरूशलम को फिर इजरायल की राजधानी घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया, लेकिन तब से लेकर अब तक तमाम राष्ट्रपति इसके कूटनीतिक परिणामों को समझते हुए, इसे अमल में लाने से कतराते रहे। सत्ता के मद में चूर डोनाल्ड ट्रंप ने शायद सोचा हो कि जो काम मेरे पूर्ववर्ती न कर पाए, उसे मैं कर दूंगा, तो दुनिया में मेरी धाक बढ़ जाएगी। उन्होंने तो मतदान के पहले बाकायदा धमकी भी दे दी कि अगर अमेरिका के खिलाफ वोट किया तो आर्थिक मदद रोक दी जाएगी। लेकिन उनकी यह धौंसपट्टी बेकार हो गई। माना कि दुनिया भर के देशों में अमेरिका की आर्थिक और सामरिक घुसपैठ है, लेकिन इसका ये मतलब तो कतई नहीं कि सब अपनी स्वायत्तता उसके दरवाजे पर गिरवी रख दें।

 
भारत भी बीते कुछ समय से अमेरिका का दोस्त देश बन गया है और इजरायल से भी वह सामरिक सौदे सबसे ज्यादा करता है। कुछ समय पहले इजरायल की यात्रा पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गए थे और वहां काफी दोस्ताना अंदाज में नजर भी आए। भाजपा सरकार हमेशा नेहरूवादी नीतियों और आदर्शों की मुखालफत करती  है, लेकिन अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जाकर फिलीस्तीन के समर्थन में वोट डालने का उसका निर्णय सही है और इस बात को साबित करता है कि नेहरू जी द्वारा अपनाई गई दशकों पुरानी विदेश नीति ही आज भी भारत के लिए प्रासंगिक है और हमेशा रहेगी।

अमेरिका और इजरायल से आर्थिकऔर सामरिक संबंधों के बावजूद भारत अरब देशों की उपेक्षा नहीं कर सकता। उसकी अपनी लोकतांत्रिक, उदारवादी पहचान के लिए भी यह जरूरी है। रहा सवाल इजरायल और अमेरिका से भावी रिश्तों का, तो उस पर फिलहाल कोई खतरा नहीं दिख रहा है। संरा में अमरीकी राजदूत निकी हेली ने इजरायल का समर्थन किया, वे भारतीय मूल की हैं और इसका अच्छा असर इजरायल पर पड़ा। उधर नए साल के मौके पर भारत स्थित अमरीकी दूतावास ने ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, इस गीत को ट्वीट कर भारत को बधाई दी है, जिससे जाहिर होता है कि अमेरिका भी भारत की दोस्ती का तलबगार है। 
 

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