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'ईवीएम' पर अविश्वास लोकतंत्र पर खतरे की घंटी!

By Sabkikhabar :20-12-2017 07:31


ईवीएम पर उठते सवालों कहीं निर्वाचन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही खतरे में न डाल दें इस पर राजनीतिक दलों को सोचना पड़ेगा। क्योंकि यदि बैलेट से लोगों ने अपनी सरकार को चुनने में भरोसा डगमगाया तो उसके दीर्घगामी परिणाम होंगें। चुनाव आयोग को चुनाव की पद्धति के बारे में सोचना पड़ेगा कि वह किस माध्यम से चुनाव कराये जिससे लोग उस पर उंगली न उठा सकें। जल्दी चुनाव परिणाम आने या कम खर्च होने के तर्क से चुनाव का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है क्योंकि यदि तकनीक में अति आधुनिक दूसरे देश बैलेट के जरिए चुनाव करा सकते हैं तो भारत क्यों नहीं? सवाल माध्यम का नहीं उस भरोसे का है जहां लोग यह समझ सकें कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हुए हैं।

भारतीय लोकतंत्र में ईवीएम की सेटिंग को लेकर लोगों की शंका मन में धीरे-धीरे पैठ बना रही है जो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। क्योंकि जिन दिन जनता का विश्वास बैलैट के जरिये बदलने के अधिकार से डगमगा जायेगा उस दिन लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा संकट पैदा हो जायेगा। देश के विभिन्न हिस्से आतंकवाद और नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहे हंै जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के लिए एक व्यक्ति को सेना को जीप से बांधकर ढाल बनाने की कोशिश की जाती है जो महज एक घटना नहीं लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चुनौती देती है कि हमें कैसे-कैसे हालातों से निपटना पड़ रहा है। प्रचण्ड बहुमत से उत्तर प्रदेश में मोदी की भाजपा के देश में सत्तारूढ़ होने तथा प्रदेश में 2017 के चुनाव के बाद आये परिणामों में जब बहुजन समाज पार्टी की नेता सुश्री मायावती ने ईवीएम के सवाल उठाये थे तो अन्य दलों ने दबे सुर से ही सही उनका समर्थन किया था।

निर्वाचन आयोग पर शक की सुई गहराई थी और निर्वाचन आयोग ने भी राजनीतिक दलों को चुनौती दी थी कि मशीनों को हैक करके दिखा दो लेकिन हम मशीन को अन्दर से नहीं खोलने देंगे। 'आप' ने चुनौती स्वीकार की लेकिन इसके मदरबोर्ड को देने की मांग की जिसके लिए निर्वाचन आयोग तैयार नहीं हुआ। तब यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही थी क्योंकि माहौल को देखते हुए लोगों के सवाल फीके पड़ गये थे लेकिन त्रिस्तरीय नगरनिकाय चुनाव के परिणाम आने के ईवीएम के परिणामों और बैलेट पेपर के परिणामों के बाद एक बार फिर से ईवीएम विपक्षी राजनीतिक दलों के निशाने पर आ गई है।

लोकसभा चुनाव 2014 के बाद से ही ईवीएम को लेकर शंका व्यक्त की जा रही है। लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को उत्तर प्रदेश से रिकार्ड जीत मिली पहली बार भाजपा को 80 में अकेले 71 सीटें मिली थीं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 के बाद जब भारतीय जनता पार्टी को अकेले ही 312 सीटें मिली और सहयोगियों के साथ कुल 325 सीटें हासिल कीं तो विपक्ष फिर सन्न रह गया। बहुजन समाज पार्टी की नेता सुश्री मायावती ने चुनाव परिणामों पर शंका जाहिर करते हुए भाजपा की जीत का श्रेय ईवीएम को दिया। उनका तर्क था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां से भारतीय जनता पार्टी को सफलता मिली वहां बसपा ने आरोप लगाया कि दलित मुस्लिम गठजोड़ का आधार बनाया था इसलिए मुस्लिम बहुल इलाकों से भाजपा की जीत के सीधे मायने है कि ईवीएम में सेटिंग हुई है।

आप पार्टी नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी ईवीएम पर सवाल उठाये। मध्यप्रदेश के उपचुनाव में भी यह सवाल उठे। अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव आयोग की चुनौती को स्वीकार करते हुए ईवीएम के मदरबोर्ड को मांगा जिसे चुनाव आयोग ने नहीं दिया। चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों द्वारा उठाई गई शंका पर ईवीएम को हैक करने की चुनौती दे डाली। यद्यपि इस चुनौती को सिर्फ आप ने ही स्वीकार किया। विपक्षी दलों की शंका पर चुनाव आयोग भी आग-बबूला हो उठा उसने मांग की कि उसके खिलाफ इस तरह के आरोपों को कंटेम्प्ट आफ  कोर्ट यानि आयोग की अवमानना जैसा माना जाये और उसे भी अधिकार दिया जाय जिस प्रकार न्यायिक अवमानना के मामले में कोर्ट को है। खैर आयोग को यह अधिकार तो नहीं मिला लेकिन उत्तर प्रदेश में ईवीएम से चुनाव कराने के नाम पर जिस राज्य निर्वाचन आयोग ईवीएम को लेकर हो हल्ला मचाया था, पुरानी मशीनों के बजाय महाराष्ट्र की मशीनों पर भरोसा करके चुनाव कराये थे उन पर भी सत्तारूढ़ दल को छोड़ दिया जाए तो अन्य दलों ने सवाल उठाये। 

 
बहुजन समाज पार्टी के सुर में विधानसभा चुनाव में आधे-अधूरे मन से लेकिन महापौर के चुनाव में सुर मिलाते हुए संवाददाताओं को बताया कि ईवीएम और बैलेट पेपर के चुनाव परिणाम अलग-अलग क्यों हैं? यह बात दूसरी है कि दोनों ही चुनाव अलग-अलग ही हुए। नगरमहापालिका के चुनाव ईवीएम से और नगर पंचायतों, नगरपालिकाओं के सभासदों के चुनाव बैलट पेपर से कराये गये। नगरमहापालिका की 16 मेयर की सीटों में भाजपा को 14 सीटें बसपा को दो सीटें मिलीं जबकि नगरपालिका अध्यक्षों के चुनाव में भाजपा को 70 बसपा को 29 सपा को 45 कांग्रेस को 09 तथा अन्य को 43 सीटें मिलीं। इसी प्रकार नगर पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा को 100, बसपा को 45, सपा को 83, कांग्रेस को 17 आप को 02 तथा अन्य को 182 सीटें मिलीं। पार्षदों के चुनाव में भाजपा को 596, बसपा को 147, सपा को 202, कांग्रेस को110, आप को 03, अन्य को 222 सीटें मिली। सभासदों में भाजपा को 1585, बसपा को 477, सपा को 930, कांग्रेस को 271 आप को 36 तथा अन्य को 7229 सीटें प्राप्त हुईं।  

 प्रदेश के 16 मेयर तथा उनके पार्षदों की सीटों को छोड़ दिया जाय तो पूरे चुनाव बैलेट पेपर के जरिए ही हुए हैं। सिर्फ  नगर निगमों के चुनाव ही ईवीएम से हुए हैं। दोनों चुनाव के परिणामों में भारी अन्तर हैं। इस अन्तर को विपक्षी दल ईवीएम से जोड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुजन समाज पार्टी से कहा कि यदि उसे भरोसा नहीं है तो अपने महापौरों से इस्तीफा दिला दे मैं बैलेट से चुनाव करा दूंगा। 

 ईवीएम को लेकर लोगों के मन में शंका का पैदा होना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। 16 महापौर के चुनाव में एक भी सीट न मिलने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ईवीएम पर सवाल खड़े किये कि निकाय चुनाव में भाजपा को वहां सर्वाधिक सफलता मिली जहां ईवीएम से चुनाव हुए जबकि जहां बैलेट पेपर से चुनाव हुए वहां उसे 15 फीसदी सीटें ही हासिल हो पाई हैं शेष सीटें विपक्ष के खाते में गई हैं। ट्वीट में उन्होंने लिखा कि 'भाजपा ने बैलेट पेपर से हुए चुनाव में सिर्फ 15 फीसदी सीटें जीतीं जबकि ईवीएम से हुए चुनाव में भाजपा को 46 फीसदी सीटों पर जीत मिली।' वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ कदावर चर्चित नेता मो. आजम खां ने कहा है कि ईवीएम में टेम्परिंग का मामला नहीं सेटिंग की जा रही है। जहां ईवीएम से मतदान हुआ वहां अधिकांश भाजपा जीती और जहां बैलेट से मतदान हुआ उनमें से अधिकंाश में सपा जीती।

 बसपा अध्यक्षा मायावती ने इन चुनावों के बाद एक बार फिर दोहराया है कि ईवीएम में गड़बड़ी की गई। उनका कहना है कि भाजपा कहती है कि उसे देश में बहुमत मिला है। 2019 के चुनाव बैलेट से करा लें पता चल जायेगा। यदि चुनाव बैलेट पेपर से हो तो भाजपा की हार होगी। यदि भाजपा ईमानदार है और लोकतंत्र पर उसे भरोसा है तो ईवीएम को खत्म कर बैलेट पेपर से चुनाव कराये। निकाय चुनाव में सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल का आरोप लगाया।

ईवीएम मशीनों को लेकर जिस प्रकार पूरे देश में 2014 के बाद वातावरण बना है वह निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। ईवीएम पर उठते सवालों कहीं निर्वाचन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही खतरे में न डाल दें इस पर राजनीतिक दलों को सोचना पड़ेगा। क्योंकि यदि बैलेट से लोगों ने अपनी सरकार को चुनने में भरोसा डगमगाया तो उसके दीर्घगामी परिणाम होंगें। चुनाव आयोग को चुनाव की पद्धति के बारे में सोचना पड़ेगा कि वह किस माध्यम से चुनाव कराये जिससे लोग उस पर उंगली न उठा सकें। जल्दी चुनाव परिणाम आने या कम खर्च होने के तर्क से चुनाव का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है क्योंकि यदि तकनीक में अति आधुनिक दूसरे देश बैलेट के जरिए चुनाव करा सकते हैं तो भारत क्यों नहीं? सवाल माध्यम का नहीं उस भरोसे का है जहां लोग यह समझ सकें कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हुए हैं। जिसे हम कह सकते हैं कि 'न्याय किया गया है यही पर्याप्त नहीं, न्याय हुआ है यह लगना भी चाहिए।'
 

Source:Agency