By: Sabkikhabar
19-12-2017 07:46

इस विधानसभा चुनाव में खर्च को नजदीक से देखने वाले जानकारों का कहना है कि भाजपा ने इस चुनाव में कुल मिलाकर लगभग 1500 करोड़ रुपए खर्च किए हैं जो उसके द्वारा 2012 के चुनाव में किए गए खर्च का 10 गुना होता है। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने कुल 117 करोड़ रुपए खर्च किए थे। 2017 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को अपने पक्ष में बाहरी माहौल बनाने के लिए भाजपा के समान खर्च करना जरूरी हो गया था, इस चुनाव में कांगे्रस पार्टी का अनुमानित खर्च 750 करोड़ रुपए बताया जा रहा है जो भाजपा के खर्च की तुलना में लगभग आधा है। इस चुनाव में दोनो दलों द्वारा कुल मिलाकर 1750 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान है, इस प्रकार 2017 का गुजरात विधानसभा चुनाव अब तक का बेहद खर्चीला चुनाव साबित हुआ है।

गुजरात विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं । इस चुनाव में प्रत्याशियों ने कितना खर्च किया है इसकी जानकारी चुनाव आयोग द्वारा सार्वजनिक किए जाने के बाद ही मिल पाएगी। चुनाव आयोग ने प्रत्याशी के लिए  28  लाख रुपए खर्च सीमा निर्धारित की है, इसके लिए हर एक प्रत्याशी को अपने खर्च का दैनिक ब्यौरा रखना होगा। किन्तु राजनीतिक दलों के द्वारा चुनाव में खर्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई है। यद्यपि यह कहा जाता है कि 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने कड़ी टक्कर दी है किन्तु चुनाव में भाजपा ने जितनी भारी भरकम राशि व्यय की है कांग्रेस पार्टी भाजपा के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती। उदाहरण के लिए कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी की रैलियों के लिए भारी भीड़ और तामझाम जुटाने के लिए भारी पैसा खर्च किया। दूसरी ओर भाजपा की ओर से न केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बल्कि प्रमुख केन्द्रीय मंत्रियों, भाजपा शासित  दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं नामी-गिरामी पदाधिकारियों के लिए दर्जनों रैलियों का तामझाम के साथ आयोजन करके भारी भरकम खर्च किया गया। इस प्रकार मोटे तौर पर भाजपा का रैलियों पर खर्चा कांग्रेस से 21 गुना अधिक माना जा रहा है।

2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा बताया गया 15 करोड़ रुपए का खर्च उसके द्वारा 2002 के विधानसभा चुनाव खर्च की तुलना में 5 गुना था। 2012 के चुनाव में भाजपा ने 152 करोड़ रुपए खर्च किए जो 2007 के चुनाव की तुलना में लगभग 10 गुना था। 2017 का चुनाव भाजपा ने जीवन-मरण सरीखा मानकर सत्ता में काबिज  जीवित रहने के लिए हर एक मद पर दिल खोल कर खर्च किया। मतदाताओं को लुभाने के लिए चुनाव प्रचार में आधुनिक प्रौद्योगिकी के भी अभिनव प्रयोग किए गए जिसमें विधानसभा  चुनाव प्रचार के अंतिम दिन 8 दिसंबर को प्रधानमंत्री की सीप्लेन का लुभावना खर्चीला प्रदर्शन भी शामिल है।  कहा जाता है कि भाजपा द्वारा जमीनी स्तर पर मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में प्रेरित करने हतु प्रति पोलिंग बूथ पर दो प्रचारक के हिसाब से गुजरात के 50,128 पोलिंग बूथों के लिए लगभग एक लाख अनुभवी प्रचारक नियुक्त किए गए थे। इन प्रचारकों को प्रशिक्षण देकर  उचित  पारिश्रमिक नियुक्त करके उनको संसाधनों सहित निर्धारित क्षेत्रों में पदस्थ कर दिया गया था। इस प्रकार भाजपा ने लगभग 100 करोड़ रुपए मानव संसाधन बूथ प्रबंधन पर खर्च किए।

इस विधानसभा चुनाव में खर्च को नजदीक से देखने वाले जानकारों का कहना है कि भाजपा ने इस चुनाव में कुल मिलाकर लगभग 1500 करोड़ रुपए खर्च किए हैं जो उसके द्वारा 2012 के चुनाव में किए गए खर्च का 10 गुना होता है। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने कुल 117 करोड़ रुपए खर्च किए थे। 2017 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को अपने पक्ष में बाहरी माहौल बनाने के लिए भाजपा के समान खर्च करना जरूरी हो गया था, इस चुनाव में कांगे्रस पार्टी का अनुमानित खर्च 750 करोड़ रुपए बताया जा रहा है जो भाजपा के खर्च की तुलना में लगभग आधा है। इस चुनाव में दोनो दलों द्वारा कुल मिलाकर 1750 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान है, इस प्रकार 2017 का गुजरात विधानसभा चुनाव अब तक का बेहद खर्चीला चुनाव साबित हुआ है।

प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती थी कि  रैलियों को संबोधित करते हुए चुनाव प्रचार का उच्च स्तर बनाए रखेंगे  किन्तु निरपेक्षता से देखा जाय तो उन्होंने प्रचार का स्तर गिराया है। प्रधानमंत्रीजी ने गुजरात की जनसभाओं में गुजरात का भावी विकास एजेंडा और भाजपा के संकल्प पत्र का ब्यौरा बताने की बजाय कांग्रेसी नेताओं के अनेक वक्तव्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करते हुए गलतबयानी का सहारा   लिया। चुनाव प्रचार के अन्तिम दिनों कांग्रेसी नेता मणि शंकर अय्यर के दिल्ली निवास में रात्रि भोज में  पाकिस्तान के भूतपूर्व विदेशमंत्री खुर्शीद कसूरी की उपस्थिति को प्रधानमंत्री मोदी ने जनसभाओं में गुजरात चुनाव में पाकिस्तान का हस्तक्षेप करार दिया।  दरअसल खुर्शीद कसूरी पाकिस्तान सरकार के प्रतिनिधि के रूप नहीं, बल्कि अपने रिश्तेदार रामपुर के पूर्व नवाब काजिम अली खान के बेटे के विवाह में हिस्सा लेने के लिए 6 से 9 दिसंबर तक के लिए निजी हैसियत से दिल्ली आए हुए थे। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के 1960 के दिनों से उनके मित्र रहे मणिशंकर ने उन्हें रात्रि भोज पर आमंत्रित किया था। सोनिया गांधी को छोड़कर इस भोज में शामिल सभी भारतीय लोगों के ओहदे के साथ भूतपूर्व शब्द लगा हुआ था।

 
प्रधानमंत्री ने इस रात्रिभोज में डॉ. मनमोहन सिंह की उपस्थिति पर भी सवाल उठा दिए।  प्रधानमंत्री द्वारा इस रात्रि भोज को गुजरात चुनाव में दखलंदाजी करार देना समझ से परे है। प्रधानमंत्री के इस आरोप का मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान गुजरात चुनाव में कांग्रेस पार्टी की मदद कर रहा है। अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री इंगित करने वाला पोस्टर कांग्रेस पार्टी ने जारी ही नहीं किया था। मैं नहीं समझता कि इस प्रकार के आरोपों से भाजपा को चुनाव में फायदा मिल पाया होगा। गुजरात विधानसभा चुनाव में तो एक आम गुजराती की मानसिकता भाजपा को जिताकर प्रधानमंत्री मोदी के हाथ मजबूत करने की थी,  इसलिए प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार में घटिया किस्म की बातें नहीं करते तो भी इन आम  लोगों के मत भाजपा को ही मिलते। इन आम मतदाताओं  के मतों को कांग्रेस के पक्ष में करने के लिए यदि राहुल गांधी द्वारा भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी के वाहक जादूगर  सैम पित्रोदा को अपने साथ चुनाव प्रचार में  किसी न किसी रूप में उपयोग किया जाता तो कांग्रेस को चुनाव में और फायदा होता, यहां तक की सरकार बनने की भी संभावना हो सकती थी।

गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के द्वारा दिए गए 150 के लक्ष्य को पूरा करने के लिए भाजपा नेतृत्व ने जो कुछ किया वह चुनाव आयोग की न•ारों में भले ही गलत न हो, किन्तु उसे उचित व्यवहार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हिमाचल प्रदेश के समान ही गुजरात विधानसभा के चुनाव भी नवम्बर के पहले पखवाड़े  में दो चरणों में करवाए जा सकते थे। बनासकाठा, पाटन आदि बाढ़ से प्रभावित जिलों के 17 विधानसभा क्षेत्रों में नवम्बर के तीसरे सप्ताह में तीसरे चरण के  चुनाव कर  इससे दोनों राज्यों की मतगणना नवम्बर के अंतिम सप्ताह में करवाकर चुनाव नतीजों का ऐलान किया जा सकता था। किन्तु ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग ने अपना विवेक प्रयोग करने की बजाय राज्य सरकार की सलाह स्वीकार करते हुए चुनाव एक महीने के लिए टाल दिया। एक महीने में गुजरात की रूपाणी सरकार और केन्द्र की मोदी सरकार ने कुल मिलाकर 3000 करोड़ रुपए से अधिक लोक लुभावन योजनाओं का ऐलान कर दिया।

अक्टूबर में ही 650 करोड़ रुपए की रो-रो फेरी सेवा के प्रथम चरण का प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन भी मतदाता लुभावन कार्यक्रम का हिस्सा माना जा सकता है। संभवत: इन योजनाओं के ऐलान हेतु ही गुजरात का चुनाव दिसंबर तक टाला गया। मोटे तौर पर सरकार के द्वारा ऐलान की गई इन योजनाओं का खर्च भी भाजपा के चुनावी खर्च में मान लेने पर भाजपा का चुनावी बजट 4500 करोड़ रुपए का हो जाता है।
 

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