By: Sabkikhabar
16-12-2017 07:26

एक चर्चा शुरू है कि संसद के शीतकालीन सत्र में राज्य विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव आना चाहिए। इसमें उत्साह की वजह एक्जाट पोल के नतीजे भी हैं। सोचिये कि इस समय चुनाव आयोग का जो ढांचा है, इतने बड़े भगीरथ प्रयास के लायक वह है भी, या नहीं? सच तो यह है कि निर्वाचन आयोग गुजरात जैसे प्रदेश के चुनाव को निष्पक्ष रूप से नियंत्रित नहीं कर पाया।

आपका सर्वे, हमारे सर्वे के काफी करीब है!', बीजेपी के एक प्रवक्ता इस्लाम गुरुवार रात को 'चाणक्या-न्यूज 24' एक्जाट पोल पर टिप्पणी कर रहे थे। मतलब, 'मीठा है, तो गब-गब खाइये, और कड़वा है, तो थू-थू करिये!' अंदाज बयां कुछ ऐसा ही था। 'आपका सर्वे, हमारे सर्वे के का$फी करीब है!' इस शब्द के बड़े निहितार्थ हैं। सोमवार को जब इस तरह के कोई जादुई आंकड़े ईवीएम-पैट मशीनों से निकले, तो कोई ऊंगली उठाने की न करे। उसकी पृष्ठभूमि तैयार है। एक्जाट पोल ऐसे ही अवसरों के लिए सुरक्षित किये जाते हैं। 

 गुरुवार को सारे टीवी चैनलों पर एक्जाट पोल की बाढ़ आई हुई थी। बीजेपी प्रवक्ता, उसे समर्थन देने वाले विश्लेषकों के पांव पर नहीं थे, और कांग्रेस को तो 'पंचिग बैग' बना रखा था। कांग्रेस प्रवक्ता, उससे सहानुभूति रखने वाले विश्लेषक मानों हथियार डाले हुए हताश से दिख रहे थे। सर्वे का इतना मारक असर चुनावी मनोविज्ञान पर पड़ता है, जिससे बड़े-बड़े महारथियों का आत्मविश्वास डिग जाए, ऐसा दिख गया है। आभासी परिणाम, वास्तविक परिणाम आने से पहले इतना प्रभावी हो सकता है, ऐसी वजहों ने इस देश में सर्वे का धंधा चोखा कर दिया है। इस धंधे को चलाये रखने वाली लॉबी इतनी ता$कतवर है कि 2014 के चुनाव में निर्वाचन आयोग को नीचे झुकने पर विवश कर दिया था। 5 मार्च 2014 को चुनाव आयोग ने आचार संहिता लागू करते समय आदेश दिया था कि मतगणना के बाद ही किसी तरह के सर्वे, एक्जाट पोल दिखाये जाएं। इस पर खूब हो हल्ला मचा, और अंतत: चुनाव आयोग को यह आदेश वापिस लेते हुए यह तय करना पड़ा कि 12 मई 2014 को शाम 6.30 तक आखिरी वोट पड़ जाने के बाद एक्जाट पोल दिखा सकते हैं।  

ध्यान से देखिये, तो 2014 के बाद भारत में मार्केट से लेकर मतदाताओं तक के सर्वे कराने, एक्जाट पोल से लेकर इमेज बिल्डिंग करने और ट्विटर हैंडलर के ठेके लेने वाली कंपनियों की बाढ़ आई हुई है। 10-20 लोगों की टीम, ठेके पर कॉल सेंटर या अन्य लोगों के दो हजार से या अधिकतम दस हजार लोगों की राय शुमारी कर लेती है। यही राय, करोड़ों लोगों की राय में परिवर्तित हो जाती है। जिन लोगों की राय शुमारी होती है, उनमें आधे से अधिक फर्जी होते हैं। जिन तथाकथित लोगों का मत जानना होता है, उनका कोई आधार कार्ड का या ब्योरा तो डालना नहीं है। मतदान से पहले 'ओपिनियन पोल', और मतदान के बाद 'एक्जाजट पोल', न हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा रखिये, और नोट छापते जाइये।

2014 के आम चुनाव के बाद से सत्ता समर्थक कितने नेताओं और उनके संरक्षण में धंधा चलाने वालों ने सर्वे कंपनियां खोली हैं, थिंक टैंक का काम आरंभ किया है, इन सबके वास्ते देश का काला धन और विदेश से चोरी-छिपे पैसे की जिस तरह से उगाही हो रही है, उसकी ठीक से पड़ताल हो, तो रोचक किस्से सामने आएंगे। ओपिनियन पोल के दुरूपयोग को देखते हुए यूरोपीय संघ के 16 देशों में नकेल कसी गई है।  इटली, स्लोवाकिया, लक्जमबर्ग ने चुनावी सर्वे पर सात दिन पहले से रोक लगा रखी है।  फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी में मतदान से पहले किसी ने एक्जाट पोल दिखाने की तो उसपर आपराधिक मुकदमे चलाये जाते हैं।

एक्जाट पोल की शुरूआत 1967 में हुई थी। मार्शल वान डैम, नीदरलैंड में डच लेबर पार्टी के नेता थे, और 1981 से 82 तक हाउसिंग, योजना व पर्यावरण विभागों के मंत्री रह चुके थे। राजनीति में सक्रिय होने से पहले मार्शल वान डैम का टीवी प्रेजेंटर के रूप में अच्छा रसूख था। 15 फरवरी, 1967 के आम चुनाव में एक्जाट पोल का सबसे पहला प्रयोग मार्शल वान डैम ने किया था। उसी साल नवंबर में अमेरिका के केंटुकी में चुनाव हुआ, वारेन मिटोफ्स्की उस दौर के पोल स्टार थे, जिन्होंने सीबीएस न्यूज पर इस विधा का इस्तेमाल किया। यूरोप-अमेरिका में चार दशक पहले हुए प्रयोग ने आज ऐसे कनखजूरे का रूप धारण कर लिया है, जिसकी सहस्र टांगें होती हैं। 

एक्जाट पोल विवादों से मुक्त नहीं रहा। बुल्गारिया में मतदान के दिन एक्जाट पोल के प्रसारण पर प्रतिबंध है। न्यूज एजेंसियां मौसम का हाल बताने, और पर्यटन की जानकारी देने के बहाने चुनाव सर्वे दिखाने लगी थीं। बुल्गारिया में 2013 के आम चुनाव में हद हो गई, जब वेश्यालयों के बारे में जानकारी देने के नाम पर चुनावी सर्वे दिखाना शुरू हुआ। लोग हैरान थे। ऐसा नहीं कि हर मुल्क में सर्वे का खराब ट्रैक रिकार्ड ही रहा है। मसलन, ब्रिटेन में 2005 के चुनाव में बीबीसी और आईटीवी ने साझा एक्जाट पोल में लेबर पार्टी को 66 सीटों से जीत का आकलन किया, और परिणाम बिल्कुल वैसे ही आये। 2007 में ऑस्ट्रेलिया के संघीय चुनाव में स्काई न्यूज, चैनल सेवन और आउसपोल 'एएलपी' की जीत की जैसी भविष्यवाणी की थी, वैसा ही हुआ। मगर, अमेरिकी चुनाव में सर्वे करने वाली एजेंसियां पूरे चुनावी माहौल को जिस तरह अस्थिर कर मतदाताओं का रक्तचाप बढ़ाती हैं, उसकी बड़ी आलोचना होती है। यही बीमारी भारत में शुरू हो गई है।

 
भारत में एक्जाट पोल सौ फीसदी सही उतरा हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में किसी भी एजेंसी ने एक्जाट पोल में कल्पना नहीं की थी कि आम आदमी पार्टी को 67 सीटें आएंगी। 2015 में ही बिहार विधानसभा चुनाव के समय एक्जाट पोल में 'चाणक्य और न्यूज-24' के साझा सर्वे में बीजेपी गठबंधन की सरकार बन रही थी। उस समय एनडीटीवी ने भी अपने एक्जाट पोल मेें बिहार में बीजेपी सरकार का गठन कर दिया था। एक्जाट पोल की सफल-असफल कथा के बावजूद, एक संभावना तो बनी रहेगी कि जो लोग इसका व्यापार कर रहे हैं, भारत में इसका भविष्य है। इस कारोबार में इलेक्ट्रॉनिक चैनल चलाने वाले बड़ी संख्या में लीड ले रहे हैं। 

एक चर्चा कल से शुरू है कि संसद के शीतकालीन सत्र में राज्य विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव आना चाहिए। इसमें उत्साह की वजह एक्जाट पोल के नतीज भी हैं। इस बहस में जाने से पहले इस पर गंभीरता से बात होनी चाहिए कि इस समय चुनाव आयोग का जो ढांचा है, इतने बड़े भगीरथ प्रयास के लायक वह है भी, या नहीं। सच तो यह है कि वर्तमान निर्वाचन आयोग गुजरात जैसे प्रदेश के चुनाव को नियंत्रित कर पाने में सफल नहीं रहा है।

संभवत: पहली बार देश की एक संविधानिक संस्था इस तरह से विवाद के घेरे में रही है, उसकी वजह चुनाव आयोग के प्रमुख अचल कुमार जोति हैं।  ऐसा शायद ही देखने को मिला जब विपक्ष 'चुनाव आयोग मोदी की कठपुतली है'... 'ईवीएम में गड़बड़ी करके वोट चोरी बंद करो' जैसे नारे वाली तख्तियों के साथ घेराव-प्रदर्शन करे। यह वही विपक्ष है, जिसने अहमद पटेल पर फैसले को लेकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता को सराहा था। एक संवैधानिक संस्था के प्रति भरोसे का भूस्खलन हुआ, तो क्यों हुआ? इस प्रश्न की समीक्षा आवश्यक है। विपक्ष को इस पर भी विचार करना चाहिए कि यदि निर्वाचन आयोग उसके साथ निष्पक्षता से पेश नहीं आ रहा है, तो उसकी शिकायत राष्ट्रपति से कर सकते थे, अथवा नहीं। 

ऐसा लगता है, इस सारी गड़बड़ी की वजह मतदान का ठीक से मॉनिटरिंग नहीं होना, और 'मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट' का निष्पक्षता से पालन नहीं होना है। चुनाव आचार संहिता में सबसे बड़ा झोल यह है कि रोज बदलते तकनीक के अनुरूप नियमों में बदलाव नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए चुनाव प्रचार बंद हो जाने के बावजूद 'ट्विटर', 'फेसबुक', 'व्हाट्स अप ग्रुप', 'लिंक्डनइन' के धुंआधार प्रचार चल रहा था। टीवी पर बैठे चुनाव में भाग लेने वाली पार्टियों के प्रवक्ता और समर्थक यही काम प्रत्यक्ष, या परोक्ष रूप से कर रहे थे। सोशल मीडिया पर चुनावी प्रचार बनाम दुष्प्रचार और उसके दुरूपयोग को कैसे रोका जाए, इस बारे में 'मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट' में कहीं चर्चा तक नहीं है। 2017 में एक अरब 60 लाख भारतीय, मोबाइल फोन से लैस बताये गये। मतलब, देश की 79 फीसदी आबादी सूचना के इस नये हथियार से लैस है, जिसे मतदान से पहले नियंत्रित करने का कोई साधन न चुनाव आयोग के पास है, न वहां ऐसे अवसरों पर सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के प्रावधानों पर विचार किया गया है। 

यह चुनाव आयोग की खुद की कमजोरी है कि आयोग के अंडर सेक्रेटरी पवन दीवान द्वारा 8 दिसंबर 2017 को हिदायत जारी किये जाने के बावजूद गुजरात के कई प्रमुख अखबारों में आधे पेज वाले विज्ञापन 13 और 14 दिसंबर को छपे, जिसमें पीएम की तस्वीर, कमल निशान और पार्टी की उपलब्धियों का बखान था। जब 'मॉडल कोड ऑफ कंडक्टÓ में पार्टी के निशान तक प्रदर्शित करने की मनाही है, तो यह क्यों हुआ? आप पूरे आचार संहिता को खंगाल जाइये, कहीं नहीं लिखा है कि प्रधानमंत्री या किसी भी पार्टी का नेता वोट देकर निकले और गाड़ी पर लटक कर एक ऊंगली दिखाते हुए हजार मीटर तक रोड शो करे। 

वोट देने गांधीनगर से संासद लाल कृष्ण आडवाणी भी आये, वे चुपचाप बाहर निकले, गाड़ी में बैठे, और चले गये। आचार संहिता में यह भी कहीं नहीं लिखा है कि मतदान से एक दिन पहले घोषणापत्र जारी किये जाएं। ऐन चुनाव के दिन मोदी जी की चार जनसभाएं हों, तो सही। टीवी स्क्रीन पर फिक्की के कार्यक्रम में मोदीजी सरकार की उपलब्धियों को बघारें और विपक्ष की बजाते हुए दिखें तो ठीक, उसके बरक्स राहुल गांधी का साक्षात्कार दिखे तो चैनलों पर केस हो। इस तरह के दोहरे मापदंड से चुनाव आयोग ने खुद को विवाद के घेरे में डाल दिया है। pushpr1@rediffmail.com
 

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