By: Sabkikhabar
14-12-2017 07:52

नई परिस्थिति में गाय तथा बैल दोनों ही किसान के लिए आर्थिक बोझ बन गए हैं। किसान के लिए टे्रक्टर, थ्रेशर, ट्यूबवेल ने बैल को अप्रासंगिक बना दिया है और भैंस ने गाय को अप्रासंगिक बना दिया है। अब गाय के संरक्षण का एक मात्र उद्देश्य अध्यात्मिक लाभ बचा रहता है। गाय से मिलने वाले अध्यात्मिक लाभ के लिए आर्थिक मूल्य अदा करना होगा। प्रश्न है कि इस मूल्य को कौन अदा करे? गाय के वध पर प्रतिबंध लगा कर सरकार ने इस मूल्य को किसान पर ढकेल दिया है। सरकार का कहना है कि समाज के अध्यात्मिक विकास का मूल्य किसान अदा करे। सर्वविदित है कि समाज को सस्ता अन्न उपलब्ध कराने के लिए पहले ही किसान घाटा खा रहा है और अक्सर आत्महत्या करने को मजबूर है। ऐसे मे ंजरूरत है कि सम्पूर्ण समाज द्वारा किसान को सहायता उपलब्ध कराई जाए। इसके विपरीत गाय के वध पर प्रतिबंध लगा कर हम किसान पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रहे है।

सरकार ने गाय को काटने पर प्रतिबंध लगाया है परन्तु देश में गायों की संख्या कम होती ही जा रही है। पूर्व में किसान के लिए गाए लाभकारी थी। वह गोचर भूमि में चरकर परिवार के लिए दूध एवं खेत के लिए गोबर देती थी। उसकी नर संतान उपयोगी थी। बैल से खेत में जुताई की जाती थी। गाय से समाज का अध्यात्मिक विकास भी होता था। गाय के माध्यम से मनुष्य ईश्वर से जुड़ता था। इस प्रकार गाय से भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों लाभ एक साथ हासिल होते थे। लेकिन आतताई राजाओ द्वारा मांस के लिए गाय का वध किया जा रहा था। इस वध को रोकने के लिए समाज ने गाय को माँ का दर्जा दिया।

नई तकनीकों ने गाय की आर्थिकी को बदल दिया है। टै्रक्टर एवं थ्रेशर ने जुताई एवं दवाई के लिए बैल की जरूरत को समाप्त कर दिया। ट्यूब वेल ने सिंचाई के लिए बैल को अनुपयुक्त बना दिया है। भैंस ने दूध के लिए गाय का विकल्प उपलब्ध करा दिया। गाय का स्वभाव चरने का होता है जबकि भैस का स्वभाव एक स्थान पर बैठे रहने का होता है। चरने के लिए गाय को गोचर भूमि चाहिए। बीते दिनों गोचर भूमि का भारी मात्रा मे अन्य कार्यों के लिए जैसे स्कूल बनाने के लिए आवंटन किया गया है। गोचर पर गैर कानूनी अतिक्रमण भी हुआ है। फलस्वरूप गांवों मे गोचर भूमि कम बची है। तदानुसार गाय को भी घर बैठा कर चारा देना होता है। गाय का दूध सस्ता पड़ता है यदि वह गोचर में चरे। भैस का दूध सस्ता पड़ता है यदि वह घर पर बैठे। गोचर भूमि के सिकुड़ने से भैस को रखना लाभप्रद हो गया है। केन्द्र सरकार की करनाल स्थित सेन्ट्रल सायल सैलिनिटी रिसर्च इन्सट्ीट्यूट के अनुसार आज एक भैस से किसान को 7,400 रुपए वार्षिक लाभ होता है जबकि गाय से मात्र 5,100 रुपए। नई परिस्थिति में गाय तथा बैल दोनो ही किसान के लिए आर्थिक बोझ बन गए हंै। किसान के लिए टे्रक्टर, थ्रेशर, ट्यूबवेल ने बैल को अप्रासंगिक बना दिया है और भैंस ने गाय को अप्रासंगिक बना दिया है। अब गाय के संरक्षण का एक मात्र उद्देश्य अध्यात्मिक लाभ बचा रहता है। गाय से मिलने वाले अध्यात्मिक लाभ के लिए आर्थिक मूल्य अदा करना होगा। प्रश्न है कि इस मूल्य को कौन अदा करे?

गाय के वध पर प्रतिबंध लगा कर सरकार ने इस मूल्य को किसान पर ढकेल दिया है। सरकार का कहना है कि समाज के अध्यात्मिक विकास का मूल्य किसान अदा करे। सर्वविदित है कि समाज को सस्ता अन्न उपलब्ध कराने के लिए पहले ही किसान घाटा खा रहा है और अक्सर आत्महत्या करने को मजबूर है। ऐसे में जरूरत है कि सम्पूर्ण समाज द्वारा किसान को सहायता उपलब्ध कराई जाए। इसके विपरीत गाय के वध पर प्रतिबंध लगा कर हम किसान पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रहे हंै।

इस संदर्भ में मेरे एक गो सेवक मित्र ने कहा कि हम अपने बूढ़े माँ बाप की सेवा करते हंै यद्यपि वे हम पर आर्थिक बोझ होते हैं। इसी प्रकार हमें गाय की सेवा करनी चाहिए यद्यपि वह हम पर आर्थिक बोझ होती है। लेकिन यहाँ ध्यान देना चाहिए कि अपने बूढ़े माता पिता की सेवा का आर्थिक बोझ परिवार स्वयं वहन करता है। उस बोझ को शेष समाज पर नहीं डाला जाता है। इसी प्रकार जिन लोगों को गाय से मिलने वाले अध्यात्मिक लाभ को पाने की इच्छा है उन्हे गाय के संरक्षण का आर्थिक बोझ वहन करना चाहिए। 

विकल्प है कि सरकार इस बोझ को वहन करे। सरकार द्वारा समाज के विभिन्न घटकों के लाभ के लिए योजनाएं बनाई जाती है जैसे गरीबों के लिए इंदिरा आवास, दलितो के लिए सरकारी नौकरी में आरक्षण एवं मुसलमानों के लिए हज यात्रा की सब्सीडी। इसी प्रकार सरकार को गाय के संरक्षण के लिए योजना बना कर उसका आर्थिक बोझ वहन करना चाहिए। इस दिशा में सरकार द्वारा निम्न कदम उठाए जा सकते हंै। पहला एवं सर्वश्रेष्ठ कदम है कि गाय के दूध के गुणो की जानकारी जन जन तक पहुँचाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई जाए। भैंस के दूध की तुलना में गाय का दूध ज्यादा गुणकारी होता है। दूध में फैट के साथ-2 तमाम अन्य लाभकारी मिनरल्स होते हंै। इन्हें सालिड नान-फैट यानी फैट के अतिरिक्त ठोस पदार्थ कहा जाता है।

 
गाय के दूध में सालिड नान फैट ज्यादा होता है जबकि भैस के दूध में कम। इसलिए कहा जाता है कि ''भैस के जैसी बुद्धि हो जाएगी।'' लेकिन आम आदमी को गाय तथा भैंस के दूध के इस अंतर का ज्ञान नहीं होता है इसलिए वह ''गाढ़े'' यानी अधिक फैट वाले भैंस के दूध को पसंद करता है।  यहाँ देसी एवं विदेशी गाय में भेद करने की भी जरूरत है। विदेशी गाय के दूध में देशी गाय की तुलना में सालिड नान फैट कम होता है। विदेशी गाय के दूध की गुणवत्ता भैंस के दूध के नजदीक होती है। सरकार को चाहिए कि देसी गाय, विदेशी गाय एवं भैंस के दूध के गुण के इस अंतर को जनता तक पहुँचाए जिससे देसी गाय के दूध की बाजार में माँग बढ़े, लोग इस दूध का ऊँचा दाम अदा करें, तथा किसान के लिए देसी गाय को रखना लाभप्रद हो जाए। देसी गाय के दूध को बेचने वाली डेयरी कंपनियों को टैक्स में छूट देनी चाहिए। तीनो प्रकार के दूध के गुणों का विस्तृत मूल्यांकन करना चाहिए। जिन डेयरी का दूध इन गुणों में उत्तम हो उन्हें टैक्स में छूट देनी चाहिए।

दूसरा उपाय है कि सरकार देसी गाय के संरक्षण की बड़ी योजना बनाए। जो किसान देसी गाय को पालने में असमर्थ हो उससे सरकार इन्हें खरीद कर गोशालाओं को हस्तान्तरित करे। साथ-2 गोशालाओं को आर्थिक मदद भी दे। मेरी जानकारी में अधिकतर गोशालाएं घाटे में चल रही है और आर्थिक कठिनाई में है।  

तीसरा उपाय है कि गोचर भूमि का संरक्षण किया जाए। किसी साधू ने बताया कि हरियाणा में गाँवों की गोचर भूमि पर सत्तारूढ़ पार्टी के कर्मियों द्वारा बड़े पैमाने पर कब्जा किया जा रहा है। गाय को गोचर चाहिए। गोचर नही रहेंगे तो गाय नहीं बचेगी। 

चौथा उपाय है कि बैल को काटने की छूट दे दी जाए। जैसा ऊपर बताया गया है कि गाय के अर्थशास्त्र के बिगड़ने में टै्रक्टर, थ्रेशर तथा ट्यूबवेल का भारी योगदान है। बैल से खेती करना बहुत मंहगा हो गया है। उत्तराखंड के मेरे गाँव मे 10 वर्ष पूर्व 5 बैलों की जोड़ियाँ थी। आज एक भी नही है। टे्रक्टर से सब काम हो रहा है। बैल को रखना किसान के लिए भारी घाटे का सौदा हो गया है। बछड़े को न पालना पड़े इसलिए किसान गाय को बेच कर भैंस रख रहा है। कटु सत्य यह है कि बैल को बचाने के प्रयास में हम गाय का ही स्वाहा कर रहे हैं। हमारे धर्म गुरुओं को इस समस्या पर मंथन करना चाहिए। अध्यात्म और अर्थशास्त्र में तालमेल बैठाना चाहिए।

सरकार के गाय के संरक्षण के प्रति सम्मान का स्वागत है। परन्तु इस कार्य के आर्थिक बोझ को किसान पर ढकेलना पूर्णतया अनुचित है। जरूरत है कि सम्पूर्ण समाज गाय के संरक्षण का आर्थिक मूल्य अदा करे। इसके लिए सरकार को सफल नीति बनानी चाहिए।
 

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