By: Sabkikhabar
13-12-2017 07:43

भारत के लिए चाबहार से जुड़ाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह पाकिस्तान में चीन द्वारा चलने वाले ग्वादर बंदरगाह से सिर्फ  100 मीटर ही दूर है। गौरतलब है कि चीन इसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के जरिए बनवा रहा है। दरअसल चीन की मंशा इस बंदरगाह के जरिए एशिया में नए व्यापार और परिवहन मार्ग खोलकर अपना दबदबा कायम करना है। लेकिन चाबहार के जरिए अब भारत चीन-पाकिस्तान की हर हरकत पर नजर रख सकेगा। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि चाबहार से जुड़ाव से जहां व्यापार-कारोबार को बढ़ावा मिलेगा वहीं इस क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की भारत को घेरने की मंशा भी धरी की धरी रह जाएगी। चाबहार समझौते के आकार लेने से अफगानिस्तान और इससे सटे ईरान के इस बेहद अहम इलाके में बढ़ते चीन के प्रभाव पर अब आसानी से नियंत्रण रखा जा सकेगा। 

ईरान के राष्ट्रपति द्वारा चाबहार बंदरगाह के उद्घाटन के साथ ही भारत-ईरान-अफगानिस्तान के बीच नए रणनीतिक ट्रांजिट रुट की शुरुआत हो गई। यह ट्रांजिट रुट भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके जरिए भारत बगैर पाकिस्तान गए ही अफगानिस्तान और उससे आगे रूस और यूरोप से आर्थिक कारोबार को अंजाम दे सकेगा। गौरतलब है कि अभी तक भारत को अफगानिस्तान जाने के लिए पाकिस्तान होकर ही जाना पड़ता था। चूंकि कांडला और चाबहार बंदरगाह के बीच की दूरी नई दिल्ली और मुंबई के बीच की दूरी से भी कम है इसलिए इस समझौते से भारत अपनी वस्तुओं को ईरान के जरिए अफगानिस्तान आसानी से भेज सकेगा। इससे परिवहन लागत और समय दोनों की बचत होगी। याद होगा गत वर्ष भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 12 समझौतों पर मुहर लगी जिसमें चाबहार बंदरगाह का विकास व चाबहार-जाहेदान रेलमार्ग निर्माण समझौता प्राथमिकता में था। चाबहार बंदरगाह के भौगोलिक स्थिति पर गौर करें तो यह सिस्तान-ब्लूचिस्तान प्रांत में स्थित फारस की खाड़ी से बाहर भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है। इसलिए भारत के पश्चिमी तट से चाबहार आसानी से पहुंचा जा सकता है। अभी महीने भर पहले ही भारत ने गेहूं की एक खेप चाबहार बंदरगाह के रास्ते अफगानिस्तान भेजी थी। वैश्विक समुदाय इस कदम को तीनों देशों के बीच नए रणनीतिक मार्ग की शुरुआत के तौर पर देख रहा है।

भारत के लिए चाबहार से जुड़ाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह पाकिस्तान में चीन द्वारा चलने वाले ग्वादर बंदरगाह से सिर्फ 100 मीटर ही दूर है। गौरतलब है कि चीन इसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के जरिए बनवा रहा है। दरअसल चीन की मंशा इस बंदरगाह के जरिए एशिया में नए व्यापार और परिवहन मार्ग खोलकर अपना दबदबा कायम करना है। लेकिन चाबहार के जरिए अब भारत चीन-पाकिस्तान की हर हरकत पर नजर रख सकेगा। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि चाबहार से जुड़ाव से जहां व्यापार-कारोबार को बढ़ावा मिलेगा वहीं इस क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की भारत को घेरने की मंशा भी धरी की धरी रह जाएगी।

चाबहार समझौते के आकार लेने से अफगानिस्तान और इससे सटे ईरान के इस बेहद अहम इलाके में बढ़ते चीन के प्रभाव पर अब आसानी से नियंत्रण रखा जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि भारत की ओर से दक्षिण-पूर्व ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की रणनीति 2003 में बनाई गई थी लेकिन ईरान के उत्साह में कमी और बाद में उस पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगने की वजह से रणनीति परवान नहीं चढ़ सकी। लेकिन चाबहार बंदरगाह के जरिए अब भारत का अफगानिस्तान और राष्ट्रकुल देशों से लेकर पूर्वी यूरोप तक संपर्क बढ़ जाएगा। भारत की वस्तुएं तेजी से ईरान पहुंचेगी और वहां से नए रेल व सड़क मार्ग के जरिए अफगानिस्तान समेत मध्य एशियाई देशों को भेजा जा सकेगा। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी कि भारत और ईरान एक-दूसरे से कंधा जोड़ अफगानिस्तान में शांति तथा स्थायित्व लाने में भी सहायक सिद्ध होंगे। 

उल्लेखनीय है कि दोनों देशों का नजरिया तालिबान विरोधी और उत्तरी गठबंधन यानी नादर्न गठबंधन का हिमायती है। इसके अलावा मध्य एशिया में आर्थिक अवसरों तथा प्राकृतिक संसाधनों तक भारत की पहुंच बनाने में ईरान एक उपयुक्त गलियारा उपलब्ध कराता है। मध्य एशिया भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह क्षेत्र पर्याप्त मात्रा में खनिज संसाधनों से भरपूर है। इनमें से तीन गणराज्य कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान व तुर्कुेमेनिस्तान दुनिया के सबसे बड़े तेल व प्राकृतिक गैस क्षेत्र के मालिक हैं। कैस्पियन समुद्र क्षेत्र, दुनिया के दो सबसे बड़े तेल क्षेत्र खाड़ी एवं साइबेरिया के बाद तीसरा प्रमुख क्षेत्र है। चूंकि आर्थिक रूप से मध्य एशियाई देश उदारीकरण की नीति का अनुसरण कर रहे हैं इस लिहाज से ये भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। चूंकि सामरिक लिहाज से भी मध्य एशिया भारत के लिए महत्वपूर्ण है ऐसे में चाबहार बंदरगाह की भूमिका भारत के लिए अति महत्वपूर्ण हो जाती है।

यह सत्य है कि भारत की शांति एवं स्थिरता के लिए मध्य एशिया में शांति एवं अस्थिरता आवश्यक है। चूंकि मध्य एशिया की सीमा अफगानिस्तान से लगी है और अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्तान की चुनौतियां सघन हुई हैं, ऐसे में भारत के लिए मध्य एशिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना आवश्यक है। ईरान के साथ दोस्ती और मध्य एशिया में सशक्त भागीदारी से न सिर्फ पाकिस्तानी और चीनी सैन्य गतिविधियों पर निगरानी रखा जा सकेगा बल्कि आतंकी समूहों की आवाजाही पर भी भारत की नजर रख सकेगा। ऐसा नहीं है कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा से उत्पन राज्य प्रायोजित आतंकवाद से सिर्फ  भारत ही लहूलुहान है। 

 
गौर करें तो उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान भी इससे पीड़ित है। ऐसे में भारत और ईरान कंधे से कंधा मिलाकर इस क्षेत्र में अपनी भू-सामरिक रणनीति मजबूत करते हुए चाबहार बंदरगाह के जरिए द्विपक्षीय कारोबारी रिश्ते को भी बुलंदी पर पहुंचा सकते हैं। भारत-ईरान आर्थिक एवं वाणिज्यिक संबंधों पर दृष्टिपात करें तो यह संबंध परंपरागत रूप से भारत द्वारा ईरानी कच्चे तेल आयात के माध्यम से प्रवाहित है। ईरान विश्व में तेल एवं गैस के व्यापक भंडारों वाले देशों में से एक है और मौजूदा समय में भारत को अपनी सकल घरेलू उत्पाद की दर 8-9 प्रतिशत बनाए रखने के लिए ऊर्जा की सख्त आवश्यकता है जिसे ईरान आसानी से पूरा कर सकता है। उधर, भारत भी ईरान को जरूरत की वस्तुएं उपलब्ध कराने की वचनबद्धता पर कायम है। चाबहार समझौते के आकार लेने से भारत से ईरान को निर्यात की जा रही वस्तुएं मसलन चावल, मशीनें एवं उपकरण, धातुओं के उत्पाद, प्राथमिक और अर्द्धनिर्मित लोहा, औषधियों एवं उत्तम रसायन, धागे, कपड़े, चाय, कृषि रसायन एवं रबड़ इत्यादि में तेजी आएगी। भारत आईटीईसी कार्यक्रम के तहत ईरान को प्रत्येक वर्ष 10 स्लॉट उपलब्ध करा रहा है।

यहां ध्यान देना होगा कि दोनों देश आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देने हेतु कई परियोजनाओं को आकार देना चाहते हैं। इनमें ईरान-पाकिस्तान-इंडिया गैस पाइप लाइन परियोजना, एलएनजी की पांच मिलियन टन की दीर्घकालीन वार्षिक आपूर्ति, फारसी तेल एवं गैस प्रखंड का विकास, दक्षिण पार्श गैस क्षेत्र और एनएनजी परियोजना विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस परियोजना में भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरा करने की आश्चर्यजक क्षमताएं हैं। यह परियोजना ईरान और पाकिस्तान के लिए भी आर्थिक रूप से लाभदायी है।

 गौरतलब है कि ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन को लेकर कई बार त्रिपक्षीय बैठकें हो चुकी हैं। जनवरी 2007 में हुई त्रिपक्षीय बैठक में मूल्य निर्धारण के फार्मूले पर बातचीत की गई जिस पर पाकिस्तान सहमत दिखा और भारत ने भी पाकिस्तान के साथ तय की जा रही पारगमन शुल्क और परिवहन किराए के अधीन विचार करने की सहमत जताई। लेकिन मई 2007 में हुई बैठक में ईरान द्वारा सहमत फार्मूले को बदले जाने के बाद भारत ने अपना दृष्टिकोण साफ कर दिया है कि पहले पाकिस्तान के साथ शुल्क मुद्दे को निपटाया जाए और उसके आधार पर ही वह गैस के मूल्य निर्धारण पर कोई निर्णय लेगा।

भारत की चिंता पाइप लाइन की सुरक्षा को लेकर भी है क्योंकि यह अशांत ब्लूचिस्तान क्षेत्र से होकर गुजरनी है। लेकिन अब संभव है कि चाबहार समझौते के बाद यह पाइप लाइन पाकिस्तान होकर न जाए। दोनों देशों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और कारोबारी रिश्ते को प्रगाढ़ करने के लिए संयुक्त उद्यमों का गठन किया है। इनमें ईरान-हिंद शिपिंग कंपनी, मद्रास फर्टिलाइजर कंपनी एवं चेन्नई रिफायनरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा टाटा, एस्सार तथा ओवीएल जैसी कई भारतीय कंपनियों की उपस्थिति ईरान में विद्यमान है। नि:संदेह चाबहार के आकार लेने से ईरान से आर्थिक व सामरिक संबंध मजबूत होंगे। लेकिन अभी भी भारत की कुछ बुनियादी चिंताएं विद्यमान हंै जिस पर ईरान को गौर फरमाना होगा।

मसलन उसे कश्मीर मुद्दे पर अपने पुराने दृष्टिकोण से बाहर निकल भारत का समर्थन करना होगा। ईरान को समझना होगा कि मौजूदा आर्थिक-सामरिक परिदृश्य में उसे ऐसे भरोसेमंद मित्रों की जरूरत है जो वैश्विक मंच पर उसके एकाकीपन को दूर कर सके। भारत इस कसौटी पर शुरु से खरा रहा है। उचित होगा कि चाबहार के जरिए दोनों देश वैश्विक पटल पर दोस्ती की नई इबारत गढ़े और कूटनीतिक-सामरिक संबंधों को नया आयाम दें।
 

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