By: Sabkikhabar
12-12-2017 08:09

आरएसएस और भाजपा की महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे विराट व्यक्तित्वों वाले नेताओं से पुरानी खुन्नस रही है। इतिहास को बदलने की चाहे ये लोग कितनी ही कोशिश कर लें, इस तथ्य को वे चाह कर भी बदल नहीं सकते कि 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी और इस पूरी साजिश को रचने में उसी विचारधारा का हाथ रहा है, जिस पर आज भाजपा चल रही है। मजबूरी का नाम महात्मा गांधी, ये जुमला भाजपा और नरेन्द्र मोदी पर खूब सटीक बैठता है, क्योंकि देश की कमान हाथ में आने के बाद इनकी मजबूरी रही कि ये गांधी के प्रति आदर भाव सार्वजनिक तौर पर दिखाएं। उनकी पुण्यतिथि पर राजघाट जाकर फूलों का चक्र चढ़ाएं, सर्वधर्म प्रार्थना को बैठ कर सुनें और तो और विदेशी मेहमान जब भारत आएं तो उन्हें भी दिखाने के लिए मोदीजी को राजघाट, साबरमती आश्रम ही ले जाना पड़ा। अपना स्वच्छता अभियान भी गांधीजी के चश्मे के सहारे शुरु करना पड़ा। भाजपा गांधी को माने न माने, उनके नाम की ताकत से बखूबी वाकिफ है।

वह जानती है कि हत्या के 7 दशक बाद भी जनता के मन से गांधी को उतारा नहीं जा सका है। पाठ्यपुस्तकों से बहुत सा इतिहास बदल दिया गया है। लेकिन राष्ट्रपिता किसे कहते हैं, इस सवाल को भाजपा ने अब तक नहीं बदला है। उसे शायद सही समय का इंतजार था। अब, जबकि भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश का बाप बता दिया है और फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने ट्वीट किया है कि यह जरूरी तो नहीं कि सबका बाप महात्मा गांधी ही हों, तो इसके क्या मायने निकाले जाएं? क्या यह माना जाए कि राजनीति में चापलूसी और तलवे चाटने की कला, नई ऊंचाइयों को छू रही है? या यह माना जाए कि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को महात्मा गांधी के बराबर या उनसे भी ऊंचा दर्जा दे दिया है? यह बयान किसी छोटे-मोटे कार्यकर्ता का नहीं है, भाजपा प्रवक्ता का है। संबित पात्रा का है। जो जबरन भारत माता की जय बुलवाने में विश्वास रखते हैं। तो क्या भाजपा का भी यही मानना है, जो श्री पात्रा ने कहा है? 

भाजपा अगर नरेन्द्र मोदी को नया राष्ट्रपिता घोषित करती है, तो क्या उसके बाद वह इस बात की जबरदस्ती करेगी कि अब सबको मोदीजी की जय हो, ऐसा कहना पड़ेगा? अगर ऐसा नहीं है तो भाजपा संबित पात्रा जैसे बड़बोले प्रवक्ताओं पर कोई अंकुश क्यों नहींलगाती? खुद नरेन्द्र मोदी अपनी बराबरी गांधीजी से करवाकर कैसा महसूस कर रहे हैं? क्या उन्हें इस बात की शर्मिंदगी है या इस बात पर गर्व है? जो भी वे महसूस कर रहे हैं, वे उसे खुलकर जनता को बताते क्यों नहीं हैं? जब वे चुनावी सभाओं में रो सकते हैं, खुद की निंदा किए जाने पर सहानुभूति बटोर सकते हैं, तो यह क्यों नहीं बता सकते कि वे सचमुच देश के बाप बना दिए गए हैं या किसी ने चापलूसी के चलते ऐसा किया है? अगर इसमें उन्हें चापलूसी या कोई गलत इरादा नजर आता है, अगर उन्हें लगता है कि गांधीजी का स्थान कोई नहीं ले सकता, कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता, तो वे जनता के सामने जाकर बोलते क्यों नही ंहैं?

 
मणिशंकर अय्यर जैसे जाने-पहचाने नेता से लेकर सलमान निजामी जैसे अनजाने लोगों के बयानों को तो मोदीजी चुनावी सभाओं के जरिए चर्चा में लाते हैं और उनके बयानों में थोड़ा मिर्च-मसाला अपनी ओर से लगा देते हैं, जैसे श्री अय्यर ने नीच कहा, तो मोदीजी ने कहा कि मुझे नीच जाति का कहा। इसी तरह सलमान निजामी ने कब, क्या कहा इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने उनके पुराने तथाकथित ट्वीट की चर्चा की, वे कहते हैं हर घर से अफजल निकलेगा। वे कहते हैं मोदी के मां-बाप कौन हैं।

मैं कहता हूं मेरे लिए भारत ही माता-पिता है। सलमान निजामी कह रहे हैं कि उनका एकाउंट हैक कर किसी ने ऐसा पोस्ट डाला था और उन्होंने इसकी शिकायत पुलिस में की थी। लेकिन चुनाव के वक्त नरेन्द्र मोदी को विकास और गुजरात माडल छोड़कर सलमान निजामी याद आए। वे अपनी लकीर बड़ी करके जीतना नहीं चाहते, कांग्रेस की लकीर मिटाना चाहते हैं और शायद यही वजह है कि गुजरात चुनाव में जरूरी मुद्दे हटा दिए गए हैं। और सांप्रदायिकता, कट्टरता, ओछेपन से होते हुए तानाशाही चुनावी रणनीति का हिस्सा बनती दिख रही है। न जाने अब और क्या देखना बाकी है, हे राम।
 

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