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राहुल गांधी! कांग्रेस अध्यक्ष की चुनौतियां और मां का आदर्श

By Sabkikhabar :11-12-2017 08:42


राहुल गांधी एक नए अवतार में हैं। उन पर कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी तब आ रही है, जब पार्टी विपक्ष में है, मीडिया और पूंजीपति साथ छोड़ चुके हैं, कट्टरपंथी राजनीति चरम पर है और उनका मुकाबला नरेंद्र मोदी जैसे हाल के दौर के उस चमत्कारी नेता से है, जो जनता की नब्ज को बखूबी समझता है। यही नहीं भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके पास शासन, सत्ता और बेहतर पहुंच के संसाधन भी हैं। जाहिर है राहुल गांधी के ऊपर कांग्रेस का खोया आत्मविश्वास लौटाने के साथ-साथ जनाधार बढ़ाने की जिम्मेदारी भी है। उन्हें पार्टी के ही नए और पुरानों के बीच भी संतुलन साधना होगा।

मोदी जी कहते हैं कि 'भाजपा अगले सौ साल तक गुजरात में शासन करेगी।Ó उनका अहंकार तो देखिए वह ढेर सारी चीजों- अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन के बारे में बात करेंगे, और आपको पूरी दुनिया के टूर पर ले जायेंगे लेकिन गुजरात, उसके विकास और 22 साल में गुजरात में क्या हुआ, के बारे में वह एक शब्द तक नहीं कहेंगे।' गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान राज्यभर में धुंआधार जनसभाएं कर रहे कांग्रेस के भावी अध्यक्ष राहुल गांधी ने जनजातीय बहुल छोटा उदयपुर में जब यह बात कही, तब वह वे राहुल नहीं थे, जिनका कभी भाजपा से जुड़े लोग 'पप्पू' या 'बाबा' कहकर मजाक उड़ाया करते थे।

राहुल गांधी एक नए अवतार में हैं। उन पर कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी तब आ रही है, जब पार्टी विपक्ष में है, मीडिया और पूंजीपति साथ छोड़ चुके हैं, कट्टरपंथी राजनीति चरम पर है और उनका मुकाबला नरेंद्र मोदी जैसे हाल के दौर के उस चमत्कारी नेता से है, जो जनता की नब्ज को बखूबी समझता है। यही नहीं भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके पास शासन, सत्ता और बेहतर पहुंच के संसाधन भी हैं। जाहिर है राहुल गांधी के ऊपर कांग्रेस का खोया आत्मविश्वास लौटाने के साथ-साथ जनाधार बढ़ाने की जिम्मेदारी भी है। उन्हें पार्टी के ही नए और पुरानों के बीच भी संतुलन साधना होगा।

यह अच्छी बात है कि राहुल को यह शिक्षा मां सोनिया गांधी की सियासती छतरी के नीचे हासिल हुई। सोनिया गांधी के सियासी सफर को देखें, तो उनके सामने भी कमोबेश ऐसी ही चुनौतियां थीं। सोनिया गांधी का जन्म इटली के लुजायाना में 9 दिसंबर 1946 को हुआ था। कैम्ब्रिज में सोनिया की दोस्ती राजीव गांधी से हुई। 1968 में राजीव गांधी और सोनिया की शादी हुई। बताया जाता है कि शुरुआती दिनों में सोनिया गांधी राजीव के राजनीति में आने के सख्त खिलाफ थीं। पर संजय गांधी की हवाई जहाज हादसे में हुई मौत के बाद मां इंदिरा गांधी के बुलावे पर राजीव गांधी को राजनीति में आना पड़ा। बाद में इंदिरा गांधी की हत्या, कांग्रेस का प्रचंड बहुमत और राजीव गांधी का 'मिस्टर क्लीन' से 'बोफोर्स घोटाले' तक के आरोप में फंस 1989 के चुनाव में कांग्रेस की हार तक सोनिया ने बहुत कुछ सीखा।
मई 1991 में एक चुनावी रैली के दौरान राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। लेकिन तब भी सोनिया गांधी ने राजनीति से दूरी बनाए रखी।

 तमाम दबाव के बाद सोनिया गांधी की हिमायत से पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। राजीव गांधी की मौत के बाद सोनिया गांधी ने सामाजिक कार्यों में अपना वक्त दिया।  खासकर राजीव गांधी फाउंडेशन के कामों में। इस बीच 1996 के आम चुनाव में नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद से नरसिम्हा राव के खिलाफ कांग्रेस में बगावती सुर उठने लगे थे। इन सुरों को ठंडा करने के लिए सीताराम केसरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन पार्टी के कई नेता कांग्रेस के अलग हो गए जिसमें उत्तर भारत से नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह ने मिलकर तिवारी कांग्रेस का गठन किया। तमिलनाडु के कद्दावर नेता जीके मूपनार ने पी. चिदंबरम के साथ तमिल मनीला कांग्रेस बना ली। मध्य प्रदेश में माधवराव सिंधिया ने भी अपना अलग दल बनाया।

 
पार्टी का एक खेमा सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने की कोशिश में जुटा था। जिसके अगुवा अर्जुन सिंह थे। सोनिया ने 1997 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1998 में कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष मनोनीत कर दिया। लेकिन राजनीति की राह इतनी आसान नहीं थी। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिरने के बाद सरकार बनाने की कोशिश की गई। लेकिन आखिरी समय में मुलायम सिंह ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा बना कर समर्थन देने से इन्कार कर दिया।  इस मुद्दे पर ही शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा भी कांग्रेस से अलग हो गए।

1999 के आम चुनाव में कांग्रेस को फिर हार का सामना करना पड़ा। 1999 में सोनिया गांधी विपक्ष की नेता बनीं। इस बीच साल 2000 में कांग्रेस में चुनाव हुए, यूपी के ब्राह्मण नेता जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन जीत सोनिया गांधी की हुई। 2003 में अटल सरकार के खिलाफ सोनिया ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। 2004 में एनडीए का इंडिया शाइनिंग शबाब पर था।  कांग्रेस को एक साथ रखने की चुनौती सोनिया गांधी पर थी। सोनिया गांधी ने कांग्रेस के साथ नए दलों को इक_ा करना शुरू किया। बिहार से लेकर केरल तक कई दलों के साथ गठबंधन हुआ। चुनाव नतीजों से सोनिया ने सबको चौंका दिया।

15 दलों के गठबंधन की सरकार बनी, जिसको वामंपथी दलों ने बाहर से समर्थन दिया। संसद के सेंट्रल हॉल में हंगामे के बीच सोनिया गांधी ने पीएम बनने से इन्कार कर दिया। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो सोनिया गांधी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की अध्यक्ष। जो सरकार को सलाह मशविरा देने का काम करती रहीं। 23 मार्च 2006 को सोनिया गांधी ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट को लेकर हंगामा चल रहा था।  जिसकी वजह से सोनिया गांधी ने ये कदम उठाया। साल 2008 में अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील के मसले पर लेफ्ट ने समर्थन वापस ले लिया।  लेकिन समाजवादी पार्टी के समर्थन और क्रास वोटिंग से यूपीए की सरकार बच गई।

यूपीए के इस कार्यकाल में मनरेगा और आरटीआई जैसे कानून लाए गए। किसानों के कर्ज माफ किए गए। 2009 के आम चुनाव में विपक्ष की तरफ से कालेधन को मुद्दा बनाया गया। लेकिन कांग्रेस को और ज्यादा सीट लोकसभा में मिली। खासकर यूपी में जहां 23 सांसद जीतकर आए। 2009 के बाद सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। 2-जी घोटाले का आरोप, कोयला में घोटाले का आरोप और काले धन को लेकर सरकार की सुस्ती पर सवाल खड़ा किया गया। अन्ना, रामदेव और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन की वजह से यूपीए की साख गिर गई।  2014 में बीजेपी को भारी बहुमत मिला.

2014 में कांग्रेस की हार का सिलसिला जो शुरू हुआ. मोदी का जादू चल रहा था। कांग्रेस की हरियाणा, महाराष्ट्र में सरकार गई। असम, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश हर जगह चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हारी। सिवाय बिहार में जहां गठबंधन ने लाज बचाई। पर वहां भी पासा पलट गया। 2017 के चुनाव में पंजाब को छोड़कर हर जगह कांग्रेस का सफाया हो गया। पर सोनिया हर दौर में मजबूती से टिकी रहीं। अभी उनकी तबियत खराब है, ऐसे में राहुल गांधी के सामने चुनौतियां जरूर हैं, पर उनके पास जो विरासत और अनुभव है, वह भारतीय राजनीति में किसी और के पास नहीं। उम्मीद है कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी कांग्रेस सहित देश के लिए शुभ होगी।

Source:Agency