By: Sabkikhabar
08-12-2017 07:37

वित्तमंत्री अरुण जेटली का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले तीन सालों में काफी तेजी से बढ़ी है। उन्होंने बढ़ती महंगाई पर कांग्रेस के आरोपों को निराधार करार देते हुए यह भी कहा है कि आंकड़ों पर नजर डालें तो आम तौर पर महंगाई में गिरावट दर्ज की गई है। अपनी बात साबित करने के लिए वे यूपीए और मोदी सरकार के कार्यकाल में महंगाई के आंकड़े भी पेश करते हैं। कानून के ज्ञाता श्री जेटली अच्छे से जानते हैं कि बातों को शाब्दिक जाल में कैसे उलझाया जाता है। इसलिए नोटबंदी और जीएसटी के तात्कालिक नुकसानों और तकलीफों को यह कहकर सरकार टालती रही है कि इसके दूरगामी परिणाम अच्छे होंगे।

जनता ने इस अच्छे दिन के फेर में ही तो मोदी सरकार को चुना था। ये और बात है कि तीन साल से अधिक वक्त निकलने के बावजूद उसे अच्छे दिन आ गए हैं, ऐसा अहसास नहीं हो रहा है। और कुछ ऐसा ही हाल शायद रिजर्व बैंक का भी है, जो भावनाओं से परे केवल आंकड़ों पर आधारित फैसले लेती है। और देश की अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर उसके फैसलों में दिख जाती है। जैसे चालू वित्त वर्ष की पांचवी समीक्षा में आरबीआई ने मुख्य नीतिगत दर रेपो को 6 प्रतिशत पर यथावत रखा है।

रिवर्स रेपो दर भी 5.75 प्रतिशत पर ही रखी गयी है। गौरतलब है कि रेपो वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को तात्कालिक जरूरत के लिए नकद ऋ ण सुलभ करता है, जबकि रिवर्स रेपो वह दर है जिस पर वह बैंकों से अल्पकालिक नकदी लेता है। रिजर्व बैंक ने महंगाई के दबाव का हवाला देकर ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया। उसने इस वित्त वर्ष के बाकी समय के लिए मुद्रास्फीति में इजाफे के संकेत भी दिए हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि ब्याज दरें अगले साल भी जस की तस रह सकती हैं क्योंकि आरबीआई के पास अपना रुख बदलने या दरों में इजाफे की शुरुआत करने से पहले काफी कुछ करने की जगह बची हुई है। इसे सरल शब्दों में कहा जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था में अभी अच्छे दिन नहीं आए हैं और बहुत सी चुनौतियां सामने हैं, जिनसे मुंह मोड़कर देश को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

 आरबीआई की छह सदस्यों वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) ने अर्थव्यवस्था में कुछ अच्छी बातों का जिक्र किया है, जैसे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सूचकांक में सुधार हुआ है, ऋण न चुका रहे बड़े कर्जदारों को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हुई है, सरकार ने 2.11 लाख करोड़ रुपए बैंकों को फिर से वित्त मुहैया कराने के लिए मंजूर किए हैं। लेकिन कुछ कड़वी बातें भी हैं, जैसे कच्चे तेल की कीमतों में हालिया वृद्धि से कंपनियों के मार्जिन और सकल मूल्यवर्धित (जीवीए) वृद्धि दर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। खरीफ उत्पादन और रबी की बुवाई में कमी से कृषि क्षेत्र के परिदृश्य के नीचे की ओर जाने का जोखिम है।

 
रीयल एस्टेट जैसे सेवा क्षेत्र के कुछ क्षेत्रों में कमजोरी देखी जा रही है। और सबसे बड़ी बात वित्त वर्ष के अंत तक के लिए आरबीआई ने मुद्रास्फीति के अपने पिछले अनुमानों को बढ़ाकर 4.3-4.7 प्रतिशत के दायरे में कर दिया है। रिजर्व बैंक का लक्ष्य था कि 2017-18 में इसे 3.5 प्रतिशत पर ले आए, लेकिन खाद्य पदार्थों और तेल के दाम बढ़ने से मुद्रास्फीति को कम करना मुश्किल है। दूसरी ओर राजकोषीय घाटा भी बढ़ रहा है। राजस्व में वृद्धि हो नहीं रही है और सरकार के खर्च कम नहीं हो रहे हैं, इस वजह से इस वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे का जितना अनुमान लगाया गया था, उसका 96.1 प्रतिशत तो अक्टूबर के अंत तक ही हो ही चुका है।

इस घाटे को सौ प्रतिशत तक पहुंचने में भला कितना वक्त लगेगा, क्योंकि अभी कहीं से भारत के कोष में खजाना तो जमा होने वाला नहीं है कि सारे घाटे की भरपाई हो जाए। सरकार को घाटे का सीधा मतलब है जनता को घाटा। बिजनेस कितना बढ़ा या बिजनेस करने की सुविधाएं कितनी बढ़ीं, शेयर मार्केट में कितना उछाल आया या बैंकों की हालत कितनी सुधरी, आंकड़ों की इन बाजीगरी को एक पल के लिए किनारे कर अगर केवल मुद्रास्फीति बढ़ने और राजकोष पर बोझ बढ़नेे, इन दो सच्चाइयों का ही सामना किया जाए, तो समझ आएगा कि अभी महंगाई बढ़ने के और कारण मौजूद हैं। रिजर्व बैंक ने तो इन दो बातों का सीधा उल्लेख अपनी समीक्षा में किया है, अब यह सरकार पर निर्भर है कि वह इसे सुनती-समझती है या नहीं। 
 

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