By: Sabkikhabar
12-10-2017 04:38

महिला और बालअधिकारों की दृष्टि से सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा है कि नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध रेप माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की उस धारा 375(2) को गैर संवैधानिक बताया, जिसके मुताबिक 15 से 18 साल की बीवी से उसका पति संबंध बनाता है तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। कोर्ट के फैसले के मुताबिक यदि नाबालिग पत्नी एक साल के भीतर शिकायत करती है तो पति पर रेप का मुकदमा चलेगा। 

यूं तो बाल विवाह गैरकानूनी है और इस लिहाज से 18 साल से कम उम्र की लड़की या 21 साल से कम उम्र के लड़के का विवाह ही अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन यह भारत की विडंबना है कि यहां आज भी बालविवाह धड़ल्ले से होते हैं। इसका सबसे ज्यादा शिकार मासूम लड़कियां होती हैं। 2016 के नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक देश में तकरीबन 27 प्रतिशत लड़कियों की 18 साल की उम्र के पहले शादी हो जाती है, 2005 में ये आंकड़ा 47 प्रतिशत के करीब था। अच्छा है कि समाज में धीरे-धीरे जागरूकता आ रही है, लेकिन अबोध बच्चियों का जीवन बचाने के लिए अब धीमी गति छोड़कर त्वरित उपाय करने होंगे। परिवार की आर्थिक-सामाजिक स्थिति, किसी मजबूरी या धमकी के कारण या कभी खुद की मर्जी से भी अगर कोई किशोरी 18 साल से पहले विवाह के बंधन में बंधती है, तो यह उसके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए सही नहीं होता।

 
इसलिए बालविवाह पूरी तरह खत्म होने ही चाहिए। बच्चों के अधिकारों से जुड़ी इंडिपेन्डेंट थॉट नामक एक संस्था ने 2013 में एक याचिका दायर की थी कि 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंधों को बलात्कार मानना चाहिए। याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि बाल विवाह से बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। बाल विवाह बच्चों पर एक तरह का जुर्म है क्योंकि कम उम्र में शादी करने से उनका यौन उत्पीड़न ज्यादा होता है, ऐसे में बच्चों को प्रोटेक्ट करने की जरूरत है। याचिका में कहा गया था कि 15 से 18 वर्ष की लड़कियों की शादी अवैध नहीं होती है, लेकिन इसे अवैध घोषित किया जा सकता है। याचिका में यह भी दलील दी गई है कि इतनी कम में उम्र में लड़कियों की शादी से उसके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। दरअसल आईपीसी की धारा 375 सेक्शन 2 के मुताबिक 15 से 18 साल की पत्नी के साथ यौन संबंध को रेप की परिभाषा से बाहर रखा गया था। इस तरह तो विवाह की आड़ में बाल यौन शोषण हो ही रहा था। यह पोक्सो कानून की भावना के भी खिलाफ था। पोक्सो यानी प्रिवेंशन आफ चिल्ड्रन फ्रम सेक्सुअल आफेंस, देश में बाल यौन शोषण को रोकने के लिए बनाया गया है।

पोक्सो $कानून में किशोरी को परिभाषित करते हुए उसकी उम्र 18 साल बताई गई है। इसी तरह से जुविनाइल जस्टिस एक्ट में भी किशोर-किशोरियों की परिभाषा भी 18 साल बताई गई है। केवल आईपीसी की धारा 375 सेक्शन 2 में ही किशोरी की परिभाषा अलग थी। अब इस फैसले से यह विसंगति भी दूर होगी। इससे पहले इस याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत से आग्रह किया था कि वह इस धारा को रद्द न करे और संसद को इस पर विचार करने और फैसला करने के लिए समयसीमा तय कर दे। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि बाल विवाह सामाजिक सच्चाई है और इस पर कानून बनाना संसद का काम है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सती प्रथा भी सदियों से चली आ रही थी, लेकिन उसे भी खत्म किया गया, जरूरी नहीं जो प्रथा सदियों से चली आ रही हो वो सही हो। बाल विवाह मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में बाल विवाह को अपराध माना गया है उसके बावजूद लोग बाल विवाह करते हैं। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि ये मैरेज नहीं मिराज है। उम्मीद की जाना चाहिए कि सर्वोच्च अदालत के इस फैसले का समाज सम्मान करेगा और अपनी बच्चियों की सुरक्षा के बारे में सोचेगा।
 

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