By: Sabkikhabar
10-10-2017 08:12

1724 में महाराजा जयसिंह द्वितीय ने ग्रहों की स्थिति, वक्त और दिन-रात मापने के लिए जंतर-मंतर का निर्माण कराया था। दरअसल मोहम्मद शाह के शासनकाल में हिंदू और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों में ग्रहों की स्थिति पर बहस छिड़ी हुई थी। तब समरकंद की वेधशाला से प्रेरणा लेकर जयसिंह द्वितीय  ने इस उच्च वैज्ञानिक तकनीकी से संपन्न वेधशाला को बनवाया। दिल्ली के अलावा जयपुर, उज्जैन में भी ऐसी ही वेधशालाएं बनीं। ग्रह और समय की दशा-दिशा बताने वाला दिल्ली का जंतर-मंतर धीरे-धीरे लोकतंत्र की दशा-दिशा बताने लगा।

शासन की नीतियों से असहमति रखने वालों, किसी तरह के अन्याय या शोषण का शिकार लोगों, हाशिए पर पड़े सैकड़ों-हजारों लोगों की मौन पीड़ा को इस जगह से आवाज मिली। यह जंतर-मंतर ही था, जहां से निर्भया कांड में इंसाफ दिलाने की मुहिम छेड़ी गई, तेलंगाना बनाने की मांग यहां से उठी, लोकपाल लाने के लिए अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर से आंदोलन छेड़ा, वन रैंक, वन पेंशन, किसानों की ऋण मुक्ति की मांग, गोरखालैंड के लिए नारे, और अखलाक, जुनैद, गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ नागरिक समुदाय का आंदोलन, सब जंतर-मंतर में आकर गतिमान हुए। इन आंदोलनों, विरोध-प्रदर्शनों से लोकतंत्र के ग्रह की दशा-दिशा जनता ने भी देखी और सरकार ने भी। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अधिकार एक अचूक हथियार है और यह कहना गलत नहींहोगा कि इस हथियार को धार जंतर-मंतर ने दी।

 यूं तो यह दिल्ली के ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में से एक है। लेकिन यहां इतिहास के साथ-साथ हम नयी पीढ़ी की मुलाकात देश के वर्तमान से भी करा सकते हैं। उन्हें लोकतंत्र के पाठ की शिक्षा दे सकते हैं कि देखो हमारी शासन प्रणाली में विरोध के अधिकार के लिए भी सम्मानपूर्वक जगह दी गई है। अफसोस किजंतर-मंतर से मिला यह अधिकार अब इतिहास बनने जा रहा है। दरअसल जंतर-मंतर के आस-पास रहने वाले कुछ लोगों ने यह याचिका राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) में दायर की थी कि यहां होने वाले धरना-प्रदर्शनों से ध्वनि प्रदूषण होता है, उन्हें असुविधा होती है। एनजीटी ने इस याचिका पर बीते गुरुवार फैसला सुनाया कि चार हफ्ते के भीतर प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर से हटाकर अस्थायी धरनास्थल रामलीला मैदान में भेजा जाए।

 
प्रदूषण पर एनजीटी की यह सख्ती और तत्परता देखकर निश्ंिचत हुआ जा सकता है कि अब देश में पर्यावरण पूरी तरह संरक्षित होगा, उसे कोई नुकसान एनजीटी नहींपहुंचने देगी। हमारी नदियां, जंगल, घाटियां, झील-झरने, जिनका बेतहाशा दोहन और शोषण उद्योगपतियों ने किया, उन सबके खिलाफ भी एनजीटी कोई फैसला लेगी। आर्ट आफ लिविंग वाले श्री श्री रविशंकर ने दो साल पहले यमुना किनारे भव्य महोत्सव कर यमुना नदी और उससे लगे खेतों का जो नुकसान किया, उसकी भरपाई भी अब होगी। दिन-रात काला धुआं उगलती फैक्ट्रियों को शहर से दूर भेज दिया जाएगा, सड़कों पर पुराने वाहन नहींदौड़ेंगे, पूजा-पाठ के नाम पर रात-रात भर चलने वाले कानफोड़ू भजन भी अब सुनने की कोई मजबूरी नहींरहेगी।

एनजीटी को पर्यावरण की चिंता है, उससे भी ज्यादा नागरिकों की चिंता है। जो लोग जंतर-मंतर पर धरना करने देश के किसी भी कोने से मुंह उठाए चले आते हैं, वे इस देश के नागरिक थोड़े ही हैं। किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, सैनिक, छात्र, महिलाएं, जो भी जंतर-मंतर पर धरना देने आते हैं, वे निहायत अनुत्पादक लोग हैं, जिनका इस देश के जीडीपी में कोई योगदान नहींहै। इसलिए क्या फर्क पड़ता है कि वे जंतर-मंतर पर आकर चीखें-चिल्लाएं या रामलीला मैदान में।

संसद से दूर चीखेंगे तो सत्ता की नींद में भी खलल कम पड़ेगा। जंतर-मंतर के पास रहने वाले सुविधाभोगी लोगों की सेहत भी अब सुधरेगी। रामलीला मैदान के आसपास जो लोग रहते हैं, वे तो अरसे से ऐसे शोर-शराबे के आदी रहे हैं, उनके लिए थोड़ा शोर और सही। 
 

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