By: Sabkikhabar
09-10-2017 05:28

1 जुलाई को आर्थिक आजादी मनाने के दो ही महीने बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री को यह नजर आया कि बाकी दलों की तरह चुनाव जीतने के लिए भाजपा को भी वोट चाहिए। अभी पार्टी इतनी सशक्त नहीं हुई है कि मतदाताओं के बिना ही हिंदुस्तान पर राज कर ले। गुजरात समेत कई विधानसभाओं में चुनावों की दस्तक हो चुकी है। इस बीच किसानों, दलितों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं में नित नए हो रहे शोषण से सरकार के खिलाफ असंतोष व्यापकस्तर पर फैल चुका है। इस वर्ग की फिक्र तो खैर सरकार को कभी रही ही नहीं, इसलिए उन पर हो रहे अत्याचार को रोकने की कोई ईमानदार कोशिश भाजपा सरकार ने नहीं की।

लेकिन नोटबंदी और जीएसटी से व्यापारी वर्ग की नाराजगी झेलने की हिम्मत हमारे वीर प्रधानमंत्री और उनके प्रिय वित्तमंत्री अरुण जेटली नहींदिखा पाए। वैसे इन लोगों में इतनी वीरता नहींहै कि वे खुल कर अपनी गलती मान लें। जैसे सारे टीवी चैनलों पर एक साथ प्रकट होकर मोदीजी ने नोटबंदी की घोषणा की थी। वैसे ही सारे चैनलों पर प्रकट होकर वे देश के सामने यह स्वीकार नहींकर सकते कि हां, जीएसटी का फैसला हमने जल्दबाजी में लिया, अच्छे से तैयारी नहीं की और इसके कारण लाखों व्यापारियों, कारोबारियों, उद्यमियों को जो नुकसान उठाना पड़ा, मानसिक कष्ट झेलना पड़ा, उसके लिए हम माफी चाहते हैं। अगर वे ऐसा करते तो शायद इस देश के लोगों का भरोसा उन पर बढ़ता। 

बहरहाल, जीएसटी में अब हो रहे बदलाव से यह साबित हो रहा है कि सरकार ने गलती की थी और अब उसमें सुधार लाना उसकी चुनावी मजबूरी है। एक देश, एक टैक्स के उद्देश्य वाली जीएसटी अब एक देश, कई टैक्स में बदल चुकी है। (अ) दानियों और बानियों के निजी हवाई जहाजों में सवार हो आसमान छूने वाले मोदीजी को अचानक हिंदुस्तान की जमीनी हकीकत नजर आई। उन्हें समझ आ गया कि गुजरात बचाना है तो पहले व्यापारियों को खुश करना होगा। इसलिए गहने, कपड़े, चाइल्ड पैकेज्ड फूड, स्टेशनरी, जरी के काम और आर्टिफिशल जूलरी यहां तक कि गुजराती नमकीन खाखरा तक कुल 27 श्रेणियों में जीएसटी घटा दी गई है।

इनमें आठ ऐसे वर्ग हैं, जिनके व्यापार में गुजरात के लोग अधिक जुड़े हैं। खाखरा की बढ़ी कीमत मोदीजी को नजर आई, लेकिन पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में बनने वाली मूंगफली की चिकी जो 18 प्रतिशत जीएसटी के कारण महंगी हो गई है, उसकी फिक्र मोदी-जेटली को नहींहै, क्योंकि महाराष्ट्र में तो अभी सत्ता बनी हुई है।

 
जब वहां चुनाव होंगे, तब की तब सोची जाएगी। यही हाल वस्त्र उद्योग का है। हाथ से बनने वाले धागे और सिंथेटिक फिलामेंट यार्न पर तो जीएसटी 18 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत कर दी गई है, लेकिन उत्तरप्रदेश में 5 से 12 प्रतिशत टैक्स के दायरे में आकर चिकनकारी उद्योग का जो नुकसान हुआ है, या बनारस के बुनकरों पर जो मार पड़ी है, उसकी फिक्र सरकार को नहींहै। एक ओर स्किल इंडिया का ढोल पीटा जा रहा है, दूसरी ओर हस्तशिल्प, कुटीर उद्योगों को ढोल की तरह पीट दिया गया है।

दोना-पत्तल, जूट बैग, बोरे, कागज से बनने वाले सामान, नारियल खोल से तैयार सामग्री इन सब पर जीएसटी का विपरीत प्रभाव पड़ा है। सिंदूर, बिंदी और चूड़ियों को तो टैक्स मुक्त रखा गया है, लेकिन सैनिटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगा है। क्या महिलाओं के बाहरी श्रृृंगार से पहले, आंतरिक सफाई और स्वास्थ्य की जरूरत नहींहै? क्या हमारी सरकार इतनी संवेदनशीलता धर्म, जाति से परे तमाम महिलाओं के लिए नहींदिखा सकती थी। पता नहींजीएसटी का नुकसान झेल रहे कई सारे वर्गों के लोगों के पर सरकार कब मेहरबान होगी।

फिलहाल तो सरकार ने अपना भूल सुधार भी इस अंदाज में किया है मानो खैरात बांट रही हो। कहा गया कि दीवाली के पहले दीवाली मना ली। अरे साहेब, आपकी जल्दबाजी, हठधर्मिता और स्वार्थ के कारण जो करोड़ों लोगों का दिवाला निकला हुआ है, क्या कभी उस बारे में भी आप सोचेंगे या हमेशा चुनावी मोड में ही रहेंगे?
 

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