By: Sabkikhabar
11-08-2017 07:55

जहां नीतीश के समक्ष विकल्पों का प्रश्न है, कहें कुछ भी, वे खुद भी जानते हैं कि वाकई विकल्पहीन नहीं हुए थे। वे चाहते तो मुख्यमंत्री पद का त्याग करके भी अपने आक्रोश का इजहार कर सकते थे और ऐसा करना उनकी प्रतिष्ठा का विस्तार करने वाला कदम होता। लेकिन अब वे जो कुछ कह रहे हैं, उससे केवल यही स्वर निकलता है कि 'मैंने तो गठबंधन की राजनीति भी सत्ता और मुख्यमंत्रित्व लाभ के लिए ही की थी। सत्ता बनी रहे, इसके उपाय मुझे ढूंढने ही थे। इसलिए मैं फिर वहीं पहुंच गया, जहां से चला था...। महागठबंधन बनते समय मैंने जो यह कहा था कि मिट्टी में मिल जाऊंगा, मगर भाजपा के साथ नहीं जाऊंगा, वह केवल दिखावटी था, अमल के लिए नहीं।’

बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो नीतीश कुमार ने अपनी ही पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और दूसरे बड़े नेता शरद यादव के इस बयान पर कि बिहार में राजद जदयू और कांग्रेस के महागठबन्धन का टूटना उनके लिए अफसोसनाक है, टिप्पणी करते हुए कहा है कि मैं क्या करता, मेरे पास भाजपा के साथ जाने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं था। नीतीश कुमार अपने को स्वच्छ राजनीति का कितना भी बड़ा अलमबरदार या कि कितना भी बड़ा/गम्भीर विचारक क्यों न मानते हों, उनकी यह प्रतिक्रिया सिर्फ और सिर्फ हताशा के स्वरों से गुंजित है। क्योंकि उनके संदर्भ में इसका अर्थ केवल यही है कि उन्होंने जो कुछ किया, उसके बिना वे सत्ता के संचालक और मुख्यमंत्री रह ही नहीं सकते थे। यह टिप्पणी इस सवाल का जवाब नहीं देती कि क्या राजनीति केवल सत्ता के लिए ही की जानी चाहिए विचार और परिवर्तन के लिए नहीं?

जहां नीतीश के समक्ष विकल्पों का प्रश्न है, कहें कुछ भी, वे खुद भी जानते हैं कि वाकई विकल्पहीन नहीं हुए थे। वे चाहते तो मुख्यमंत्री पद का त्याग करके भी अपने आक्रोश का इजहार कर सकते थे और ऐसा करना उनकी प्रतिष्ठा का विस्तार करने वाला कदम होता। लेकिन अब वे जो कुछ कह रहे हैं, उससे केवल यही स्वर निकलता है कि 'मैंने तो गठबंधन की राजनीति भी सत्ता और मुख्यमंत्रित्व लाभ के लिए ही की थी। सत्ता बनी रहे, इसके उपाय मुझे ढूंढने ही थे। इसलिए मैं फिर वहीं पहुंच गया, जहां से चला था...। महागठबंधन बनते समय मैंने जो यह कहा था कि मिट्टी में मिल जाऊंगा, मगर भाजपा के साथ नहीं जाऊंगा, वह केवल दिखावटी था, अमल के लिए नहीं।’

बहरहाल, गठबंधन सत्ता के लिए ही होना था तो बेहतर होता कि उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा के उस समझौते की भांति परिभाषित होता, जिसमें तय हुआ था कि मुख्यमंत्री पद 6-6 महीने के लिए दोनों दलों में बंटेगा। पहले बसपा सत्तारूढ़ होगी, बाद में भाजपा। लोगों को अभी भी याद है कि 6 महीने सत्ता में रहने के बाद मायावती ने भाजपा की बारी में बाधक बनने का रास्ता अपनाया, तो उन पर समझौते की भावना पर ही प्रहार करने के आरोप लगे थे। इसके बावजूद दोनों दलों के दोबारा-तिबारा भी इसी प्रकार के समझौते व आचरण से सिद्ध हो गया था कि वास्तव में वह सब सत्ता पाने की ही तिकड़म थी। भाजपा ने 'ऐतिहासिक’ तोडफ़ोड़कर बसपा को इसका करारा जवाब दिया, तो भी यही कहा गया था कि सम्बन्धित समझौते सुविधा भर के लिए थे और सत्ता उनकी माध्यम थी।

बिहार में महागठबंधन के प्रयोग में जदयू के साथ राजद व कांग्रेस शामिल हुई थीं तो सपा, जो बिहार की राजनीति में लगभग शून्य वाली स्थिति में थी, यह कहकर उससे अलग हो गयी थी कि जो नीतीश अब तक भाजपा की गोद में थे, उनका सेकुलर हो जाना उसे विश्वसनीय नहीं लगता। तब उसके सुप्रीमो मुलायम पर आरोप लगाया गया था कि महागठबंधन का विरोधकर वे भाजपा की मदद कर रहे हैं। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में उनका यह कथन ऐतिहासिक महत्व का हो गया है।

फिलहाल, नीतीश की कथित मजबूरी पर विचार करते समय ये सवाल भी उठेंगे कि उनके भाजपा या राजग से नाराज होने व छोडऩे के पीछे मूल कारण क्या थे? महागठबंधन क्या केवल सत्ता के लिए होना था? क्या किसी खास व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना ही उसका लक्ष्य था और चुनाव में सत्ता के लिए वांछित बहुमत न मिलता तो उसे उसी क्षण अस्वीकार्य और त्याज्य बता दिया जाता? ऐसा था तो जाहिर है कि महागठबंधन के पीछे जो उद्देश्य और तर्क दिये गये थे, वे न तो स्थायी थे, न महत्व के और केवल दिखावटी थे। लेकिन तब उसकी बिना पर सत्ता में आने और मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश ने यह क्यों कहा था कि यह देश को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघमुक्त करने की राजनीति की शुरुआत है।

 
शरद यादव की बात करें तो उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा समाजवादी आन्दोलन से आरम्भ की थी, जिसमें कई बदलाव और भटकाव आये। कई दलों के गठन, सम्मिलन और अलगाव में भी उन्होंने भूमिकाएं निभाईं। यह और बात है कि देश की राजनीति में वे कोई बड़ा महत्वपूर्ण स्थान नहीं प्राप्त कर सके, लेकिन नीतीश कुमार ने ही कहा था कि उनकी पार्टी के राजग में जाने के बाद केन्द्र के एक मंत्री और राज्यमंत्री के जो पद उसके कोटे में आने है, उनमें मंत्री तो शरद यादव ही होंगे। लेकिन फिलहाल शरद मंत्री पद के लिए अतिउत्साहित होकर नीतीशमय होते नहीं दिखते और उस रूप में उनका महत्व घटने के बजाय बढ़ा ही है। उनकी कथनों पर प्रतिक्रियाएं हो रही हैं, जिसका अर्थ है कि वे महत्वहीन नहीं हैं।

फिर यह भी किसी से छिपी नहीं कि राजनीति में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। देश के बंटवारे के वक्त खून-खराबे के बीच साम्प्रदायिकता का विस्तार होता दिख रहा था, तो भारतीय जनसंघ, हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद आदि दल इन प्रश्नों को लेकर चुनाव मैदान में उतरे थे। भारतीय जनसंघ ने बंटवारे के विरुद्ध 'अखण्ड भारत’ का नारा भी दिया था लेकिन उन्हें देश भर में 5 लोकसभा सीटें भी नहीं मिल पायीं।

1984 में इन्दिरा गांधी ही हत्या के बाद चुनाव हुए तो भाजपा के दिग्गज नेता अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी तक चुनाव हार गये और भाजपा को लोकसभा की केवल दो सीटें ही हासिल हुईं, जबकि राजीव गांधी ने कांग्रेस के लिए सर्वाधिक सीटें जीतकर उदाहरण प्रस्तुत किया। लेकिन 1989 में उनकी हत्या भी हुई और कांग्रेस को बहुमत भी नहीं मिला। तब उन्हें कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा समर्थित विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के बायें लगना पड़ा। यह उनकी जनेच्छा पर आधारित नियति थी। इसी तरह 1977 में इन्दिरा गांधी की सत्ता से बेदखली का कोई अनुमान तक नहीं लगा रहा था और वह किसी चुनावी मूल्यांकन का परिणाम भी नहीं थी।

जाहिर है कि राजनीति में उत्थान-पतन व परिवर्तनों के दौर चलते ही रहते हैं। इन परिवर्तनों को लाने, प्रभावित करने या उनसे प्रभावित होने वालों की पहचान इस आधार पर की जाती है कि परिवर्तनों के वक्त उनकी दिशा और भूमिका क्या थी? सत्ता तो आती और जाती रहती है। नीतीश कुमार इसे समझते और मानते कि राजनीति सेवा के लिए भी होती है तो उन्हें बिहार के हित की आड़ में ऐसी सैद्धान्तिक रूप में अस्वीकार्य टिप्पणी न करनी पड़ती कि अन्य कोई रास्ता नहीं था।

अब उन्हें कौन समझाये कि राजनीति सिर्फ सत्ता पर आधारित हो जाती है तो अवसरवादी हो जाती है और इस रूप में वे अपने अवसरवाद का ही प्रदर्शन कर रहे हैं, जो परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के आधार पर बारम्बार रंग बदलता रहता है। उनकी दिक्कत यह है कि वे 1967 में प्रवर्तित गैरकांग्रेसवाद के समाजवादी सिद्धांत की दुहाई भी नहीं दे सकते। किसी भी सिद्धांत में गैर और अपने की परिभाषा व स्वीकार्यता तर्कसंगत होनी चाहिए। यह परिभाषा सुविधा और लाभ को देखकर की जाती है, तो मर्यादाविहीनता के दोषों से ग्रस्त अवसरवाद ही बचता है।
 

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