By: Sabkikhabar
10-08-2017 07:38

वे लोग जो पिछले सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ की रट लगाते हैं, रोना रोते हैं, शिकायत करते हैं, उनके सामने मैं कुछ नाम रखना चाहता हूं। होमी जहांगीर भाभा, विक्रम साराभाई, सतीश धवन, यू.आर. राव, जयंत विष्णु नार्लिकर, बसंत गोवारीकर, पंचानन माहेश्वरी, खड्गसिंह वल्दिया, वर्गीज़ कुरियन, आर.एच. रिछारिया, डी.एस. कोठारी, प्रो. यशपाल, पुष्पमित्र भार्गव, एपीजे अब्दुल कलाम इत्यादि। नामों की यह फेहरिस्त काफी लंबी बन सकती है। इसमें वे नाम भी जुड़ सकते हैं जो विदेश जाकर बस गए हैं और जिन्होंने नोबल पुरस्कार सहित अनेक सम्मान हासिल किए। पाठक अगर गौर करें तो पाएंगे कि ये सारे नाम वैज्ञानिकों के हैं। देश में ऐसे विद्वानों की कमी नहीं है जिन्होंने अन्य क्षेत्रों में अपार सफलताएं अर्जित की हैं; अपनी मेधा से विश्व को चमत्कृत और भारत को गौरवान्वित किया है। कभी प्रसंग आने पर ऐसे नामों की भी चर्चा शायद हो सकेगी। मैं वैज्ञानिकों की सूची में दो नाम और जोड़ना चाहूंगा जो थे तो विदेशी, लेकिन जिन्होंने अंतर्मन से भारत को अपना घर बना लिया था। एक जेबीएस हाल्डेन, और दूसरे प्रोफेसर डब्लू. डी. वैस्ट।

मैंने इनमें से अधिकतर वैज्ञानिकों के काम के बारे में सुना है और अपने देश के लिए उन्होंने जो कुछ किया है उसके प्रत्यक्ष परिणाम भी देखे हैं। इन नामों का जिक्र मैं आज इसलिए कर रहा हूं कि पिछले दिनों हमने अपने तीन महान वैज्ञानिकों को खो दिया, लेकिन उनके निधन पर न तो मीडिया में कोई खास चर्चा सुनने मिली और न उन उच्च शिक्षण संस्थानों में उन्हें शायद ही याद किया गया जिनको बनाने संवारने में उन्होंने अपना पूरा जीवन खपा दिया। हमें कभी भारत का अर्थ बताया गया था कि जो भा अर्थात बुद्धि और ज्ञान की साधना में रत हो वह भारत है। आज का दृश्य देखकर लगता है कि यह परिभाषा शायद मनगढ़ंत है। यहां टीवी के छोटे-मोटे कलाकारों को देखने के लिए भीड़ उमड़ती है, नामचीन फिल्मी सितारों के मिनट-दो मिनट के कार्यक्रम के लिए करोड़ों लुटा दिए जाते हैं, लेकिन विश्वगुरु होने का दावा करने वाले इस देश में उन गुरुओं का कोई सम्मान नहीं, उन्हें कोई याद नहीं करता, जिन्होंने सचमुच मां भारती की सेवा की है।

हमारी शासन व्यवस्था, समाज व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था- सब में ज्ञान, विवेक और तर्कबुद्धि, इन सबका मानो कोई स्थान नहीं रह गया है। अंग्रेजी में जिसे सॉफ्ट पावर कहा जाता है उसे हम लगभग भूलते जा रहे हैं। चंद्रयान, मंगलयान, उपग्रहों का प्रक्षेपण इत्यादि देखकर मन स्वाभाविक रूप से आनंदित होता है कि हमारे देश ने वैज्ञानिक प्रगति का ऐसा मुकाम हासिल किया है; लेकिन आनंद के इस क्षण में अगर यह याद न रहे कि इन उपलब्धियों के पीछे किसकी कल्पना, ज्ञान और परिश्रम लगा हुआ है, तो क्या यह एक तरह से अकृतज्ञता नहीं है? विरोधाभास देखिए कि जब अपने आसपास के किसी प्रतिभावान युवक या युवती को किसी वैज्ञानिक मिशन में छोटी-मोटी भूमिका निभाने का भी अवसर मिलता है तो हम उस पर उल्लास प्रकट करते हैं, लेकिन ऐसे किसी मिशन की परिकल्पना कैसे होती है, उसे साकार कौन करता है, उसकी कार्ययोजना किसने बनाई है, यह सब हम शायद जानना ही नहीं चाहते। दूसरे शब्दों में हम एक अवसरवादी मनोवृत्ति का पालन करते दिखाई देते हैं।

 
मैंने प्रारंभ में जिन महानुभावों के नाम लिए, उनमें से कुछ को निजी तौर पर जानने के संक्षिप्त अवसर भी मुझे मिले और मैंने पाया कि भारत को प्रगतिशील, शांतिपूर्ण, सौहाद्र्रपूर्ण, समृद्ध देश बनाने की कितनी तड़प इनके मन में थी। ये वे लोग थे जो उत्तर औपनिवेशिक युग में नवसाम्राज्यवादी ताकतों के सामने नहीं झुके, जिन्हें विदेशी विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों से एक से बढ़कर एक लुभावने, लालच भरे प्रस्ताव मिले किन्तु इन्होंने उनको ठुकरा दिया। भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर हो या इसरो, अमूल डेयरी हो या राष्ट्रीय वनस्पति शोध संस्थान, सागर विश्वविद्यालय हो या भारतीय सांख्यिकी संस्थान, ऐसे तमाम प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान इन लोगों की ही देन है। जेबीएस हाल्डेन मूलत: ब्रिटिश थे, लेकिन वे भारत में अन्य बातों के अलावा सिकलसेल पर अनुसंधान करते रहे और उनका निधन हुआ तो वसीयत के मुताबिक उनका पार्थिव शरीर मेडिकल कॉलेज में दान कर दिया गया। प्रोफेसर वैस्ट ने सागर विश्वविद्यालय में टीन की छत वाले बैरक में भूगर्भशास्त्र की अपनी प्रयोगशाला स्थापित की।

बसंत गोवारीकर वह वैज्ञानिक थे जिन्होंने मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने का फार्मूला विकसित किया। वे 1960-61 में इंग्लैंड में पंडित नेहरू से मिले थे और उनके विचारों से प्रभावित होकर देश लौट आए। युवा वैज्ञानिक संजय पलसुले के निमंत्रण पर कोई पन्द्रह साल पहले वे रायपुर आए थे तब उनके साथ घंटे-दो घंटे की बातचीत हुई थी। उनके मन में तड़प थी कि कैसे हमारे युवजन वैज्ञानिक सोच और वैज्ञानिक दृष्टि सिद्ध करें। पुणे विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए इस दिशा में वे सदैव प्रयत्न करते रहे। जयंत नार्लिकर ने तो युवावस्था में ही काफी सुयश अर्जित कर लिया था। वे इंग्लैंड में प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेड हॉयल के साथ खगोल विज्ञान में काम कर रहे थे। उनकी खोजों के लिए उन्हें नोबल पुरस्कार मिलने तक की संभावना जतलाई जाती थी, किन्तु वे भी देश की सेवा करने के लिए भारत लौट आए। यहां उन्होंने देश भर से खगोलशास्त्रियों की एक अच्छी टीम तैयार कर ली। पुणे विश्वविद्यालय के परिसर में ही इस हेतु एक केन्द्र भी स्थापित हुआ। यही नहीं, उन्होंने विज्ञान कथाएं लिखने के साथ-साथ बच्चों को विज्ञान शिक्षा देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है। उनकी गणितज्ञ पत्नी मंगला जी उनका साथ देती हैं।

प्रो. यशपाल इसरो अर्थात भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अहमदाबाद के निदेशक थे। उन्होंने अमूल के संस्थापक और श्वेत क्रांति के जनक डॉ. कुरियन से मिलकर योजना बनाई कि इसरो के उपग्रहों का उपयोग करते हुए गुजरात के दुग्ध उत्पादक परिवारों को शिक्षित किया जाए। परिणामस्वरूप साइट (स्ढ्ढञ्जश्व)योजना अस्तित्व में आई। हिन्दी में इसे उपग्रह शैक्षिक टेलीविजन प्रयोग के नाम से हम जानते हैं। देश के छह प्रदेशों में साइट (स्ढ्ढञ्जश्व) के अंतर्गत ग्रामीण जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की बुनियादी जानकारी उपग्रह से जुड़े टीवी सेट के माध्यम से दी जाने लगी। 1975 में प्रारंभ इस कार्यक्रम के बाद ही भारत में टीवी की लोकप्रियता बढ़ी। इसके बाद का किस्सा तो सब जानते हैं।

छत्तीसगढ़ के पाठकों को शायद याद हो कि वे प्रो. यशपाल ही थे जो नवगठित राज्य में अंधाधुंध निजी विश्वविद्यालय खोलने के निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय तक गए थे। इस प्रदेश को उनका कृतज्ञ होना चाहिए कि उनकी सामयिक पहल के चलते ही निजी विश्वविद्यालयों के लिए नियम-कानून बने और शिक्षा की दुकानें खोलने पर किसी हद तक लगाम लग सकी। मुझे यशपाल जी के साथ राष्ट्रीय साक्षरता अभियान की एक जूरी में सदस्य बनने का संयोग मिला। मैंने जब उन्हें बताया कि उदयपुर (राजस्थान) के एक गांव में एक नाई परिवार की बहू उच्च सवर्ण, विशेषकर ठाकुरों की महिलाओं के लिए साक्षरता की कक्षाएं लगा रही है तो यह सुनकर वे बहुत खुश हुए और मुझसे कहा- ललित! कमाल है मैं इस लड़की से मिलकर उसे व्यक्तिगत तौर पर बधाई देना चाहता हूं। ऐसे लोग ही भारत में एक नए समाज की रचना कर पाएंगे। मैं प्रोफेसर यशपाल का उत्साह और सहजता देखकर अभिभूत था। उन्हें कोई गुरूर ही नहीं था कि वे इतने बड़े वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे।

अभी कुछ दिन पहले पुष्पमित्र भार्गव का निधन हुआ। प्रो. भार्गव सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी अर्थात कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान संस्थान, हैदराबाद के संस्थापक निदेशक थे। मैंने उन्हें पहली बार हैदराबाद में ही देखा जब वे निजाम कॉलेज मैदान में करीब दस हजार लोगों की भीड़ के सामने विश्वशांति, भाईचारे और सांस्कृतिक विनिमय पर व्याख्यान दे रहे थे। वैसे वे हिन्दी भाषी थे, लेकिन एक राष्ट्रीय सम्मेलन में होने के नाते उनका व्याख्यान अंग्रेजी में था। सहज, सरल, धाराप्रवाह जिसे उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। प्रो. भार्गव ने वर्तमान सरकार में असहिष्णुता के विरुद्ध अपना पद्मभूषण सम्मान लौटा दिया था, लेकिन कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति से भी त्यागपत्र दे दिया था क्योंकि वे कार्यकारी अध्यक्ष सैम पित्रोदा के विचारों से असहमत थे। दूसरे शब्दों में वे एक स्वतंत्रचेता नागरिक थे। हमें वर्तमान युग के इन मनीषियों के बारे में स्वयं जानना चाहिए और आवश्यकता है कि नई पीढ़ी का भी इनसे परिचय कराया जाए।
 

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