By: Sabkikhabar
09-08-2017 06:47

प्रेस का भगवाकरण कर दिया गया है और अखबार या टीवी चैनलों में कुछ अलग आवाजों को छोड़कर, प्रेस सत्ता में बैठे लोगों के इशारे पर नाचता है। पहले और आज में बहुत कम अंतर है क्योंकि अखबार या टेलीविजन चैनलों के मालिक और पत्रकारों के दिमाग में अपना अस्तित्व बचाने की बात सबसे ऊपर रहती है। एनडीटीवी दबाव में है क्योंकि इसके मालिक प्रणव राय ने एक कर्ज लिया था। लेकिन सीबीआई ने आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड, प्रणय राय और उनकी पत्नी राधिका राय और आईसीआईसीआई के एक अज्ञात कर्मचारी के खिलाफ साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार का मामला दर्ज कर दिया है, जिसके बारे में कहा जाता है कि सरकार के इशारे पर हुआ है।

 

मैं अपने पसंदीदा टेलीविजन एंकर करन थापर और अभी हाल में, बरखा दत्त को बेकार ही ढूंढ रहा था। मुझे बताया गया कि उन्हें हटा दिया गया है। यह अनुमान का विषय है कि किसने ऐसा किया। कुछ लोग कहते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार का दबाव है, जबकि कुछ लोगों का रोना है कि यह चैनल के मालिकों का काम है। ऐसा जिसने भी किया हो, उसने सेंसरशिपकर्ता की तरह व्यवहार किया है।

मुझे आश्चर्य इस बात का है कि कोई विरोध नहीं है। हमारे समय में, यह बताने के लिए शोर मचता था या बैठक होती थी कि प्रेस का मुंह बंद किया गया है या आलोचना को चुप कराया गया है। बेशक, उस समय की बात दूसरी है जब आपातकाल लगाया गया था। लेकिन इसके पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी प्रेस के खिलाफ कदम उठाने की हिम्मत नहीं करती थीं। वह समर्थक ढूंढती थीं-जो पर्याप्त संख्या में थे- लेकिन आलोचकों की संख्या भी बड़ी थी।

मुझे याद है कि 1975-77 में आपातकाल लगाने के बाद उन्होंने विजयी भाव से कहा था कि एक भी नहीं भौंका। इससे मैं और दूसरे कई लोग आहत थे। हम लोग प्रेस क्लब में जमा हुए-संख्या 103 की थी और हमने सेंसरशिप की आलोचना का प्रस्ताव पारित किया। सूचना मंत्री वीसी शुक्ला, जो मुझे जानते थे, ने चेतावनी देने के लिए मुझे फोन किया 'तुममें से हर एक को जेल में बंद कर दिया जाएगा’। सच में ऐसा हुआ और मुझे भी तीन महीने के लिए हिरासत में रखा गया।

मेरी आंखों के सामने वही समय आ गया जब तसलीमा नसरीन ने कहा कि 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विरोध की बहुत कम आवाज सुनाई देती है’। कोलकाता छोड़ने के बाद उन्हें औरंगाबाद की सीमा में रोक रखा गया। वह बंगलादेश की हैं और केरपंथियों ने उन्हें बाहर खदेड़ दिया क्योंकि उन्होंने अपने देश में कट्टरपंथियों के हाथों हिन्दू औरतों की दुर्दशा की कहानी बताने वाली 'लज्जा’ नाम की किताब लिखी।

यह भारतीय लोकतंत्र के लिए कलंक है कि वह अपने पसंद की शहर में नहीं रह सकतीं। मुझे बताया गया कि कुछ दिन पहले उन्हें औरंगाबाद वापस भेज दिया गया। मैं इस घटना की चर्चा को आगे खींचना नहीं चाहता, लेकिन मेरे दिमाग में जो बात है वह हमारे लोकतंत्र पर खतरा।

आपातकाल बिना लगाए, आपातकाल जैसी स्थिति रह सकती है। आरएसएस विभिन्न शिक्षण संस्थानों के उदारवादी प्रमुखों को उनके पद से हटाने में सफल रही है। मैंने नेहरू मेमोरियल सेंटर के मामले को देखा तो यह पाकर भयभीत हो गया कि जाने-पहचाने उदारवादी चेहरे गायब हो गए हैं। सच है, भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के शब्द अंतिम हैं। लेकिन वे लोगों के पास इस पर वोट मांगने नहीं गए थे। यह उनके एजेंडे पर भी नहीं था।

 
फिर भी, तसलीमा नसरीन का मामला है जो अस्पष्ट है। औरंगाबाद के हवाई अड्डे को छोड़ कर किसी भी हवाई अड्डे, नजदीक के पुणे हवाई अड्डे में भी, उन्हें दाखिल नहीं होने दिया गया। जाहिर है, सरकार ने यह निर्देश दिया होगा कि उन्हें बाकी जगहों में अंदर नहीं लिया जाए। यह सब 'सैटनिक वर्सेस’ किताब, जिसने इस्लाम के खिलाफ सवाल उठाए हैं, लिखने के लिए सलमान रूश्दी के खिलाफ इरान के फतवे जैसा मालूम होता है।

भारतीय राष्ट्र को हरदम चौकन्ना रहना है क्योंकि वह 19 महीने की सेंसरशिप से गुजर चुका है। प्रेस ने अति कर दी थी क्योंकि, जैसा भाजपा नेता दल के आडवानी ने कहा, आपको झुकने के लिए कहा गया था लेकिन आप तो 'रेंग गए’। बहुत हद तक, आडवानी सही थे। पत्रकार इंदिरा गांधी सरकार की ओर से अदालती मुकदमों में घसीटे जाने से डरे हुए थे। यहां तक कि प्रेस का रखवाला, प्रेस कौंसिल आफ इंडिया भी इंदिरा गांधी के समर्थन में झंडा उठाने में उनके समर्थकों से स्पर्धा कर रहा था।

आज यह मामला उलटा है। प्रेस का भगवाकरण कर दिया गया है और अखबार या टीवी चैनलों में कुछ अलग आवाजों को छोड़कर, प्रेस सत्ता में बैठे लोगों के इशारे पर नाचता है। पहले और आज में बहुत कम अंतर है क्योंकि अखबार या टेलीविजन चैनलों के मालिक और पत्रकारों के दिमाग में अपना अस्तित्व बचाने की बात सबसे ऊपर रहती है। एनडीटीवी दबाव में है क्योंकि इसके मालिक प्रणव राय ने एक कर्ज लिया था। लेकिन सीबीआई ने आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड, प्रणय राय और उनकी पत्नी राधिका राय और आईसीआईसीआई के एक अज्ञात कर्मचारी के खिलाफ साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार का मामला दर्ज कर दिया है, जिसके बारे में कहा जाता है कि सरकार के इशारे पर हुआ है।

टेलीविजन चैनल से लंबे समय तक जुड़े रहने के कारण, सरकार करन थापर और बरखा दत्त को परेशान करने के लिए कुछ तरीका अपना सकती है। वे सबसे ज्यादा खुलकर पीडि़त लोगों की बात उठाने वाले एंकर थे। जाहिर है कि यह सत्ता प्रतिष्ठान के पसंद का नहीं था। उन दोनों को हटाने के लिए चैनल बहुत दबाव में रहा होगा।

हम किस तरह स्वतंत्रता का माहौल वापस लाएं? आज राष्ट्र के सामने यही सवाल है। पत्रकारों के सिर पर कांट्रैक्ट की तलवार लटके होने के कारण वे अपनी बात रखने में डरते हैं कि मालिक नाराज न हो जाएं। आखिरकार, राष्ट्र को वही खबर मिल रही है जो विभिन्न दबावों तथा बाधाओं के कारण विभिन्न जगहों से छन कर आती हैं।

अमेरिका में ऐसी स्थिति आई थी तो पत्रकार इकट्ठा हो गए और अपना चैनल शुरू कर दिया। यह एक प्रकार का साहस था क्योंकि आखिरकार इतने लोग आलोचना के दायरे से बाहर हो गए और छोड़ देने की प्रवृत्ति काफी बढ़ गई। संसाधन की बुरी तरह से कमी महसूस की गई और आज़ादी से समझौता करना पड़ा।

करन थापर और बरखा दत्त दोनों को दिमाग में रखना होगा कि उनकी यात्रा लंबी और कठिनाइयों से भरी होंगी। उन्हें अपनी तरफ फुसलाने के लिए सत्ता लालच देगा। लेकिन यह उन पर है कि वे बियावान में कठिनाइयां सह पाते हैं। यह आसान नहीं है, लेकिन वे अपने चरित्र के बल पर ऐसा कर सकते हैं।

उन्हें मेरा समर्थन है, यह उनके जितने भी काम का हो, वे साहस के उदाहरण हैं। अब सब कुछ उनकी ताकत और प्रेस से मिले समर्थन पर निर्भर है। सिर्फ मीडिया ही नहीं, बल्कि सारा देश उनकी ओर देख रहा है। आपातकाल के समय जो हुआ, शायद अब वैसा न हो। उस समय प्रेस बुरी तरह फेल हुई। लेकिन मिलकर हम कामयाब हो सकते हैं।
 

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