By: Sabkikhabar
08-08-2017 08:17

पनगढ़िया की रीति-नीति और विचारों के जानकारों को उनके द्वारा भविष्य में उठाये जा सकने वाले कदमों को लेकर कतई कोई संदेह नहीं था। एयर इंडिया समेत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के साथ सरकारी सलूक का मामला हो, उच्च, तकनीकी व चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा प्रस्तावित सुधारों का, जैवसंवर्धित 'जेनेटिकली मोटीवेटेड’ बीजों की सिफारिश या किसानों पर आयकर लगाने के सुझाव का, उनकी आलोचना की जा सकती है, उनसे असहमत हुआ जा सकता है, यह भी कहा जा सकता है कि उनके कारण देश का सिर ऐसी ओखली में पड़ जायेगा कि मूसलों की गिनती ही नहीं रह जायेगी, लेकिन पनगढ़िया के नजरिये से अप्रत्याशित तो नहीं ही कहा जा सकता। आर्थिक सुधारों की गति वे किसी भी और तरीके से कैसे आगे बढ़ा सकते थे? बढ़ाते तो मनमोहन जैसे 'अंडर अचीवर’ होकर रह जाते।

पिछले बरस लगभग इन्हीं दिनों रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के तत्कालीन गवर्नर रघुराम जी राजन ने कहा कि वे दूसरे कार्यकाल के इच्छुक नहीं हैं और वापस शिकागो जाकर शिक्षा के अपने पुराने क्षेत्र में काम करना चाहते हैं तो नरेन्द्र मोदी की सरकार ने यह कहने में तनिक भी देर नहीं लगाई थी कि वह उनकी इच्छा का सम्मान करेगी। तब कई प्रेक्षकों का निष्कर्ष था कि 'इच्छा का सम्मान’ तो दरअसल उनका बहाना है, जिसको वह देश की अर्थव्यवस्था की जमीनी हकीकत को लेकर उससे भिन्न दृष्टिकोण रखने वाले राजन से मुक्ति पाने के लिए इस्तेमाल कर रही है। भूतपूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने तो बाद में यह भी दावा किया था कि राजन ने दूसरा कार्यकाल इसलिए स्वीकार नहीं किया था कि वे  500 और 1000 रुपये के बड़े नोट बंद किये जाने के विरोध में थे और सरकार ऐसा करने पर आमादा थी।

अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने अपना कार्यकाल पूरा हुए बिना ही इस्तीफा दे दिया है और सरकार उनसे भी राजन जैसा ही सलूक करती जताने की कोशिश कर रही है कि न उनके इस्तीफे में कुछ अप्रत्याशित है और न ही वह उसे लेकर किंचित भी हैरत या असुविधा की स्थिति का सामना कर रही है।  लेकिन इसे राजनकांड की पुनरावृत्ति भर नहीं माना जा सकता। वैसे ही जैसे यह नहीं माना जा सकता कि पनगढ़िया के इस्तीफे का कारण सिर्फ इतना-सा है कि कोलम्बिया विश्वविद्यालय में उनकी नौकरी नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से ज्यादा 'सुरक्षित’ है। सरकार कह रही है कि उन्होंने तीन महीने पहले ही प्रधानमंत्री को बता दिया था कि वे अपने दायित्व से 'मुक्त’ होना चाहते हैं और उसने उनका उत्तराधिकारी भी तय कर लिया है, तो इस सवाल को सिर उठाने से कैसे रोक सकती है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे तीन महीने से इतनी खिचड़ी पकती रही और देश को कुछ नहीं बताया गया, वैसे ही अभी भी देश से बहुत कुछ छिपाने की कोशिश की जा रही हो?

हम जानते हैं कि छिपाने की ऐसी कोशिशों का आभास भर हो जाये तो कयासों की शृंखला लम्बी की जाने लगती है। स्वाभाविक ही जहां सरकार और पनगढ़िया दोनों खुद को जरूरत से ज्यादा शांत व स्थिर रखकर प्रदर्शित करने में लगे हैं कि उनके बीच में कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है और मामला वाकई उतना ही है, जितना बता दिया गया है, आने वाली प्रतिक्रियाएं कह रही हैं कि पनगढ़िया ने जाते-जाते न सिर्फ अपने बल्कि नरेन्द्र मोदी सरकार के अंतर्विरोधों को भी बेपरदा कर डाला है। सो भी बिना ज्यादा बोले या कहे।

किससे छुपा है कि मोदी सरकार ने 2012 में पद्मभूषण से नवाजे जा चुके पनगढ़िया को अपना समझ जनवरी, 2015 में अपने द्वारा योजना आयोग की कीमत पर गठित नये-नवेले नेशनल इंस्टीच्यूशन फार ट्रांसफार्मिंग इंडिया-राष्ट्रीय भारत प्रवर्तन संस्थान यानी नीति आयोग का उपाध्यक्ष बनाया तो उसे उम्मीद थी कि वे मनमोहनकाल में धीमी पड़ चुकी आर्थिक सुधारों की गाड़ी में नये इंजन व पहिये तो लगायेंगे ही, आयोग का बेहतर दीर्घकालिक ढांचा भी खड़ा कर देंगे। तब पनगढ़िया की रीति-नीति और विचारों के जानकारों को उनके द्वारा भविष्य में उठाये जा सकने वाले कदमों को लेकर कतई कोई संदेह नहीं था। एयर इंडिया समेत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के साथ सरकारी सलूक का मामला हो, उच्च, तकनीकी व चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा प्रस्तावित सुधारों का, जैवसंवर्धित 'जेनेटिकली मोटीवेटेड’ बीजों की सिफारिश या किसानों पर आयकर लगाने के सुझाव का, उनकी आलोचना की जा सकती है, उनसे असहमत हुआ जा सकता है, यह भी कहा जा सकता है कि उनके कारण देश का सिर ऐसी ओखली में पड़ जायेगा कि मूसलों की गिनती ही नहीं रह जायेगी, लेकिन पनगढ़िया के नजरिये से अप्रत्याशित तो नहीं ही कहा जा सकता। आर्थिक सुधारों की गति वे किसी भी और तरीके से कैसे आगे बढ़ा सकते थे? बढ़ाते तो मनमोहन जैसे 'अंडर अचीवर’ होकर रह जाते।

लेकिन अब जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक नीति आयोग के भीतर के ही कुछ लोग पनगढ़िया से खुश नहीं थे और उनके द्वारा जैवसंवर्धित बीजों का पक्ष लेने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के संगठन भी उनसे नाराज हो गये थे। तभी से यह कहकर उनके नकारात्मक पहलुओं को इंगित किया जाना जारी था कि उनके अब तक के कार्यकाल में न प्रस्तावित पन्द्रह वर्षीय विजन डाक्यूमेंट बन पाया और न ही सात वर्षीय रणनीतिक दस्तावेज। ऐसे में उनका इस्तीफा इन संगठनों की जीत है तो जाहिर है कि इसका सम्बन्ध मोदी सरकार के अंतर्विरोधों से है। आश्चर्य नहीं कि एक विपक्षी नेता ने मोदी सरकार और संघ के संगठनों के अंतर्विरोधों के आर्थिक नीतियों व फैसलों तक पहुंच जाने को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि हकला-हकलाकर नोटबंदी का समर्थन करने वाले बेचारे पनगढ़िया अंतत: सरकारी प्रपंच से थक गये।

इस प्रतिक्रिया से पूरी तरह सहमत न भी हुआ जाये तो सरकार को इस सवाल का जवाब तो देना ही चाहिए कि क्या कारण है कि रघुराम राजन व पनगढ़िया जैसे अर्थशास्त्रियों को उनके दिये उच्च पदों का आकर्षण भी रोक नहीं पा रहा और अध्यापन की अपनी पुरानी दुनिया में लौट जाना ज्यादा श्रेयस्कर लग रहा है? देश को यह जानने का हक है कि इनको उसके साथ काम करने में कौन-सी ऐसी असुविधा थी, जिससे पार पाना उनके लिए संभव नहीं हुआ? नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रवादी आंधी में दो रोटी कम खाकर भी राष्ट्र निर्माण में लगे प्रधानमंत्री को छोड़कर न जाने का संकल्प वे क्यों नहीं दिखा सके?

दूसरे पहलू पर जायें तो पनगढ़िया के अपने अंतर्विरोध भी कुछ कम नहीं हैं। उनके इस्तीफे से स्पष्ट है कि वे भूमंडलीकरण की जिन नीतियों की दूसरों के लिए वकालत करते हैं, उनमें उन्हें खुद ही यकीन नहीं है। आर्थिक सुधारों के नाम पर वे कम कर्मचारी भर्ती करने, जल्दी रिटायर करने, पेंशन खत्म करने और आसानी से निकाल देने की सहूलियत वाली नीतियां बनाते और उनका प्रचार करते रहे हैं लेकिन अपने लिए उन्हें 65 साल की उम्र में भी सुरक्षित नौकरी की तलाश है। उन्हीं के शब्दों में कहें तो वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी इसलिए जा रहे हैं कि वहां जब तक दिमाग व शरीर काम करता है, तब तक नौकरी चलती रहेगी, तनख्वाह तो अच्छी होगी ही, पेंशन के लिए भी टेंशन नहीं लेना होगा।

ऐसे में है कोई उनसे पूछने वाला कि भारत में आकर वे लाखों शिक्षकों से ठेके पर नौकरी करवाने की वकालत क्यों करते हैं? औरों के लिए बाजारवाद हो तो उनके लिए कोई और वाद क्यों हो? अफसोस कि जिस सरकार को पूछना चाहिए, वह उनका उत्तराधिकारी तलाश कर मगन और उन्हीं की नीतियों पर सरपट दौड़ती रहने को अभिशप्त है।

लेकिन सवा अरब से ज्यादा के इस देश में किसी न किसी को तो ये सवाल पूछने ही थे। सो, एक पत्रकार ने पूछ लिया है: नेहरूवादी योजना आयोग को खत्मकर नीति आयोग बना तो उसके प्रथम उपाध्यक्ष राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया भीतर से नेहरूवादी क्यों निकले? क्यों वे सोशलिस्ट मानसिकता के तहत आजीवन नौकरी वाली जगह पर जा रहे हैं? फिर प्रधानमंत्री ने उन्हें क्यों जाने दिया? आगे प्रधानमंत्री किस दम पर लोगों से आह्वान करेंगे कि अपनी प्रतिभा लेकर भारत आइए और ब्रेनड्रेन से देश को बचाइए?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अरविंद पनगढ़िया ने उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर नीति आयोग को डिलेजीटिमाइज यानी अमान्य करने का रास्ता क्यों चुना!
 

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