By: Sabkikhabar
17-06-2017 07:44
यह बात समझ से परे है कि मंदसौर में हुई हिंसा के अगले ही दिन किसानों की मांगों को न्यायोचित क्यों और कैसे मान लिया गया। क्या यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी नहीं है? नर्मदा घाटी के किसान सरदार सरोवर बांध की अवैध डूब के खिलाफ पिछले 32 वर्षों से सतत संघर्ष कर रहे हैं। पिछले 13 वर्षों के अपने शासनकाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एक बार भी विस्तार से चर्चा नहीं की और अब अपरोक्ष दमन व मानसिक यातना का दौर शुरु कर दिया है। ऐसा क्यों हो रहा है कि लोकतांत्रिक संस्थान शांतिपूर्ण आंदोलनों की लगातार उपेक्षा कर रहे हैं, उनका तिरस्कार कर रहे हैं। 'किसानों की अवस्था की अच्छी तरह आलोचना कर देखने से मेरी भी यही धारणा हो गई है कि भारत के अधिकांश स्थान के किसान साल के अधिकांश समय पेटभर खाना न पाने के कारण अत्यन्त दुख पाते हैं।’ फैजाबाद कमिश्नर, हारिंग्टन- सन् 1888 उपरोक्त टिप्पणी के 130 वर्ष एवं भारत की आज़ादी के 70 वर्ष बाद यदि इस कथन से वर्ष हटा दिया जाए तो यह आज की ही बात मालूम पड़ेगी। हारिंग्टन ने अपनी रिपोर्ट में एक अन्य कटाक्ष करते हुए लिखा था, 'भूखे रहने की यहां लोगों को आदत पड़ गई है।’ मंदसौर में किसान आंदोलन में मारे गए 7 किसानों या किसान पुत्रों को लेकर कृषि की स्थिति-परिस्थिति, कृषक की माली हालत, कृषि के संकट पर अब राजनीतिक हल्कों में थोड़ी बहुत चर्चा हो रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शांति स्थापित करने के लिए अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे और उठ भी गए। परंतु वह यह नहीं बता पाए कि अशांति और हत्याओं का यह दौर शुरु क्यों हुआ। अतएव अब भारतीय जनमानस को हर हाल में विचार करना होगा कि 'कृषि (क्यों) मांग रही बलिदान।’ वैसे मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच के आदेश तो दे दिए, लेकिन मध्यप्रदेश पुलिस ने आंदोलन के दौरान हुई इन मौतों को लेकर कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है। पुलिस अधिकारियों का कहना है, उन्हें आत्मरक्षा के लिए गोलियां चलानी पड़ीं। अतएव किसी भी पुलिसवाले के खिलाफ कोई मुकदमा (अपराध) बनता नहीं। यानि पुलिस स्वयं न्यायाधीश की भूमिका में आ गई तो एक सदस्यीय न्यायिक आयोग जांच किस बात की करेगा? उसका दायरा अपने आप सीमित कर दिया गया। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि प्राथमिकी दर्ज कर यह मामला सीबीआई को सौंप दिया जाए। वैसे मंदसौर में पुलिस ने आम प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पहले एफआईआर दर्ज कर ली है। प्रदेश भर में यह संख्या सैकड़ों में होगी परंतु जनसेवक होने के नाते वह अपनी भूमिका को निभाना ही नहीं चाहते। लेटिन अमेरिकी लेखक डेनियल ड्री कहते हैं, 'कानून मकड़ी का ऐसा जाल है, जिसे मक्खियों और छोटे कीड़ों को पकडऩे के लिए बुना है, न कि बड़ी प्रजातियों का रास्ता रोकने के लिए।’ इसी को और विस्तार करते वहीं के एक कवि खोसे एरनांदेस ने कानून की तुलना एक छुरे से की थी, जो कि कभी उसकी ओर नहीं मुड़ता, जिसे उसने पकड़ रखा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री किसान पुत्र और किसान दोनों हैं। उनकी खेती से किसी को भी जलन हो सकती है। वैसे प्रो. अरुण कुमार ने अपने नवीन लेख में नीति आयोग के सदस्य विवेक देबराय को उद्धृत करते हुए कहा है कि एक आरटीआई आवेदन से यह बात सामने आई कि सन् 2012 में 8,12,426 व्यक्तियों के अपने व्यक्तिगत आयकर रिटर्न से पता चला कि इनकी औसत वार्षिक आय करीब 83 करोड़ रुपए है। यानि इनकी सम्मिलित आमदनी करीब 674 लाख करोड़ रुपए थी। जबकि उस वर्ष भारत की जीडीपी मात्र 100 लाख करोड़ रुपए ही थी। यानि इनकी आमदनी जीडीपी से 6.7 गुना अधिक थी। अगर यह आंकड़ा उपलब्ध है तो कालेधन को क्या कहीं और तलाशने की आवश्यकता थी? अगर इनसे वास्तविक वसूली की जाती तो जीडीपी का 200 प्रतिशत कर जमा हो सकता था जो कि अभी मात्र 5.5 प्रतिशत ही है। अपनी बात को और अच्छे से समझाते हुए वह बताते हैं, कृषि और सहयोगी धंधों का जीडीपी में करीब 14 प्रतिशत योगदान है यानि 150 लाख की जीडीपी में कृषि मात्र 21 लाख करोड़ का योगदान देती है। बाकी का 84 प्रतिशत यानि 129 लाख करोड़ रुपए अन्य 50 प्रतिशत लोग भागीदारी करते हैं और वे जीडीपी में मात्र 5.5 प्रतिशत की कर भागीदारी ही करते हैं और यह भी यह वर्ग भारत की जनसंख्या का 50 प्रतिशत है। यदि भारत की औसत प्रति व्यक्ति आय 1 लाख रुपए प्रतिवर्ष गिनी जाती है तो वास्तविक गणना के हिसाब से कृषि क्षेत्र में आय महज 27,000 रुपए प्रतिवर्ष ही बैठती है। तो साहब यही फर्क है भारत और इंडिया का। साथ ही इंडिया ने जो चमत्कार किया है। भारत उनके अहसान तले दबा है। गौर करिए एक सा व्यवसाय करने में एक व्यक्ति साल का 83 करोड़ रुपए कमाता है और एक अन्य महज 27,000 (सत्ताइस हजार) रुपए प्रतिवर्ष। जबकि 27 हजार रुपए कमाने वाला दिन-रात खेती में जुटा है और 83 करोड़ वाला? इस चालबाजी से निपटने का कोई उपाय राज्य व केंद्र सरकारें नहीं कर रहीं। सबसे दुखद तथ्य तो यह है कि किसान को कर्जे से निकालने की कोई तैयारी नजर नहीं आती। हम देख रहे हैं कि किसान कर्ज, फिर वह सांस्थानिक हो या साहूकारी के न चुका पाने की वजह से या तो आत्महत्या कर रहा है या खेती छोड़ रहा है। परंतु सरकार प्रतिवर्ष कृषि ऋण की सीमा बढ़ाती जा रही है। अपने नवीनतम निर्णय में केन्द्र सरकार ने 10 साल पुरानी वार्षिक ऋण योजना को एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया है जिसमें किसानों को 5 प्रतिशत सस्ता ऋण मिलेगा। सवाल तो यही है कि जब फसल के ठीक दाम ही नहीं मिलेंगे तो कर्ज की वापसी कैसे होगी? परंतु वह तो चर्चा में ही नहीं है। खूब बवाल उठने पर अब रिजर्व बैंक उन 12 बकायादारों पर कार्रवाई करने की सोच रहा है, जिनके खातों 5 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया है। बताया जा रहा है कि इन खातों में 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक बकाया है। जबकि देश के तीन चौथाई किसानों का सम्मिलित ऋण इससे कम होगा। यदि भाजपा शासित उत्तरप्रदेश व महाराष्ट्र तथा उनके द्वारा समर्थित आंध्रप्रदेश की सरकारें किसानों के ऋण माफ करती हैं तो मध्यप्रदेश सरकार या छत्तीसगढ़ सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? यह किसान पुत्र मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री ही हैं जिन्होंने नए भूमि अधिग्रहण कानून में नहरों के लिए मुआवजा वाले प्रावधान को हटवाया था। इन्होंने ही नए भूमि विकास में किसानों की जमीन को बिना मुआवजा अधिग्रहण को कानून जामा भर नहीं पहनाया था बल्कि किसान को न्यायालय जाने से भी वंचित कर दिया गया। क्या यही है लोकतंत्र का चरम? इतना ही नहीं, मध्यप्रदेश की किसान हितैषी सरकार ने नए भूमि अधिग्रहण कानून में दिए गए चार गुने मुआवजे के प्रावधान को मात्र दो गुना कर दिया है। इसके बावजूद सरकार तो किसानों की ही है। आज देश भर के किसान उद्वेलित हैं और पिछले कई दशकों से अपने उत्पादों के वाजिब भाव मांग रहे हैं। परंतु सुनवाई ही नहीं है। यह बात समझ से परे है कि मंदसौर में हुई हिंसा के अगले ही दिन किसानों की मांगों को न्यायोचित क्यों और कैसे मान लिया गया। क्या यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी नहीं है? नर्मदा घाटी के किसान सरदार सरोवर बांध की अवैध डूब के खिलाफ पिछले 32 वर्षों से सतत संघर्ष कर रहे हैं। पिछले 13 वर्षों के अपने शासनकाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एक बार भी विस्तार से चर्चा नहीं की और अब अपरोक्ष दमन व मानसिक यातना का दौर शुरु कर दिया है। ऐसा क्यों हो रहा है कि लोकतांत्रिक संस्थान शांतिपूर्ण आंदोलनों की लगातार उपेक्षा कर रहे हैं, उनका तिरस्कार कर रहे हैं। हिंसा की स्वीकार्यता एक अत्यन्त भयावह परिस्थिति निर्मित कर सकती है। आवश्यकता इस बात की थी कि मुख्यमंत्री बजाय अनशन पर बैठने के यह स्वीकारोक्ति करते कि आंदोलन के अहिंसक रहते हमने यथोचित कार्रवाई नहीं की। अभी भी समय है कि वह बजाय भुलावे देने वाले जनसंपर्क के, ठोस प्रयास करें। केन्द्र सरकार ने तो कृषि बर्बादी में कोई कसर ही नहीं छोड़ी है। नीति आयोग का जितनी जल्दी विघटन हो सके कर देना चाहिए। अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद योजना आयोग एक मानवीय मूल्य वाला संस्थान था। वर्तमान परिस्थिति व नीति निर्माताओं को इस लेटिन अमेरिकी नीति कथा से समझते हैं, मुखिया ने एक व्यक्ति के बारे में कहा, 'यह खुजलाता है। यह बहुत सख्ती से खुजलाता है और बहुत अच्छा खुजलाता है। वह आगे बोले, लेकिन यह वहां खुजलाता है, जहां खुजली नहीं होती।’
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