By: Sabkikhabar
16-06-2017 09:31
अभी तक इन संवैधानिक संस्थानों की ओर से चुनाव आयोग जैसी कोई मांग भी नहीं उठी है। लेकिन सवाल है कि इन संस्थाओं के पास अवमानना के लिए दण्डात्मक अधिकार हों और वे उनका प्रयोग करें तो इससे उनका अवमूल्यन तो नहीं होगा? न्याय के स्वाभाविक सिद्धान्तों में कोई भी दण्डात्मक निर्णय पूर्ण और अन्तिम नहीं माना जाता, इसलिए उनके खिलाफ अपील और सुनवाई के अवसर भी होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे निर्णयों के खिलाफ भी पूर्ण पीठ के समक्ष अपील का प्रावधान है। फिर न्यायिक संस्थानों के बजाय अन्य कार्यों में रत संवैधानिक संस्थानों को उनकी अवमानना के खिलाफ न्यायिक अधिकार दिया जायेगा तो वे किस प्रकार इसकी सुनवाई करेंगे? निर्वाचन आयोग ने अब यह मानते हुए कि उसके कदमों व कार्यों पर होने वाली टिप्पणियां उसके अपमान की सीमाएं पार कर रही हैं, सरकार को पत्र लिखकर अपेक्षा प्रकट की है कि उसे भी सर्वोच्च न्यायालय की भांति अपनी अवमानना वाली कवायदों के खिलाफ सुनवाई करने और दण्ड देने के अधिकार होने चाहिए। उसका कहना है कि चूंकि वह देश की महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, इसलिए उसके मान की रक्षा के उपाय भी आवश्यक है। हाल में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर कई दलों की ओर से आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। चुनाव आयोग के आश्वासनों को नकार कर उन्होंने आरोप लगाया था कि ये मशीनें दोषपूर्ण हैं और इनके माध्यम से निष्पक्ष चुनाव की कल्पना संभव नहीं हो रही है क्योंकि मतदाताओं ने जिनके भी पक्ष में मत दिए हों, इनमें छेड़छाड़ करके उनके मतों को दूसरे खाते में डाला जा सकता है। देश में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया इस संस्थान को इस मामले में अपराधियों के कठघरे में खड़ा किया गया तो उसने सफाईयां भी दीं। फिर भी आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे तो उसकी ओर से चुनौती दी गई कि ईवीएमों से छेड़छाड़ के आरोपों को सिद्ध करके दिखाया जाए। लेकिन इसके लिए उसने इन मशीनों के मदरबोर्ड खोलने और वहां तक पहुंचने की सुविधा देने से इन्कार कर दिया और कहा कि वह अपनी ईवीएमों की शुचिता के दावे के मुख्य आधार को उजागर नहीं करना चाहता। इसके बाद ईवीएमों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थोड़ा रुका भी। पहले आम चुनाव के वक्त से ही मतदान की प्रक्रिया और उसमें प्रयुक्त होने वाले साधनों के सम्बन्ध में निरंतर प्रयोग और बदलाव होते आये हैं। शुरू में मतदान के वक्त मतदान कक्ष में हर उम्मीदवार के पक्ष में पडऩे वाले मतों की अलग-अलग पेटियां हुआ करती थीं। बाद में पाया गया इससे गड़बड़ी की संभावनाएं समाप्त नहीं होतीं। उसके बाद एक ही पेटी में तब मतपत्रों पर उम्मीदवारों के नाम व चुनाव चिन्हों के सामने मुहर लगाकर उन्हें एक ही मतपेटी में डालने का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन इसे भी पूरी तरह निर्दोष नहीं माना गया। लोकसभा की गोण्डा सीट के एक चुनाव में सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह सच उजागर हुआ कि सील बंद मतपेटियों को अनुचित रूप से खोलकर एक प्रत्याशी के पक्ष में पड़े मतों पर अतिरिक्त मुहर लगाकर उन्हें रद्द कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि उस उम्मीदवार के बजाय, जिसे अधिक लोगों ने पसन्द किया था, निर्वाचित वह घोषित हो गया, जिसे लोगों ने नकार दिया था। अब प्रयोगों का यह सिलसिला इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों तक पहुंच गया है, जिनके बारे में चुनाव आयोग का दावा है कि उनके साथ छेड़छाड़ संभव नहीं है। जहां तक न्यायिक अवमानना के अधिकार का सम्बन्ध है, यह सभी संवैधानिक संस्थानों को उपलब्ध नहीं है। भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक भी संवैधानिक संस्थान के ही रूप में केन्द्र और राज्यों के सरकारी खर्चों और उनके लिए अपनाई गई विधियों का मूल्यांकन करके दोष तलाशते हैं। उनकी रिपोर्टें संसद और विधानमंडलों के समक्ष प्रस्तुत होती हैं और उन्हें स्वीकारने या अस्वीकार करने अथवा दोषों के दायित्व का निर्धारण करने का दायित्व इन संस्थाओं का विषय है, जो सरकारों का बजट भी बनाती व पारित करती हैं। लोक लेखा परीक्षण करके महज यह देखा जाता है कि सब कुछ निर्धारित विधियों और प्रावधानों के अनुसार हो रहा है या नहीं। संवैधानिक प्रमुख तो राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भी हैं, जिनके कार्य, दायित्व और भूमिकाएं निर्धारित हैं। राज्यपाल भी राज्य का संवैधानिक प्रमुख ही होता है। लेकिन इनमें से किसी को भी अवमानना के खिलाफ न्यायिक अधिकार नहीं दिये गये हैं। लोकतांत्रिक परंपराओं के तहत इन संस्थाओं के मान-सम्मान की रक्षा भी राज्य का ही विषय है। विपक्ष को भी उनसे मतभेद का अधिकार तो है लेकिन उसे भी इस दायित्व का निर्वाह करना है कि इन संस्थाओं को आलोचनाओं से परे रखा जाये। हालांकि इन संस्थाओं के निर्णयों के खिलाफ न्यायालयों को सुनवाई के अधिकार हैं और छूट सिर्फ इतनी है कि चूंकि इन्हें उन्मुक्तियां मिली हुई हैं, इसलिए उन्हें तलब नहीं किया जा सकता। उनकी ओर से जवाब कार्यपालिका के अधिकारियों द्वारा ही दिया जाता है। अभी तक इन संवैधानिक संस्थानों की ओर से चुनाव आयोग जैसी कोई मांग भी नहीं उठी है। लेकिन सवाल है कि इन संस्थाओं के पास अवमानना के लिए दण्डात्मक अधिकार हों और वे उनका प्रयोग करें तो इससे उनका अवमूल्यन तो नहीं होगा? न्याय के स्वाभाविक सिद्धान्तों में कोई भी दण्डात्मक निर्णय पूर्ण और अन्तिम नहीं माना जाता, इसलिए उनके खिलाफ अपील और सुनवाई के अवसर भी होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे निर्णयों के खिलाफ भी पूर्ण पीठ के समक्ष अपील का प्रावधान है। फिर न्यायिक संस्थानों के बजाय अन्य कार्यों में रत संवैधानिक संस्थानों को उनकी अवमानना के खिलाफ न्यायिक अधिकार दिया जायेगा तो वे किस प्रकार इसकी सुनवाई करेंगे? संसद और विधानमंडलों को भी अवमानना के मामलों की सुनवाई के अधिकार हैं लेकिन सदनों को न्यायालय के रूप में परिवर्तित करके और अभियुक्त की उपस्थिति में। यह प्रश्न उत्तरप्रदेश के बहुचर्चित केशव सिंह बनाम विधानमंडल मामले में भी उठा था कि उनके दिए दण्ड के सम्बन्ध में न्यायालय को सुनवाई के अधिकार होने चाहिए या नहीं? बाद में यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय तक गया, जिसका निर्णय था कि जिन्हें दिये गये हैं, उनके विशेषाधिकारों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन दूसरे की अवमानना की कीमत पर नहीं। इसीलिए संसद और विधानमंडलों में भी उन प्रश्नों पर विचार नहीं किया जाता, जो न्यायालयों में विचाराधीन होते हैं। सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी विचाराधीन मामले को न्यायालय के विचार से विरत कर सके। लेकिन अयोध्या विशेष क्षेत्र अधिग्रहण के मामले में विवादित क्षेत्र के अधिग्रहण को न्यायालय की विचार परिधि से हटाने का निर्णय किया गया तो सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार को ऐसा करने का अधिकार तो है, लेकिन न्याय के सिद्धान्त के अनुसार इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था अनिवार्य है। इस कारण यह प्रसंग पुन: न्यायालय की विचार परिधि में पहुंच गया। निर्वाचन आयोग चुनाव कार्य में संलग्न होता है तो संविधान में ही उसके लिए यह व्यवस्था कर दी गई है कि उस समय उसके किसी फैसले को न्यायालय में चुनौती देकर रुकवाया नहीं जा सकता। हां, चुनाव सम्पन्न होने के बाद उस निर्णय की विधिपरकता, गुण व दोषों पर विचार के लिए उसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। ऐसे मामलों में न्यायालय के आदेश ही अन्तिम होंगे। अब यह तो सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है कि किसी विवादित प्रश्न पर निर्णय के अन्तिम अधिकार न्यायालय के पास ही सीमित हैं। समादेश याचिकाओं का प्रावधान भी इसी दृष्टिकोण का प्रतिफल है। चुनाव आयोग चुनाव प्रणाली के तहत अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा हो तो उसके कृत्यों को न्यायालयों में चुनौती न देने के प्रावधान के पीछे भी मंशा यही है कि वह अपने कर्तव्य का निष्पादन बिना किसी व्यवधान के कर सके। हां, अपनी अवमानना के खिलाफ न्यायालय जाने का अधिकार तो साधारण व्यक्तियों तक को दिया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और केन्द्रीय वित्त मंत्री के बीच ऐसा ही एक विवाद न्यायालय में चल रहा है। चुनाव आयोग के कई निर्णय भी न्यायालय में गये हैं, जिनमें उसके खिलाफ भी फैसले हुए हैं। अगर चुनाव आयोग अपनी आलोचनाओं से विचलित है तो वह क्या करेगा अगर सर्वोच्च न्यायालय तक ने मान लिया है कि उसके निर्णयों पर भी टिप्पणी हो सकती है। अलबत्ता, वस्तुपरक ढंग से और बिना किसी द्वेषभावना के। जाहिर है कि कोई भी संवैधानिक संस्था छुईमुई नहीं है और चुनाव आयोग को भी अपनी अवमाननाओं के खिलाफ न्यायालय जाने की छूट है। वह व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों अवमाननों को चुनौती दे सकता है। लेकिन यह मानना कि चुनाव आयोग एकमात्र ऐसा पवित्र संस्थान है, जो आलोचनाओं से मुक्त हो, लोकतंत्र में किसी भी तरह संगत नहीं माना जा सकता। अलबत्ता, अवमानना किसी की भी नहीं होनी चाहिए। साफ है कि चुनाव आयोग आलोचनाओं से मुक्त होना चाहता है तो यह उसके निर्णय और व्यवहार से जुड़ा हुआ प्रश्न है, जिस पर समग्र दृष्टि से और तथ्यों के आधार पर विचार कर निर्धारित विधि से ही फैसला हो सकता है।
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