By: Sabkikhabar
15-06-2017 08:37
इंसानी फितरत है, अपनी बुराइयों को दर्शाने के लिए वह खुद की जगह दूसरों का उदाहरण पेश करता है, खासकर जानवरों का। जैसे बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद, लोमड़ी ने कहा अंगूर खट्टे हैं, धोबी का कुत्ता घर का न घाट का या सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। न कभी बंदर ने अदरक की बात की होगी, न लोमड़ी ने अंगूरों की, कुत्ता स्वार्थवश एक पाले से दूसरे पाले में नहींजाता और बिल्ली तो कभी धर्म का झूठा लबादा नहीं ओढ़ती। चूहा खाना उसकी प्रकृति है और वह खुलेआम ऐसा करती है। एकमात्र इंसान ही है, जो वक्त और जरूरत के अनुसार अपने काम दिखा कर या छिपाकर करता है। कभी लगाव और कभी दुराव, कभी हिंसा और कभी अनशन का खेल राजनेता खूब खेलते हैं। इन दिनों ऐसा तमाशा मध्यप्रदेश में खेला जा रहा है। आमिर खान जैसे फिल्मकार चाहें तो पीपली लाइव की पूरी श्रृंखला बना सकते हैं। यहां रोज किसान मर रहे हैं, रोज उनकी मौत पर राजनीति आंसू बहा रही है, रोज राजनेता पश्चाताप प्रदर्शित करते नजर आ रहे हैं। आप गिनते रहिए कि बिल्ली ने सौ चूहे खाने के बाद हज का फैसला लिया या दो सौ का लक्ष्य निर्धारित किया है, घडिय़ाल कब तक आंसू निकाल सकता है, यह भी टीवी पर घर बैठे देख सकते हैं। महाराष्ट्र से शुरु हुआ किसान आंदोलन मध्यप्रदेश में इतना गंभीर रूप धारण कर लेगा, इसका अनुमान किसी दल ने नहीं लगाया था। जब राजनेता किसानों के दर्द को ही नहीं समझते तो उनके आंदोलन की तीव्रता क्या खाक समझते। लेकिन हाशिए पर धकेल दिए गए किसान इस बार मुख्यधारा की चर्चा में आ ही गए। मंदसौर में पुलिस की गोली से छह किसानों की मौत पर सरकार ने सच-झूठ का दांव चला, लेकिन यह बात माननी ही पड़ी कि किसान पुलिस की गोली से ही मरे हैं। अब उसकी जांच के आदेश दिए गए हैं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह मृतकों के परिजनों को आश्वासन दे रहे हैं कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। स्वाभिमानी किसानों के परिजनों ने साफ कह दिया है कि उन्हें सरकारी नौकरी जैसे आश्वासन नहीं, न्याय चाहिए। देखना यह है कि अब जीत किसकी होती है, उनके स्वाभिमान की या सरकार की। लेकिन हार-जीत का फैसला भी तभी होगा, जब जनता इस बात को याद रखेगी। पुराने ऐसे कितने ही मामले हैं, जिन पर जांच बिठाई गई, दोषियों को सजा दिलाने का ऐलान किया गया, लेकिन अब वे मामले सरकारी फाइलों में कहीं दबे हैं और लोग उनके बारे में भूलकर नई घटनाओं में उलझ जाते हैं। अभी मंदसौर का ही उदाहरण ले लें, यहां रोज घटनाएं इतनी तेजी से बदल रही हैं कि असली बात पर चर्चा ही नहीं हो रही। किसानों पर पुलिस फायरिंग के बाद मुख्यमंत्री उपवास पर बैठे थे। लेकिन अचानक पता चला कि मुख्यमंत्री का अनशन खत्म हो रहा है, क्योंकि मारे गए छह किसानों में से चार के परिजनों ने उनसे ऐसा करने की अपील की। बड़े तामझाम के किया गया शिवराज सिंह का उपवास ज्यादा चर्चा न बटोर ले, यह चिंता विपक्षियों को भी थी। लिहाजा कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी 72 घंटे के सत्याग्रह, उपवास का ऐलान किया है, कुछ अन्य कांग्रेसी नेता उनका साथ देंगे। देखना दिलचस्प होगा कि श्री सिंधिया का सत्याग्रह 72 घंटे चलता है, या उन्हें भी पीड़ित परिवार नींबू पानी, संतरे का रस समय से पहले पिलाने में सफल होते हैं। वैसे श्री सिंधिया ने मंदसौर जाने की भी कोशिश की थी, लेकिन मध्यप्रदेश पुलिस ने उन्हें वहां पहुंचने नहीं दिया। इसके पहले राहुल गांधी को भी रोका गया था और जनता तक उनकी जुझारू नेता वाली तस्वीर पहुंची थी, जिसमें वे मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर जा रहे हैं। फिलहाल उन्होंने ट्वीट कर जानकारी दी है कि वे नानी से मिलने विदेश गए हैं और भाजपा को उन पर तंज कसने का एक और मौका मिल गया है। भाजपा प्रवक्ताओं के लिए राहुल गांधी प्राथमिकता हैं, किसान नहीं। गुजरात में पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल भी मंदसौर पहुंचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें भी रोक लिया। हार्दिक पटेल के बहाने अब यह चर्चा शुरु हो गई है कि मध्यप्रदेश में पाटीदारों के नेता वे बन पाते हैं या नहीं? इस बीच मंदसौर में धारा 144 लग गई, जो बुधवार को मुख्यमंत्री की यात्रा के पहले हटा दी गई। शिवराज सिंह मंदसौर के बड़वन गांव पहुंचे, वहां एक मृतक किसान घनश्याम धाकड़ के परिवार से मिले, उसकी दो महीने की बेटी और पांच साल के बेटे को दुलार किया, अब इन्हीं दृश्यों की चर्चा है। एक संवेदनशील समाज के रूप में हम कितने खोखले हैं न? मुख्यमंत्री की मंदसौर यात्रा से किसान आंदोलन की ताप भाजपा के लिए कितनी कम होती है? ज्योतिरादित्य सिंधिया का सत्याग्रह कांग्रेस के लिए क्या संजीवनी साबित होगा? किसानों पर गोली चलाने वाले क्या सजा के पात्र बनेंगे? ऐसे तमाम सवाल अब प्रमुख बन गए हैं, और जिन सवालों पर असल बहस होनी चाहिए, यानी किसानों की मांगों पर, वे फिर हाशिए पर चले गए हैं। मध्यप्रदेश में कर्ज में दबे तीन और किसानों ने आत्महत्या कर ली और जो किसान जिंदा हैं, उन्हें अब भी नहींं पता कि उनका कर्ज कैसे चुकता होगा? उनकी फसल की क्या कीमत सरकार लगाएगी? दिन-रात की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें जो हासिल होगा, वह उनका हक कहा जाएगा या खैरात कहलाएगी, यह वे नहीं जानते और शायद समाज की दिलचस्पी भी इसे जानने में नहीं है।
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